Saturday, 21 November 2015

दुख गड्ढ़ोँ जैसे मिले,
सुख जैसे ये रेत,
मिलकर कर लेँ एक सा,
जीवन का यह खेत,


अब की साल दिवाली में,
हम थे नोआखाली में,
बोतल में राकेट चलाए,
चकरी छोड़ी थाली में,
अबकी साल दीवाली में...
जगमग चमके देश, हमारा,
हिस्सा हो खुशहाली में,
अच्छी बातें मन में रक्खी,
गंदी बातें नाली में,
अब की साल दिवाली में...
चले पटाखे और फुलझड़ी,
धूम धड़ाम धड़ाम,
चकरी नाच रही चकराती,
उसे नहीं आराम,
आसमान को भागा राकेट,
लगी पूँछ में आग,
बम जब फटा जोर से,
बछ्डा गया थान से भाग,
दिए जला, छोड़े पटाखे,
खाई खील मिठाई,
एक बरस तक करी प्रतीक्षा,
तब दीवाली आई,