शिवचरनलाल शुक्ल शम्भूपद
(1900-1960)
आजु मैं गई ती शम्भु न्योते नन्द गाँव तहाँ,
सांसत बड़ी रूपवती वनितान की,
घेरि लीन्हो सखिन तमासो करि मेरो मोहि,
सांसत बड़ी रूपवती वनितान की,
घेरि लीन्हो सखिन तमासो करि मेरो मोहि,
गहि-गहि गुलुफ लुनाई तरवान की,
औरै बलि बोलि-बोलि औरनि दिखावै रीझि,
औरै बलि बोलि-बोलि औरनि दिखावै रीझि,
रीझ सुघराई औ ललाई मेरे पान की,
घूँघट उघारि मुख देखि-देखि एकै रहै,
घूँघट उघारि मुख देखि-देखि एकै रहै,
एकै लगी नापन बड़ाई अँखियान की,
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