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Saturday, 2 September 2017


1. धान-पान अरु केरा, तीनों पानी के चेरा

2. तरकारी है तरकारी या में पानी की अधिकारी

काला फूल न पाया पानी धान मरा अधबीच जवानी

3. करिया बादर जी डरवावे, भूरा बादर पानी लावे

माघ-पूस पुरवैया चले तो छिछली गड़हिया नाव चलावे

Thursday, 3 November 2016

नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी बात भगवान से कहियो,
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प्रेम सै दुनिया आय जो बस में,
फिर क्यों लोग लड़ैं आपस में,
आवौ फिर सै जा समझईयो,
मेरी बात...
खाय न पामैं रोटी कल सै,
हमैं निकारौ जा दल दल सै,
हम खुस रहैं, रहै खुस भईयौ,
मेरी बात...
चार दिना की जा जिनगानी,
सिगरी दुनिया आनी जानी,
कौन हमेसा के लये रईयौ,
मेरी बात...
रजनीकान्त शुक्ल

Tuesday, 11 October 2016

घाघ कवि (संवत-1750)
उधरा काढ़ि व्योहार चलावै,
छ्प्पर डारै तारो,
सारे के संग बहन पठावै,
तीनौं को मुँह कारो,
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लम्बी पूँछ और ऐंठा कान,
सही बैल की है पहचान,
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दिन में गरमी रात में ओस,
कहैं घाघ वरषा सौ कोस,
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लाल पियर जब होय अकाशा,
तब नाहीं वरषा की आशा,
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ढ़ेले ऊपर चील जो बोलै,
गली-गली में पानी डोलै,
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हँसुआ ठाकुर खसुआ चोर,
इन ससुरन को गहरे बोर,
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आलस नींद किसानै नासै,
चोरै नासै खाँसी,
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चढ़त जो बरसै चित्रा,
उतरत बरसै हस्त,
कितनै राजा डॉड़ ले,
हारै नहीं गृहस्त,
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प्रातकाल खटिया सै उठि के,
पियै तुरन्तै पानी,
ता घर वैद कबहुँ नहिं आवै,
बात घाघ की जानी,
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जिन पर कोई भी गर्व कर सकता है 👌
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कोई भी कवि या रचनाकार जीवन में कितना ही क्यों न लिख ले उसकी साध रहती है कि उसका लिखा लोगों की जुबान पर चढ़ जाए। चाहे वो दो ही पंक्तियां क्यों न हों। इसे एक दृष्टि में मरने के बाद भी न मरना कह सकते हैं।
इस मायने में छिबरामऊ के कवि नेहजी की दो पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं। इन्होंने निमंत्रण पत्र के माध्यम से तोे न जाने कहाँ- कहाँ की सैर की ही और न जाने कितने लोगों की भावनाओं का स्वर बनी। लोकजीवन की कई पीढ़ियों की जुबान पर राज करती रहीं जानकर नई पीढ़ी आश्चर्य और रश्क़ कर सकती है लेकिन जो पीढ़ी इन पंक्तियों की धूम की साक्षी रही है वो आज भी हमारे बीच मौजूद है । प्रस्तुत है वे पंक्तियाँ -
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण,
प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
हे मानस के राजहंस तुम,
भूल न जाना आने को,
गदाधरराय नवीन
(संवत-1776-1836)
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पवित्र कुरान का कविता में अनुवाद किया,
दिल्ली दरबार में लार्ड हार्डिग्ज को कविता सुनाई।
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डमरु विशाल कर,नाचत विनोद युत,
लाल -लाल नैन काहू ध्यान में सुलीन हैं,
अति विषयारे कारे-कारे अहि तीन धारे,
झुकि-झुकि झूमि-झूमि डोलत गलीन हैं,
विमल विचित्र गंगधार है जटान मध्य,
माथे पै विराजत मयंक समीचीन है,
एहो ब्रजरानी ब्रजराज को दिखावो आनि,
ब्रज में सुआयों आज जटिल नवीन है,
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जाके रूपरेख न अनिच्छ अद्वतीय अज,
श्रुति स्मृति हु नेति-नेति करि गावती,
अच्युत अनंत अविकारी अविनाशी ताहि, 
देखि अनमनो सब देवन मनावती,
तारी को लगैया त्रिपुरारी हू न पावैं ताहि,
दै- दै करतारी वै नवीन दुलरावती,
जगत अपार की रमैया शेष-शय्या ताकी,
लेकर बलैया मैया पालन झुलावती,👍
ईश्वरी कवि
(संवत -अज्ञात)
सूनो घर पायो दौरि आई लहकान लगी,
पायो लै भाजि गई फेरि न दिखाती हो,
औती घरु फांदि तुम डराती हौ नेक नहिं,
खावौ फैलावौ भड़फोरु कर जाती हो,
कहत कवि गोपी बिन छेड़े न छेड़ी कोई,
 लट्ठ लै खीसैं काढ़ि बहुत ही खिसियाती हो,
ऐसो घर ध्यान कवि कहत राय ईश्वरी,
एक दाँय काट चुकी फेरि गुर्राती हो,
शिवचरण लाल शुक्ल 'शम्भू पद'
(1900-1960)
ज्यों त्यों रह्यों अब लौं जिय तू,
अब आओ वसन्त कछू ना बिसैहै,
शम्भू सुगंधित शीतल मन्द,
समीरन पीर गम्भीर उठैहै,
क्यों ठहरैगो करै गो कहा,
जब कोकिल कूक के हूक सुनैहै,
और न तेरी चलैगी कछू बस,
संग कुहू के तुहू कढ़ि जैहै,
शिवचरनलाल शुक्ल शम्भूपद
(1900-1960)

आजु मैं गई ती शम्भु न्योते नन्द गाँव तहाँ,
सांसत बड़ी रूपवती वनितान की,
घेरि लीन्हो सखिन तमासो करि मेरो मोहि, 
गहि-गहि गुलुफ लुनाई तरवान की,
औरै बलि बोलि-बोलि औरनि दिखावै रीझि,
रीझ सुघराई औ ललाई मेरे पान की,
घूँघट उघारि मुख देखि-देखि एकै रहै,
 एकै लगी नापन बड़ाई अँखियान की,

रामनारायण द्विवेदी रमेश
(1932-1992 विक्रमी)
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आलस त्यागि करौ पुरुषारथ,
ताते यथारत काज फुरैंगे,
उद्यम और उपाय करौ
तब आपुहि देश के दुख टरैगे,
आकरी चाकरी में न चले
इमि दास बने नहि पेट भरैंगे,
भारत भूमि के भाग जगैंगे,
रमेश जू वे दिन फेर फिरैंगे,
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आरत भारत गारत ह्वै रह्यो,
जाने कहा दिन खोटे करैंगे,
काल के गाल के ग्रास भये,
बहु देखे अकाल में केते मरेंगे,
कौलौं रमेश कलेश में देश के वासी
अंदेश के पाले परैंगे,
ह्वैहै कहा अब हे मेरे राम
कहौ कब वे दिन फेरि फिरैंगे,
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रामनारायण जी द्विवेदी रमेश 
(1932-1992 वि.)
विलेलेले
केतिक कराल कलिकाल की कठोर कला,
काम क्रोध कपट कुकर्म कुटिलाई है,
कहै कहा कोऊ कछु करनी कुलीनन की,
करत कुकर्म कहै कर्म ही कराई है,
कोविद रमेश कहूँ किंचित कुशल कैसी,
कामनी कनक कोटि कामना कराई है,
काटिए कलेश कारुणीक कमला के कंत,
करौगे कृपा तौ कहौ कौन कठिनाई है,
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अरुण अनार ऐसी एड़ी अवलोकत ही,
ललकतु नीकी भाँति पावत अनन्द है,
जगमग ज्योति नख-नख पै नखत बृंद,
कोटिचन्द्र वारौं शोभा ललित अमंद की,
पगतल पावन प्रभाव प्रभु ताके पुन्ज,
प्रात के प्रभाकर ते लालिमा दुचन्द हैं,
पद अरविन्द पै रमेश रामचन्द्रजू के,
मन मतवारो मेरो मंजुल मयन्द है,
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जनकसुता के पति ताके जिन ताके पति,
सविताके कुल के पताके प्रभुता के हैं,
हरन धरा के भार कृपा के अगार विभु
वीर विरदैत बाँके विदित सदा के है,
धन्य ध्यान जाके परि पाके मुनि वृन्द औ 
अनन्द मद छाके जाके पति गिरजा के हैं,
पूरण कला के कमला के कंत हैं रमेश, 
तारन शिला के ये कुमार कौसला के हैं,
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