शिवचरण लाल शुक्ल 'शम्भू पद'
(1900-1960)
ज्यों त्यों रह्यों अब लौं जिय तू,
अब आओ वसन्त कछू ना बिसैहै,
शम्भू सुगंधित शीतल मन्द,
समीरन पीर गम्भीर उठैहै,
क्यों ठहरैगो करै गो कहा,
जब कोकिल कूक के हूक सुनैहै,
और न तेरी चलैगी कछू बस,
संग कुहू के तुहू कढ़ि जैहै,
अब आओ वसन्त कछू ना बिसैहै,
शम्भू सुगंधित शीतल मन्द,
समीरन पीर गम्भीर उठैहै,
क्यों ठहरैगो करै गो कहा,
जब कोकिल कूक के हूक सुनैहै,
और न तेरी चलैगी कछू बस,
संग कुहू के तुहू कढ़ि जैहै,
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