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Friday, 8 March 2019

अपनी बोली में --

अपनी बोली में
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सबको चहिए ठकुरसुहाती,
बनैं वे चाहे, ससुर के नाती,
निपट अंधेर, ना राह सुझाती,
भटकत फिरैं ना संग संगाती,
आवाज़ै तो बहुतै आती,
मगर न एकौ मन बहलाती,
अंधिन कौ तौ तब पतियाती,
भेटैं कौरि जुड़ावैं छाती,
सत्तर पूत बहत्तर नाती,
वाऊ के घर दिया न बाती,
दिन भर रैय्यत आती जाती,
कोई उन्हैं पहुँचावै पाती,

आज आया यहाँ है, वो कल जाएगा,

सामने का नज़ारा, 
बदल जाएगा,
जो उगा सुबह सूरज, 
वो ढल जाएगा,
तुम ये चाहो न चाहो,
मगर सच है ये,
आज आया यहाँ है,
वो कल जाएगा,

Saturday, 14 October 2017

भाव भरा हो,
नित नूतन स्वर,
लाएँ अर्थ
शब्द में भरकर,

कविता है
तो बोलेगी ही,
लोगों की
जुबान पर चढ़कर,
गुड्डी है तो
डोलेगी ही,
नीले आसमान
में बढ़कर,
कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना,
आस का विश्वास का आया सवेरा,
जो करेगा दूर जीवन का अँधेरा,

इक नए उत्साह का सूरज उगा है,
चल पड़ेगा रथ बहुत दिन से रुका है,

क्षितिज के द्वारे से झुककर झाँकती किरनें,
रंग बिखराकर हमारा मन लगी हरने,

जाग जाएं जब तभी समझो सवेरा,
ग़म न कर ग़र राह में है तम घनेेरा,

चल रहा जीवन हमारा, चल रहे हम,
रुक गए ये कारवाँ सब, जाएगा थम,
कुदरत के कण-कण में सरगम,
नए सृजन का चाव,
सुनना चाहो, छोड़ जगत को,
कुछ पल यहाँ बिताओ,
प्रथम द्वितीय तृतीय पुरस्कृत हुए कहानीकारो,
जिम्मेदारी है तुम पर अब ज्यादा, यह स्वीकारो,
सरस सुगम स्वीकार्य कहानी की बहने दो सलिला,
देतीं शुभकामना खड़ी संग,भंडारी श्री विमला,
बहुत वीराना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कोई दीवाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
किसी का गीत ना कोई रुबाई,
महज भूला फसाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कभी सरसब्ज़ छायादार था पर, फकत लूटा खज़ाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
हवा थी तेज, पानी भी नहीं था,
गुजर इसको भी जाना, फिर भी खड़ा हूँ,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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मौसम भी हुआ भीगा,
रुत पे भी जवानी है,
है आग कोई अन्दर,
बाहर से ये पानी है,
औरों की तो छोड़ो,
हैं पेड़ भी बौराए,
कुदरत की हर शय की
ये ही तो कहानी है,
पत्तों पर ठहरी-ठहरी
ये बारिश की बूँदें,
सोचें हम ये हैं
गालों पर आँखों को मूदें,
बंद करे पलकों को
पल-पल जीवन को जी लें,
मदिर-मदिर मन से साँसों की
मदिरा को पीलें,
क्या अच्छा है और बुरा
कहते किसको भूलें,
आज उम्मीदों के झूले चढ़
अम्बर को छू लें,

Saturday, 2 September 2017

बस में बैठे चले घूमने,
मस्ती में भाई,
पीछे वालो भी बैठो,
करना मत लड़ाई,
कभी-कभी ऐसे भी मौके ,
मिल जाते हमको,
तीखी फीकी खट्टी मीठी,
अपनी पढ़ाई,
महक मिट्टी की जिस दम,
ज़ेहन को पागल बनाती है,
नहीं रुक सकता बेटा,
माँ उसे मन से बुलाती है,
कुदरत का अनमोल इशारा,
भाषा रूप विविध पहनावा,
कितना सुंदर कितना प्यारा,
रंग-रंगीला देश हमारा,
लोक रंग
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सीधा सादा बंदा, सीधा सादा है परिवार,
रंगरंगीला देश, देश के रंगीले त्योहार,
महके मिट्टी सोंधी खुश्बू खींचे अपनी जान,
देखो जरा बताना कैसा पहना ये परिधान?

(सिक्किम में)
झर झर झरते झरने,
सर सर चलती पवन सुहानी,
दिल न रहे वश में जो,
तो फिर इसमें क्या हैरानी,
प्रकृति विचित्र बनाई
तेरे क्या कहने,
कहाँ तक करें बड़ाई,
तेरे क्या कहने,
कैसे-कैसे जीव
बनाए दुनियाँ में,
सोच न पाएं भाई,
तेरे क्या कहने,
जो हम से ना हो पाया,
वो तुम करके दिखलाओगी,
सिंधु साइना हो कोई भी,
उभर के ऊपर आओगी,
मुझे याद रखो या भूलो,
पर खुद पर इतराओगी,
मेरे इस मेडल से ज्यादा,
ऊँचे मेडल लाओगी,
पुलेला गोपीचंद
ये निर्मल निश्छल हँसी,
खिलते जैसे फूल,
ज्यों ज्यों बढ़ती उमर है,
हम जाते हैं भूल,
मेहनत और लगन का चमके,
जिन पैरों में जूता,
रोक सकेगा कौन उसे फिर,
किसमें इतना बूता,

Monday, 22 May 2017

लो यहाँ पे आ गए हम,
यूँ ही साथ-साथ चलते,
हो न ग़म किसी को हमसे,
यही देखते-सँभलते,

गुजरे बरस पचीसों,
इस राह में हमारी,
मिलती रही है छाया,
यूँ ही छाँव में तुम्हारी,