घाघ कवि (संवत-1750)
उधरा काढ़ि व्योहार चलावै,
छ्प्पर डारै तारो,
सारे के संग बहन पठावै,
तीनौं को मुँह कारो,
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लम्बी पूँछ और ऐंठा कान,
सही बैल की है पहचान,
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दिन में गरमी रात में ओस,
कहैं घाघ वरषा सौ कोस,
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लाल पियर जब होय अकाशा,
तब नाहीं वरषा की आशा,
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ढ़ेले ऊपर चील जो बोलै,
गली-गली में पानी डोलै,
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हँसुआ ठाकुर खसुआ चोर,
इन ससुरन को गहरे बोर,
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आलस नींद किसानै नासै,
चोरै नासै खाँसी,
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चढ़त जो बरसै चित्रा,
उतरत बरसै हस्त,
कितनै राजा डॉड़ ले,
हारै नहीं गृहस्त,
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प्रातकाल खटिया सै उठि के,
पियै तुरन्तै पानी,
ता घर वैद कबहुँ नहिं आवै,
बात घाघ की जानी,
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छ्प्पर डारै तारो,
सारे के संग बहन पठावै,
तीनौं को मुँह कारो,
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लम्बी पूँछ और ऐंठा कान,
सही बैल की है पहचान,
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दिन में गरमी रात में ओस,
कहैं घाघ वरषा सौ कोस,
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लाल पियर जब होय अकाशा,
तब नाहीं वरषा की आशा,
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ढ़ेले ऊपर चील जो बोलै,
गली-गली में पानी डोलै,
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हँसुआ ठाकुर खसुआ चोर,
इन ससुरन को गहरे बोर,
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आलस नींद किसानै नासै,
चोरै नासै खाँसी,
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चढ़त जो बरसै चित्रा,
उतरत बरसै हस्त,
कितनै राजा डॉड़ ले,
हारै नहीं गृहस्त,
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प्रातकाल खटिया सै उठि के,
पियै तुरन्तै पानी,
ता घर वैद कबहुँ नहिं आवै,
बात घाघ की जानी,
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