Tuesday, 11 October 2016

जिन पर कोई भी गर्व कर सकता है 👌
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कोई भी कवि या रचनाकार जीवन में कितना ही क्यों न लिख ले उसकी साध रहती है कि उसका लिखा लोगों की जुबान पर चढ़ जाए। चाहे वो दो ही पंक्तियां क्यों न हों। इसे एक दृष्टि में मरने के बाद भी न मरना कह सकते हैं।
इस मायने में छिबरामऊ के कवि नेहजी की दो पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं। इन्होंने निमंत्रण पत्र के माध्यम से तोे न जाने कहाँ- कहाँ की सैर की ही और न जाने कितने लोगों की भावनाओं का स्वर बनी। लोकजीवन की कई पीढ़ियों की जुबान पर राज करती रहीं जानकर नई पीढ़ी आश्चर्य और रश्क़ कर सकती है लेकिन जो पीढ़ी इन पंक्तियों की धूम की साक्षी रही है वो आज भी हमारे बीच मौजूद है । प्रस्तुत है वे पंक्तियाँ -
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण,
प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
हे मानस के राजहंस तुम,
भूल न जाना आने को,

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