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Thursday, 15 September 2016

प्रधानमंत्री को बचाया

दो अक्टूबर 1957 देश की राजधानी दिल्ली...
अक्टूबर के महीने में हर बार दिल्ली में बड़े धूमधाम से दशहरे का पर्व मनाया जाता है। सो इस बार भी रामलीला की मंडलियां जगह-जगह राम की कहानी मंचित कर रहीं थीं। मशहूर हस्तियों को अपनी नाटक मंडली में बुलाने की इनमें होड़ लगी रहती।
इस बार देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक नाटक मंडली ने आमंत्रित किया था। भारी भीड़ को देखते हुए स्काउट के स्वयंसेवक भी व्यवस्था बनाने के लिए कार्यक्रम स्थल पर मौजूद थे। उन्हीं में था वह बारह साल का नन्हा स्काउट बच्चा हरिश्चंद मेहरा...
सिर पर कैप, गले में स्कार्फ, कमर में चाकू, पाकेट में सीटी शरीर पर पूरी  
स्काउट की वर्दी... प्रधानमंत्री जी आ रहे हैं सो सभी विशेष चैकन्ने थे। उनके स्वागत की तैयारी में चारो तरफ खूब गहमागहमी थी।
अचानक मुख्य द्वार के पास शोर सुनाई दिया। पंड़ित जी आ गए... पंड़ित जी आ गए... लोग बड़े उत्साह से उन्हें लेकर मंच की ओर जाने लगे। मगर पंड़ित जी ने मना कर दिया। मंच पर उस समय रामलीला चल रही थी और प्रधानमंत्री जी कुछ देर बैठकर उसका आनन्द लेना चाहते थे।
उनकी ऐसी इच्छा देख आयोजकों ने उनसे ज्यादा नहीं कहा। यह तो और भी अच्छा था कि वे खुद ही वहां रूकना चाहते थे।
मंच पर उस समय युद्ध का दृश्य चल रहा था। जब देश के प्रधानमंत्री दर्शक दीर्घा में मौजूद हांे तो कलाकार भी अतिरिक्त उत्साह के साथ अपना प्रदर्शन दिखा रहे थे।
तभी अचानक किसी असावधानी से किनारे पर लगे टैंट में आग लग गई। सभी की नज़र सामने मंच पर थी सो पहले तो किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। मगर जब धुआं और लपटें तेज हुईं तो एकदम से भगदड़ मच गई।
हरिश्चंद ने तुरंत आगे बढ़कर प्रधानमंत्री जी को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और फिर दौड़ता हुआ कनात के बांस पर चढ़ गया। अपने चाकू को निकाल कर उसने कनात के जलते हुए हिस्से को काटना शुरू कर दिया। लोगों के देखते-देखते धुएं और आग के बीच घिरे उस लड़के ने वह जलता हिस्सा काट कर अलग गिरा दिया। जिससे आग आगे नहीं बढ़ सकी।
अब तक अपनी जान बचाकर इधर-उधर भाग रहे लोग पलट कर आ गए। जल्दी ही आग पर काबू पा लिया गया। आग में घिर कर हरिश्चंद के हाथ  घायल हो चुके थे, और धुएं के कारण उसे बेहोशी भी आ गई। उसे तुरंत हास्पिटल ले जाया गया। जहां उसको प्राथमिक उपचार दिया गया।
दो दिन बाद उसके स्कूल में सूचना आई कि प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहरलाल नेहरू उस बच्चे को सम्मानित करेंगे। जिसने उनकी आंखों के सामने बहादुरी दिखाते हुए न केवल उन्हें बचाया बल्कि अपनी जान की परवाह न करते हुए आग बुझाकर वहां उपस्थित लोगों की प्राणरक्षा भी की।
उस समय प्रधानमंत्री जी तीनमूर्ति भवन में रहते थे। वहीं एक सादे किंतु महत्वपूर्ण कार्यक्रम में प्रधानमंत्री जी ने हरिश्चंद मेहरा को सम्मानित करते हुए कहा कि मैं इस बालक की बहादुरी की घटना का चश्मदीद गवाह हूँ। देश के अन्य भागों में भी बच्चे ऐसे बहादुरी और साहस के कारनामें करते रहते होंगे, मगर वे सामने नहीं आ पाते। ऐसा होना चाहिए कि उनकी बहादुरी देश के सामने आए। लोग उन्हें जानें।
बस तभी से राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार की शुरुआत हो गई। सारे देश से अठारह साल से कम आयु के किसी बच्चे को जो अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों की जान बचाने के लिए असाधारण वीरता का प्रदर्शन करता है। उस घटना के प्रमाण भारतीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली को उचित माध्यम से भेजे जाते हैं। एक उच्च स्तरीय कमेटी इसकी जांच कर उनके राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार की घोषणा करती है। गणतंत्र दिवस से पूर्व प्रधानमंत्री जी स्वयं उन्हें सम्मानित करते हैं। देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग इन बच्चों से मिलकर इन्हें प्रोत्साहित करते हैं। ये वीर बच्चे गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होते हैं।
मित्रो,
हम नन्हे-नन्हें बच्चे हैं, हम काम कर रहे बड़े-बड़े,
हिम्मत कर आगे कूद पड़े,जब देख रहे थे बड़े खड़े,

कब चाहा हमने पुरस्कार,जो मिला हमें तो अच्छा है,
लेकिन जो सच्ची खुशी मिली,वो पुरस्कार ही सच्चा है,

सब अपनी धुन के मतवाले, मंज़िल तो पाएंगे ही हम,
पर दिल का है अरमान यही,हिम्मत का ऊँचा हो परचम,

अनगढ़  पथरीले  हीरे  हैं, सब  दूर  करेंगे  बाधाएं,
कब रोक सके हैं हमें भला क्या बंधन हों क्या सीमाएं?

दीदी हमें बचा लो

दिन के करीब तीन बजे का समय था। छुट्टी के बाद बच्चे स्कूल वैन में बैठकर घर जा रहे थे। वैन अभी रास्ते में थी। अचानक वैन में बैठे सभी बच्चे चैंक पडे। उन्हें सामने से शोर सुनाई दिया। एक आदमी साइकिल पकड़े आगे - आगे भागता चला आ रहा था। उसके पीछे लोगों की भीड़ शोर मचाती उसकी ओर पत्थर फेंकती चली आ रही थी। वैन के पास आते ही उसने साइकिल को वैन के ठीक सामने डाल दिया। अचकचाकर ड्राइवर ने वैन में ब्रेक लगा दिया।
Story Workshop

वैन के रुकते ही वह व्यक्ति दौड़कर वैन में चढ़ गया। अब वह तेजी से ड्राइवर की सीट की ओर बढ़ा। उसके हाथ में एक पिस्तौल नजर आ रहा था। जिसे उसने वैन में चढ़ते ही अपनी जेब से निकाल लिया था। उसके हाथ में पिस्तौल देखकर पीछा करने वाली भीड़ डर कर रुक गई।
उसने वह पिस्तौल ड्राइवर के सिर पर लगाते हुए कहा - ‘जल्दी से बैक करके वैन को ले के चलो।’
पहले तो ड्राइवर ने मना किया लेकिन जब उसने पिस्तौल को सिर में मारते हुए फिर धमकाया तो घबराकर ड्राइवर ने वैन पीछे घुमाई और तेजी से आगे की ओर बढ़ा दी। वैन में पहली और दूसरी कक्षा के दस बच्चे बैठे थे। उसमें से एक ड्राइवर का बेटा भी था जो आगे बैठा था। एक आठवीं कक्षा की छात्रा गुंजन शर्मा भी वैन में थी जो कि पिछली सीट पर बैठी थी। मगर गड़बड़ होती देख वह पीछे से वैन में आगे आ गई।
अब वैन के सामने कोई नहीं था। वैन सड़क पर तेजी से भागी चली जा रही थी। पुलिस वैन का पीछा करने लगी थी। पकड़े जाने के डर से वैन के अपहरणकर्ता ने ड्राइवर से वैन को तेज और तेज चलाने के लिए कहा। वैन जब आगे एक चेकपोस्ट के पास से गुजरी तो वैन को इस बुरी तरह भागता देख एक सिपाही ने वैन रोकने के लिए कहा।
यह देख वह व्यक्ति चीखा - ‘हट जाओ सामने से’ ... और यह  कहते कहते उसने पिस्तौल का रुख सामने किया और गोली चला दी। हड़बड़ी में वह गोली वैन में अंदर ही टकराई उसके छर्रे बिखर गए। उनमें से एक टुकड़ा गुंजन के हाथ में आ गिरा। उसने घबराकर उसे नीचे फेंक दिया। लगता उस व्यक्ति के सिर पर खून सवार था। पुलिस वाला डरकर पीछे हट गया।
आगे नागालैंड का बार्डर था जहाँ घने जंगलों का सिलसिला शुरू होता था। जब वैन जंगल के करीब से गुजरने लगी तो अपहरणकर्ता ने ड्राइवर को वैन वहीं एक किनारे पर रोक देने को कहा। ड्राइवर ने तुरंत वैन रोक दी।
अपहरणकर्ता तेजी से वैन से उतरने के लिए लपका। वैन से उतरते हुए अचानक कुछ सोचकर वह अंदर की ओर मुड़ा और उसने दो नन्हीं बच्चियों को पकड़ लिया। इस तरह अजनबी व्यक्ति द्वारा पकडने पर वे दोनों बच्चियां जोर - जोर से रोने लगीं। वैन में सवार अन्य बच्चे भी सहम गए।
‘ऐ चुप्प’ - अपहरणकर्ता गुर्राया।
कोई उपाय न देख वे गुंजन की ओर निरीह दृष्टि से देखती हुई चिल्लाईं - ‘बा आमक भोसुआ आमि की करी। मान टू एवक मारी दीवा’
गुंजन को लगा कि जैसे यह पुकारने वाली रोती हुई प्यारी  बच्ची अनुष्का न होकर उसकी छोटी बहन नैन्सी है जो उससे मदद के लिए गुहार लगा रही है - ‘बचा लो न दीदी ये आदमी हमें मार देगा।’
गुंजन एकदम से आगे बढ़ी और उस व्यक्ति से बोली -‘अंकल, इन दोनों को छोड़ दो मुझे ले चलो मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ।’
कहते कहते उसने ड्राइवर की ओर इस आशा भरी नज़र से देखा कि उस समय वैन में उन सबसे बड़ा था शायद वह उनकी कोई मदद करेगा।
अपनी ओर गुंजन को ताकता हुए देख ड्राइवर बोला - ‘चली जाओ चली जाओ, कुछ नहीं होगा, ये तुम्हें छोड़ देंगे।’
गुंजन को एकबारगी बड़े जोर का गुस्सा आया। जिसे वह बड़ा समझ रही थी वह कितना छोटा निकला। बजाय बचाने के वह उसे खुद खतरे में जाने के लिए कह रहा था।
पुलिस पीछे आने वाली थी। अपहरणकर्ता के पास ज्यादा सोचने का समय नहीं था। उसने तत्काल गुंजन का हाथ पकड़ा और वैन से नीचे कूद गया।
वह गुंजन को लेकर सीधा उस घने जंगल में घुस गया। पुलिस द्वारा पकड़ लिए जाने के डर से वह तेजी से भागता चला जा रहा था जबकि तेरह साल की गुंजन उसके पीछे घिसटती चली जा रही थी। काँटेदार झाड़ियों में उसके कपड़े फँसते अटकते जा रहे थे। मगर वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह जल्दी से जल्दी आसाम पुलिस की पहुँच से दूर नागालैंड की सीमा में घुस जाना चाहता था।
कुछ देर बाद पेड़ों और झाड़ियों की घनी सीमा थोड़ी कम हुई क्योंकि आगे एक नदी थी। उसने बजाय सीधे रास्ते से जाने के जहाँ ज्यादा पानी भरा था वहाँ से गुंजन को लेकर जाना पसंद किया। उसने गुंजन को पानी में डुबा दिया और फिर उसे पानी में ही खींचता हुआ नदी पार करने लगा। शायद वह इस तरह अपने पावों के निशान न छोड़कर पीछे आनेवाली पुलिस का ध्यान बँटाना चाहता था। इसका पता तब और लगा जब उसने गुँजन की एक बाँह पकड़ कर आगे बढ़कर झाडियों के बीच एक बड़ा सा 8 बनाया। उसका इरादा न केवल पुलिस को बल्कि उसके साथ आने वाले कुत्तों को भी कनफ्यूज करने का था। काँटेदार झाड़ियों और मच्छर तथा कीड़ों के बीच इस तरह बेदर्दी से घसीटे जाने से गुंजन की चीख निकल गई। उसके कपड़े कई जगह से फट गए और शरीर में काँटे चुभ गए।
मगर अपहरणकर्ता ने इस बात की कोई परवाह न की। काफी देर चलने के बाद आगे बढ़ते - बढ़ते वह बाँसों के एक झुरमुट के नीचे रुका । अब तक वह स्वयं भी काफी थक चुका था। उसने गुंजन को वहाँ बैठाया और खुद भी लंबी - लंबी साँसें लेने लगा।

उसने गुंजन से कहा - ‘सुनो लड़की! अभी थोड़ी देर यहाँ बैठो। जब पुलिस ढूँढ़ कर चली जाएगी तो मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूँगा।’
काफी समय हो गया, अँधेरा घिर आया। 2013 की चार दिसंबर की वह रात अब गहराने लगी थी।
उधर पुलिस और तमाम लोग चुप नहीं बैठे थे। रात करीब डेढ़ बजे के करीब अचानक हलचल सी हुई। टार्च की रोशनियाँ चमकने लगीं और ‘गुंजन’ ‘गुंजन’ पुकारने की आवाजें पास आतीं जा रहीं थीं।
जबाब में गुंजन ने जैसे ही आवाज़ देनी चाही अपहरणकर्ता ने अपनी जेब से एक दूसरी पिस्तौल निकाली। उसने उसमें से कुछ गोलियां निकाल कर पहली पिस्तौल में डालते हुए उसको चुप रहने का इशारा किया। साथ ही उसके मुँह में पिस्तौल डालते हुए फुसफुसाया - ‘ अगर आवाज़ निकली तो इस पिस्तौल से भी आवाज़ निकलेगी।’ उसने दोनों पिस्तौलों से गुंजन को कवर किया हुआ था।
मुँह के अंदर पिस्तौल पड़ी होने के कारण गुंजन बोलने की स्थिति में नहीं थी। दोनों दम साधे बाँसों के झुरमुट के बीच पडे रहे और ढ़ूँढ़नेवाले पास से ढ़ूँढते हुए निकल गए।
जब वे कुछ दूर निकल गए तो अपहरणकर्ता ने गुंजन के मुँह से पिस्तौल निकाली और उससे कहा -‘तुम चुपचाप बिना आवाज़ किए यहीं शांत बैठी रहो।़ मैं अभी थोड़ी देर में लौटकर आता हूँ।’
गुंजन ने हाँ में सिर हिलाया तो अपहरणकर्ता ‘गुंजन’ ‘गुंजन’ की आवाज़ लगाता हुआ आगे जाकर उसी भीड़ में जा मिला।
गुंजन कुछ देर तक तो अपहरणकर्ता का इंतजार करती रही। मगर इसके बाद थकान और नींद से उसकी आँखें भारी होने लगीं। उसने सुन रखा था कि इस जंगल में हाथी और दूसरे खतरनाक जानवर भी रहते हैं मगर इस समय नींद के आगे उसके सारे डर दूर हो गए और अंधेरे में झाड़ियों के बीच वह सो गई।
सुबह जब आँख खुली तो उसने देखा कि अपहरणकर्ता अभी तक वापस नहीं आया था। गुंजन वहाँ से घर जाने के लिए जंगल से बाहर निकली। काफी देर इधर - उधर भटकने के बाद उसे कुछ चाय के बागान दिखाई दिए। जब वह बागान को पार कर रही थी तभी उसने कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनी तो वह उसी ओर चल दी।़ जहाँ आगे एक झोपड़ी दिखाइ्र दी जिसमें उसे कुछ लोग मिले।
गुंजन ने उनसे पूछा - ‘अंकल मेन रोड का रास्ता किधर है बता दें, मुझे अपने घर जाना है।’
उन लोगों ने जब एक लड़की को ठंड में भीगे कपड़ों में ऐसी बुरी हालत में देखा तो उसे आग के पास बैठाया। उसके लिए चाय बनाई और पुलिस को खबर कर दी।
खबर मिलते ही जोरहाट और डिब्रूगढ़ से पुलिस के बड़े अधिकारी वहाँ आ गए। उन्होंने बहादुर गुंजन को गले से लगा लिया। जिसने दो नन्हें बच्चों को बचाने के लिए खुद को अपहरणकर्ता को सौंप दिया था। दिसंबर की कड़ाके की ठंड में सारी रात घने जंगल में रही। भीगे कपड़ों में खतरनाक जानवरों के बीच... कई पुलिस अधिकारी की आँखें उसकी दिलेरी पर भर आईं।
आसाम के मुख्यमंत्री ने उसे दो लाख रुपए का पुरस्कार दिया।
उन्होंने प्रदेश स्तर पर प्रतिवर्ष ऐसी बहादुरी दिखाने वाले बहादुर बच्चे को ‘गुंजन शर्मा वीरता पुरस्कार’ दिए जाने की घोषणा भी की। गुंजन को देश के प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया गया।

नन्हें दोस्तो,

साहस कर आगे तो आओ, कदमों में आएगी मंज़िल,
मिल जाएगा हर मनचाहा, चाहोगे, होगा सब हासिल,
खो सकता है कूल किनारा, बने रहे ग़र यूँ ही गाफिल,
जीतेगा हर बाजी अपनी, हिम्मत का सरताज, मेरा दिल,

राजू का सपना

आज शनिवार था। शाम के पाँच बजते ही राजू बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच गया। उसके दोस्त सलीम, स्टेला और नंदिनी वहाँ उसका इंतजार कर रहे थे।
राजू के आते ही सबने मिलकर उसे घेर लिया।
राजू ने भी सबका मन देखकर बिना किसी भूमिका के कहना शुरू कर दिया।
  ‘दोस्तो, इस बार जब मेरी आँख लगी तो मैंने खुद को एक सुंदर बगीचे में पाया। पुराने समय के महात्मा के आश्रम जैसा था वह बगीचा। अभी यह सोच ही रहा था कि ये मैं कहाँ आ गया कि तभी मुझे एक मीठी सी आवाज सुनाई दी -‘अरे राजू तुम यहाँ कैसे ? सब ठीक तो है ? मैंने अपने चारों तरफ नजर घुमाकर देखा तो मुझे अपने आसपास कोई नहीं दिखाई दिया। मैं हैरान था कि आखिर मुझे ये बुला कौन रहा है।
वही आवाज फिर सुनाई दी, -‘तुम्हारे बाकी सब दोस्त कैसे हैं’ ?
मैं जब हैरान हुआ तो वही आवाज फिर से आई -‘परेशान क्यों हो राजू, देखो मैं इधर हूँ, पेड़ की डाल पर’
मैंने जो ऊपर सिर करके पेड़ की डाल की ओर देखा तो वहाँ एक हरे रंग का तोता बैठा था।
तभी एक नन्हा लंगूर दौड़ता हुआ वहाँ आया और उसने पीछे से मेरे कपड़ों को पकड़ कर अपनी ओर खींचा और मुझे एकदम से धक्का दे दिया। अचानक हुए हमले से मैं लड़खड़ा गया।
अरे अरे, मीकू यह क्या कर रहे हो ? - मिट्ठू ने जोर से चिल्लाते हुए कहा।
‘मुझे मत रोको मिðू भइया,मैं इन्हें मारूँगा। इन लोगों ने मेरे मम्मी पापा को कैद करके रखा हुआ है।’ - मीकू गुस्से से चिल्लाया।
‘नहीं नहीं मीकू तुम्हें गलतफहमी हुई है। राजू ऐसा लड़का नहीं है।
 सभी इंसान एक जैसे नहीं होते।’ - मिðू ने मीकू को समझाते हुए कहा।
‘नहीं नहीं मुझे तो सब एक से लगते हैं। मैं जहाँ भी जाता हूँ। ये सारे मुझे चिढ़ाते हैं,पत्थर मारते हैं। आज जब मेरा बदला लेने का मौका आया तो मिट्ठू भैया तुम मुझे रोक रहे हो। यह ठीक बात नहीं है।’- मीकू ने मिट्ठू की ओर देखते हुए गुस्से से कहा।
‘देखो मीकू मैं अक्सर शहर की ओर जाता रहता हूँ। राजू और उसके दोस्तों को मैं जानता हूँ। ये लोग बेसहारा पशु और पक्षियों की मदद करते रहते हैं। कभी किसी बेजुबान जानवर को नहीं सताते बल्कि जो ऐसा करते हैं उन्हें रोकते भी हैं।
‘अच्छा ऐसा क्या ?’ - मीकू ने चैंकते हुए कहा।
लेकिन मीकू के मम्मी पापा को किसने कैद करके रखा है और कहाँ? - मैंने मिट्ठू से पूछा।
केओ मोर ने कहा - ‘मैं बताता हूँ, दरअसल पास में ही आमों का एक बहुत खूबसूरत बाग है। जब आम का मौसम आता तो आमों के बौर की खुश्बू सबको पागल बना देती। जैसे ही उसमें आम आना शुरू होते, बंदरों का झुंड उस बाग में आकर उत्पात करने लगता, वे सारा बाग उजाड़कर तहस-नहस कर देते। बाग का मालिक और रखवाले सिर्फ हाथ मलकर देखते रहते। इतने सारे बंदरों की फौज के सामने वे असहाय हो जाते।
जब सब तरह से उपाय कर वे हार गए तो वे उन बंदरों से बचने के लिए इस मीकू लंगूर के मम्मी पापा को लेकर आए। अब इनके मम्मी पापा के डर से एक भी बंदर वहाँ नहीं फटकता। हम सब अब बाग में जाते हैं तो खुश हो जी भर कर नाचते हैं।’
मैंने कहा - ‘अरे यह तो बडी मजेदार बात तुमने बताई केओ भाई। मीकू के मम्मी पापा ने तो बड़ा ही अच्छा काम किया। क्या बाग के रखवाले मीकू के मम्मी पापा को सताते हैं?’
‘नहीं वे तो बड़े प्यार से रखते हैं। हमें तो खाने की खोज में इधर - उधर भटकना पड़ता है परंतु इसे और इसके मम्मी पापा को तो वहीं पर एक से एक अच्छी चीजें खाने को मिलती हैं।’-मिट्ठू ने बीच में बोलते हुए कहा।
‘तो फिर, मीकू की नाराजगी ?’ - मैंने हैरान होकर प्रश्न पूछा।
‘बस, जब वे मीकू के पापा को घूमने के लिए खुला छोड़ते तो उस समय वे मीकू की मम्मी को बंधा रखते और जब मीकू की मम्मी को खुला छोड़ते हैं तो .... - इतना कह कर केओ मोर ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
‘आजादी चाहिए उन्हें आजादी’ - फट सा पड़ा था मीकू।
मीकू भावुक होते हुए आगे कहने लगा - ‘मैंने अपनी माँ को रोते हुए देखा है। वे कहतीं हैं हमें भी जंगल में अपनी मर्जी से अपने परिवार के साथ घूमने का हक मिलना चाहिए।’
राजू ने कहा- मीकू की बात सुनकर और कोई बोलता इससे पहले मिट्ठू ने कहा -‘जीवन में सब कुछ सबको नहीं मिलता, मीकू तुम्हें तो गर्व होना चाहिए कि तुम्हारे मम्मी पापा कितना अच्छा काम कर रहे हैं। वे इंसानों की मदद कर रहे हैं और साथ ही साथ हमारे साथी बंदरों द्वारा उनके बाग को उजाड़े जाने के हम लोगों के कलंक को भी धो रहे हैं।’
‘उजड़े तहस-नहस हुए बाग में तो हमारा भी नाचने का मन नहीं होता, मैं भी तुम्हारे मम्मी पापा का शुक्रगुजार हूँ मीकू।’ - केओ मोर ने भी मीकू को समझाते हुए कहा।
इस पर मैंने कहा - ‘इस तरह किसी को भी बंधन में रखना ठीक नहीं है। हम इंसानों की दुनिया में तो इसके खिलाफ कानून बने हैं। मैं एक पशु पक्षियों की रक्षा करने वाले स्वयंसेवी संगठन का पता जानता हूँ, यहाँ से जाकर मैं उन्हें सूचित करूँगा और इस विषय में कार्यवाही कर मीकू के पापा मम्मी को आजाद करवाऊँगा।’
‘हुर्रे’ क्या सचमुच ऐसा हो सकता है’? - मीकू ने खुशी से उछलते हुए कहा।
हाँ,हाँ, क्यों नहीं, राजू सचमुच ऐसा कर सकता है।’ -तभी मिट्ठू ने मेरा पक्ष लेते हुए कहा।
‘अगर ऐसा हुआ तो मैं वादा करता हूँ, कि अपने मम्मी पापा के साथ मैं खुद मोर्चे पर डटूँगा और मौसम आने पर एक भी बंदर को इस या ऐसे किसी बाग के पास तक नहीं फटकने दूँगा।’
‘इस तरह तो सबका काम बन जाएगा।’-वहीं फूल पर बैठी एक नन्ही पीले रंग की तितली ने अपनी महीन और प्यारी आवाज में जब यह कहा तो सब खुशी से झूम उठे।’
अभी मैं उनसे यह प्रश्न पूछने ही जा रहा था कि वे सब इंसानों की भाषा में कैसे बात कर रहे हैं। अचानक मुझे एक आवाज सुनाई पड़ी -‘राजू,... राजू,... सोते ही रहोगे, स्कूल नहीं जाना है आज क्या ? अरे यह तो मेरी मम्मी की आवाज है।
वे मुझे उठा रहीं थीं। तब मुझे लगा अरे मैं तो एक सपना देख रहा था।
‘हत्तेरे की...’- कमल बुरा सा मुँह बनाकर बोला।
‘लेकिन अधूरा होते हुए भी ये सपना पूरा था।’-नंदू ने कहा।
‘राजू के इस सपने को हम सब दोस्त मिलकर पूरा करेंगे। आओ आज से संकल्प लें कि किसी जानवर या पक्षी को नहीं सताएंगे।’ -स्टेला ने कहा।
‘और जो ऐसा करेगा उसका विरोध करेंगें’- विक्टर ने कहा।
‘किसी को इन बेजुबानों पर अत्याचार भी नहीं करने दंेगे।’- कहते हुए जब राजू ने अपना हाथ आगे बढ़ाया तो सबने उस हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
राजू ने देखा उसके सभी दोस्तों की आँखों में दृढ़निश्चय की चमक थी।


 

गर्मी की छुट्टी

उदित, नंदू, नंदिनी और सुनयना को गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार था। क्योंकि इस बार उन्हें उनके ताऊजी ने गर्मी की छुट्टियां दिल्ली में आकर बिताने का आमंत्रण दिया था। जैसे ही छुट्टियों की तारीखों का पता चला उदित और नंदू उछल पड़े। मगर घर आकर उन्हें पता चला कि नंदिनी और सुनयना के स्कूलों की छुट्टियां कुछ दिन बाद होंगी। वे निराश हो गए। इसी बीच ताऊजी का फोन आया कि क्या तैयारी है ? जब उन्हें नंदिना और सुनयना की छुट्टियों के बारे में पता चला तो वे बोले-‘कोई बात नहीं। मैं तुम सबका ट्रेन से रिजर्वेशन करा देता हूं तुम लोग अपनी मम्मी के साथ आ जाना उदित, नंदू खुश हो गए। अब उनके पास समय था। उन्होंने इस बीच झटपट स्कूल द्वारा दिए गए छुट्टियों के काम को पूरा कर लिया।

पंद्रह दिन बाद नियत समय पर तैयार होकर वे सब ट्रेन में सवार होकर दिल्ली आ गए। दिल्ली में पड़ने वाली भयंकर गर्मी से एक पल निजात नहीं थी। उन्हें गांव के वे हरे-भरे वृक्ष और उनके नीचे की वो शीतल छांव याद आई। शुक्र था कि यहां गांव की तरह बिजली की आंखमिचैली नहीं थी।

ताऊजी के सामने भी समस्या थी कि दिल्ली में दर्शनीय स्थानों की तो भरमार थी मगर इस गर्मी में बच्चों को कौन से स्थान घुमाएं? घर से निकलते ही तेज धूप और बढ़ते पारे की तपिश घूमने का सारा मजा किरकिरा कर देती। मगर उन्होंने इसका हल पहले से ही निकाल रखा था। इसीलिए उन्होंने सभी बच्चों से अपने फोटो और स्कूल का पहचान पत्र लेकर दिल्ली आने को कहा था। अगले दिन ही उन्होंने कहा कि सभी अपने फोटो और पहचान पत्र ले लें हम सब राष्ट्रीय बाल भवन चल रहे हैं।

उदित ने पूछा-‘ताऊजी ये बाल भवन क्या है?
’
ताऊजी ने बताया-‘बाल भवन देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा बच्चों को दिया गया उपहार है। इसमें लगभग वह सब कुछ है जो तुम अपने लिए सोच सकते हो।’
सबके मन में उत्सुकता थी। तभी सुनयना ने अपनी नन्हीं आवाज में पूछा-‘उसमें क्या-क्या है ताऊजी?

ताऊजी ने मुस्कराते हुए कहा-‘सुनयना, अभी नहीं बताऊँगा। अब जब तुम आ गए हो तो खुद ही चल कर देख लेना। अब ज्यादा बातें न करो सड़कों पर टैªफिक हो जाएगा हमें जल्दी निकलना है।’

बाल भवन में घुसते ही उनका सामना नन्हीं टेªन की पटरी से हुआ। जिसके सहारे चलते-चलते वे शीध्र ही छोटे से रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंच गए।
‘ताऊजी, हम भी ट्रेन पर बैठेंगे।’-नंदिनी ने पूछा तो सबके कान उत्तर सुनने को तैयार हो गए।
‘हां, हां, क्यों नहीं अभी लो टिकट तो ले लो जरा’- ताऊजी की बात सुनते ही सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे। अब उन्हें टेªन के आने की प्रतीक्षा थी। थोड़ी देर में बाल भवन के अंदर का चक्कर लगाकर आ गई। वे तेजी से दौड़कर उसमें चढ़े और सीट पर बैठ गए। जरा सी देर में ट्रेन ने एक जोरदार सीटी मारी और प्लेटफार्म छोड़ दिया।
अचानक नंदू ने सुनयना से कहा- ‘देखो दीवारों पर कैसे सुंदर चित्र बने हुए हैं।’
सुनयना के साथ अन्य कई बच्चों की नज़र भी उस ओर घूम गई।

उन्होंने देखा कि भारत के विभिन्न राज्यों के दर्शनीय स्थलों और वहां की विशेषताओं के चित्रों से दीवारें सजी हुई हैं।  वे इस ट्रेन के माध्यम से पूरे भारत की सैर कर रहे थे। तभी ट्रेन एक सुरंग से होकर गुजरी। रोमांच में कई बच्चे सीटी और तालियां बजाने लगे। कुल मिलाकर यह सफर बहुत रोमांचक रहा।

ट्रेन से उतर कर वे रजिस्ट्रेशन काउंटर की ओर बढ़े। फार्म भर कर जब उसमें फोटो लगाने की बात आई तो पता चला कि नंदू का एक फोटो तो घर पर ही छूट गया। अब क्या हो?
उदित नंदिनी और सुनयना ने अपने मनचाही गतिविधियों को चुन लिया। उदित ने   क्रिकेट और वाद-विवाद में, नंदिनी ने पेंटिंग और लोकनृत्य में और सुनयना ने शतरंज और फोटोग्राफी में भाग लिया। अपने-अपने मनचाही रूचि की गतिविधियों में भाग लेकर वे बहुत खुश थे। उनके जैसे अनेक लड़के और लड़कियां वहां मनचाही गतिविधियों में भाग ले रहे थे। उदित नंदिनी और सुनयना को बहुत मजा आया।

उस दिन तो नंदू ने बाल भवन को घूमकर देखा और पुस्तकालय में किताबें पढ़ी अगले दिन उसने भी अपनी मनचाही गतिविधि बैडमिंटन और कम्प्यूटर में भाग ले लिया।

इसी बीच लाइब्रेरी वाली नीता मैम ने बताया कि एक पांच दिन की कहानी सुनाने की कार्यशाला शुरू होने जा रही है। कहानी सुनने और सुनाने में तो सभी का मन लगता था सो उन्होंने झट से अपना नाम उसमें लिखवा दिया। उस कार्यशाला में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उदित और नंदिनी को चुन लिया गया। अब उन्हें हजारों बच्चों के बीच आने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर बाल भवन में होने वाले कार्यक्रम को संचालित करना था। इतने बड़े अवसर के मिलने पर वे बहुत खुश थे। उन्होंने तैयारी शुरू कर दी। फिर वह अवसर भी आया तो मौके पर सुन्दर प्रस्तुति देकर उन्होंने सबकी वाहवाही लूटी। अब बालभवन के ग्रीष्मकालीन गतिविधियों का समापन हो चुका था।

एक दिन ताऊजी ने कमल मंदिर, इस्कान मंदिर और अक्षरधाम मंदिर के दर्शन कराए। इसी के साथ वे इंडिया गेट के पास चिल्ड्रेन पार्क भी गए। वहां लगे तरह-तरह के सुंदर झूलों में झूलकर वे बहुत खुश हुए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन और संसद भवन की इमारतों को नजदीक से देखा। अब उनके वापसी का समय नजदीक आता जा रहा था कि तभी एक दिन ताऊजी ने उन्हें बताया कि कल हम सब आकाशवाणी दिल्ली के बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेने चलेंगे। सबको कोई न कोई कहानी या कविता सुनानी होगी।

वे सब बहुत खुश हुए। ये उनके लिए एक अनूठा अनुभव था। अगले दिन आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र पर पहुंचकर उन्होंने अपनी कविताएं और कहानियां सुनाईं। उन्हें यह देखकर और भी अच्छा लगा कि उसी दिन प्रधानमंत्रीजी का कार्यक्रम ‘मन की बात’ भी वहीं से प्रसारित हो रहा था। आज शाम की ट्रेन से उनका वापसी का रिजर्वेशन था। इस बार उनके पास अपने दोस्तों को सुनाने के लिए बहुत कुछ था।  

ऐसे टला ट्रेन हादसा

उसकी उम्र चैदह साल थी और वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था। नाम था वेंकटेश्वर राव । नारागनी वेंकटेश्वर राव, सीधा सादा भोला भाला, गोल-मटोल मुँह चेहरे से मासूमियत टपकती हुई।
उस दिन रविवार था छुट्टीवाला दिन, इसलिए खाना खा-पीकर उसने एक बैटनुमा लकड़ी उठाई और घर से निकल लिया। बाहर उसके पड़ोस का दोस्त मिल गया। फिर क्या था दोनों चल दिए खेल के मैदान की ओर। वे आपस में बातचीत करते हुए चले जा रहे थे। घर के पास के छोटे रास्ते को पार करते हुए अब वे दोनों रेलवे ट्रैक के किनारे - किनारे चलने लगे। दरअसल रेलवे लाइन के उस पार खेल का मैदान था।
 सारे इलाके के बच्चे वहीं के खुले मैदान में खेलते थे। बड़े बच्चे क्रिकेट खेलते, छोटे बच्चे उसे देखते या खुद किसी छोटी मोटी टीम का हिस्सा बन जाते और किसी कोने में खेलने लगते। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही वहाँ बच्चों का जमावड़ा लग जाता।
बस खाने के समय या उससे कुछ पहले बच्चे वहाँ से फुरसत पाकर घर आ जाते। किसी के घर से स्वीकृति मिल जाती तो कोई चुपके से बहाने बनाकर आ जाता। जिन्हें देर हो जाती तब तक उनकी जगह दर्शकों में से किसी से भर जाती। आपके पास खेल का सामान हो या न हो तो भी आप वहाँ जा सकते हैं। आपको खेलने का अवसर मिलने की पूरी संभावनाएं होती हैं।
वेंकटेश्वर और उसके दोस्त तो अक्सर छुट्टी के दिन वहाँ जाते थे। उसके स्कूल ब्रहमपुर के अनेक लड़के वहाँ खेलने आते थे।उनके साथ वेंकटेश्वर को भी खेलने में अच्छा लगता था। इसी सिलसिले में अपनी व मित्रों की बातें करते हुए वे चले जा रहे थे।
तभी रेलवे ट्रेक के किनारे एक प्लास्टिक की खाली बोतल पर वेंकटेश्वर की नजर पड़ी। हाथ में पकड़ी लकड़ी से अनायास ही उसने उसमें चोट मार दी। बोतल लड़खड़ाती हुई आगे पत्थरों के पास गिरी। आगे बढ़कर उसने उसको फिर हिट किया तो हवा में उछलती बोतल रास्ते के बीचोंबीच गिरी। वेंकटेश्वर ने उसमें फिर लकड़ी की चोट मारी तो बोतल उड़ती हुई रेलवे ट्रेक के बिलकुल बीच में जा गिरी। वह उसे उठाने के लिए फिर आगे बढ़ा। अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था।
पहले उसने अपने दोस्त को ही बोतल उठाकर लाने के लिए इशारा किया। लेकिन उसके दोस्त ने मुँह पिचकाते हुए उससे कहा - ‘ छोड़ यार ! चलते हैं जल्दी, देर हो रही है।’
‘अभी चलते हैं’- कहता हुआ वेंकटेश्वर बोतल उठाने के लिए ट्रैक के बीच पहुँचा।
अचानक उसकी नजर पटरी के बीच पड़े खाली स्थान पर गई। पटरी के बीच कम से कम छह इंच का टुकड़ा था ही नहीं । उसने जल्दी से अपने मित्र को पास बुलाकर दिखाया और कहा - देख, इससे तो दुर्घटना हो सकती है। हमें इसकी खबर केबिन मैंन को करनी चाहिए।’
उसका दोस्त झुँझला गया और बोला - ‘ट्रैक टूटा है तो टूटा रहे, हमें क्या? चलो खेलने चलते हैं।’
‘नहीं’ हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।’ मैं तो जाऊँगां’। - वेंकटेश्वर बोला।
‘तो तू जा, मैं तो चला खेल के मैदान में, खबर करके वहीं आ जाना।’ - उसका दोस्त यह कहकर आगे बढ़ गया।
वेंकटेश्वर उस भयावह पल की कल्पना करके काँप गया, जब उस ट्रैक पर कोई गाड़ी आ जाएगी और दुर्घटना हो जाएगी। अगर उसने समय रहते यह सूचना न पहुँचाई तो उस संभावित भयंकर दुर्घटना का जिम्मेवार वह स्वयं को समझेगा।यह सोचकर वह तेजी से केबिन की ओर दौड़ पड़ा।
केबिन उससे एक सौ पचास गज की दूरी पर था। वह दौड़ता हुआ केबिन के निकट जा पहुँचा। उसे उस समय वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज भी लगाई,मगर कोई उत्तर न पाकर वह वहाँ से आगे की ओर दौड़ गया।केबिन मैन शायद वहाँ नहीं था या संभवता उस तक बच्चे की आवाज नहीं पहुँच पाई। जो भी हो।
अब वेंकटेश्वर आगे ही आगे दौड़ता चला जा रहा था। उसका लक्ष्य पेड़ना रेलवे स्टेशन था जो वहाँ से सामने दिखाई दे रहा था। उसके पैरों में मानो पंख लग गए। जब वह हाँफता हुआ प्लेटफार्म पर चढ़ा तो उसकी नजर सीधी स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर थी।
उसे तेजी से इस तरह भागते देख कई लोग उसकी ओर देखने लगे क्योंकि उस समय कोई ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं थी। मगर उसने उन सब की परवाह नहीं की। जब वह धड़धड़ाते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसा तो कुर्सी पर बैठे स्टेशन मास्टर चैंक गए और प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगे।
वेंकटेश्वर के मुँह से टूटे - फूटे शब्दों में निकला - ‘वह... वहाँ...टूटा है।’
स्टेशन मास्टर ने पूछा - ‘अरे’ जरा साँस तो ले लो। क्या कहाँ टूटा है ?’
इतनी देर में अपनी साँसों को व्यवस्थित करते हुए वेंकटेश्वर स्टेशनमास्टर से फिर बोला -‘ट्रैक... ट्रैक टूटा है आगे, आने वाली गाड़ी को रोक दो।’
स्टेशनमास्टर ने चैंकते हुए पूछा - ‘कहाँ, किस जगह की बात कर रहे हो?’
‘यहीं केबिन से थोड़ा आगे,पटरी के बीच खाली जगह है।’ - वेंकटेश्वर के स्वर में दृढ़ता थी।
स्टेशन मास्टर ने एक नजर अपनी घड़ी पर डाली फिर वेंकटेश्वर की ओर देखा उन्हें लगा, हो न हो ये लड़का सच बोल रहा हो। अभी गुड़िवाड़ा पैसिंजर के आने में समय है। तब तक ट्रैक की जाँच करवा लेते हैं।
स्टेशन मास्टर को सोच में पड़े देख वेंकटेश्वर ने एक बार फिर कहा - ‘सर, आने वाली ट्रेन को रोक दो।’उसे लगा बच्चा समझकर स्टेशन मास्टर उसकी बात पर कहीं ध्यान न दें।
स्टेशनमास्टर तेजी से एक्शन में आ गए उन्होंने तुरंत ट्रैक की जांच करने वाले कर्मचारियों को बुलाया। फिर वेंकटेश्वर की ओर इशारा करते हुए कहा - ‘इस लड़के के साथ जाओ और देखो, ट्रैक कहाँ खराब है। केबिन के आगे ट्रैक में कहीं कोई गड़बड़ है। जल्दी देखकर मुझे सूचना दो। गुड़िवाड़ा पैसिंजर आने वाली है। मैं यहाँ तुम्हारी खबर का इंतजार कर रहा हूँ।
 वेंकटेश्वर उनके साथ तुरंत चल पड़ा। उसे खुशी थी कि स्टेशन मास्टर ने उसकी सूचना पर एकदम भरोसा नहीं किया तो उसे गलत भी नहीं माना। उन्होंने तथ्यों की जाँच के लिए इन कर्मचारियों को उसके साथ भेज दिया। अब वह उन कर्मचारियों को बता रहा था कि कैसे वह केबिन मैन को बताने गया था मगर उनके न मिलने पर वह दौडता हुआ पेड़ना स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँचा।
बातों - बातों में वे केबिन से आगे उस स्थान तक आ पहुँचे। टूटे टैªेक को देखते ही रेलकर्मियों ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि वास्तव में वेंकटेश्वर की खबर बिलकुल सही थी। टैªेक में खराबी थी। आने वाली गाड़ी को रोक दिया जाए। स्टेशन मास्टर ने गुड़िवाड़ा से पेड़ना आ पहुँची, पैसेंजर ट्रेन को लाल सिग्नल दिखाकर रोका दिया।
 स्टेशन के पास तक आ पहुªँची ट्रेन के रुक जाने से यात्री उतर - उतर कर आने लगे। कारण जानने पर उन्हें पता लगा कि नन्हें साहसी बालक की सूझबूझ के कारण एक टेªन हादसा होने से बच गया। सभी वेंकटेश्वर की प्रशंसा करने लगे। लगभग एक घंटे बाद ट्रैक सही होने पर ट्रेन आगे बढी।
अगले दिन ‘वार्ता’ समाचार एजेंसी ‘आंध्र ज्योति’ ‘आंध्र भूमि’ ‘विशाल आंध्रा’ आदि अनेक समाचार पत्रों में वेंकटेश्वर की साहस और सूझबूझ की सराहना करते हुए घटना का विवरण प्रकाशित किया। पेड़ना की म्यूनिसिपल चेयरपर्सन पद्मजा कुमारी व उसके वार्ड कौंसलर वी. वेणुगोपाल राव ने वेंकटेश्वर के साहस को सलाम करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस परेड ग्राउण्ड में सारे जिले के गणमान्य लोगों के बीच वेंकटेश्वर की सूझबूझ धैर्य और हिम्मत की तारीफ करते हुए जिलाधिकारी के. प्रभाकर रेड्डी ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त तेरह बर्षीय बालक त्रिनाथ को भी याद किया, जिसने इसी प्रकार टूटे ट्रैक की सूचना सही समय पर देकर एक बड़ी दुर्घटना होने से बचाई थी।
विद्यालय के प्रधानाचार्य व जिलाधिकारी द्वारा वेंकटेश्वर का नाम भी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली भेजा गया। नारागनी वेंकटेश्वर राव को 2005 में यह पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी ने अपने हाथों से प्रदान किया।
नन्हे दोस्तो -
मुðी में हम किस्मत रखें, मंजिल पर हों अपने पाँव,
घर से दूर रहें या घर में,रहें शहर में या हो गाँव,
चाहे तूफाँ बिजली कौंधे, हो कैसी भी आगे बाधा,
मर्जी होगी अपनी पूरी,कर लें मन में अगर इरादा।




         

दूसरी आकाशगंगा से

शाम होते ही सलीम नंदिनी और स्टेला बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच गए। उन्हें राजू का इंतजार था। जो आज उन्हें अपना सपना सुनाने वाला था।
राजू ने आते ही कहा - ‘दोस्तोे, इस बार मेरी आँख लगी तो मैंने खुद को वीरान टापू पर पाया। चारांे ओर उभरी हुई पहाड़ियाँ.. सामने से आता सागर की लहरों का हल्का-हल्का शोर... अभी मैं सोच रहा था यह कौन सी जगह है, मैं यहाँ से बाहर कैसे जाऊँगा?
तभी सामने सागर की रेत से ऊँचे - ऊँचे बुलबुले उठने लगे। देखा कीचड़ से एक आकृति निकलकर बाहर आ रही है।
‘वह एक टेबिल लैंप की तरह थी। उसका चेहरा कीचड़ में पूरी तरह सना हुआ था। एकाएक उसके रोम -रोम से पानी के फुहारे से छूटने लगे जिसमें उसका पूरा शरीर धुल गया। वह एक विचित्र प्राणी था जैसा मैंने पहले नहीं देखा था।’
अचानक उसकी आवाज सुनाई दी - ‘कैसे हो राजू’?’
‘मैंने उससे डरते - डरते पूछा, ‘आप कौन हैं ?’ ‘आपको मेरा नाम कैसे पता?’
उसने जबाब दिया -‘राजू मुझे अपना दोस्त समझो।’
मैंने कहा -‘ऐसी अजीबोगरीब शक्ल का प्राणी मैंने पहले नहीं देखा।’
उसने मुस्कराते हुए कहा -‘राजू तुम्हारी पृथ्वी पर ऐसे अनेक जीव मौजूद हैं, जिन्हें किसी भी मनुष्य ने नहीं देखा। मैं तो ठहरा दूसरी आकाशगंगा का प्राणी...
‘दूूसरी आकाशगंगा’... मैने पलकें झपकाईं।
उसने कहा - ‘राजू तुम्हें पता है हमारा ब्रह्मांड कितना बड़ा है इसका कोई ओर - छोर नहीं। इसका कोई अंत न पाकर इसका नाम ही अनंत रख दिया गया है।
उसने आगे कहा -‘तुम्हारी पृथ्वी जिस तारे के चक्कर लगाती है, वह सूर्य तो बहुत छोटा तारा है तुम्हारी आकाशगंगा का।
ऐसी लाखों करोड़ों में से एक आकाशगंगा से मैं आया हूँ।
ओह ! मगर तुमने इतनी दूरी को कैसे पार किया - मैंने प्रश्न किया।
वह बोला- ‘राजू, हमारा विज्ञान तुम्हारी धरती से कहीं आगे है। इसलिए यह कोई समस्या नहीं।
‘कैसे ? -मैंने पूछा।
उसने कहा - ‘ऐसे समझो, धरती का जल, बर्फ पानी और भाप यानी ठोस द्रव व गैस के रूप में तापमान के हिसाब से बदल जाता है। तुम्हें पता है हमारा शरीर किन पाँच तत्वों से मिलकर बना है ?’
‘पानी ,मिट्ठी, अग्नि, वायु और आकाश’- मैंने जल्दी से जबाब दिया।
उसने बताया - ‘बिलकुल ठीक, हमारे ग्रह पर भी ऐसा ही है। हमने विज्ञान की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की कि हम खुद को इन पाँच में से किसी भी तत्व में बदल सकते हैं।‘
‘ऐसा क्या ? - मैं हैरान रह गया।
 वह आगे बोला -‘अभी मैं खुद को हवा में बदल कर तुम्हारे आसपास मौजूद रहूँगा या सागर की इन लहरों में मिल कर बहने लगूँगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।’
यह कहते कहते वह एकदम से गायब हो गया। जरा सी देर में वह फिर दिखाई देने लगा। मैं हैरान था।
मैंने पूछा लेकिन तुम जीने के लिए प्राणशक्ति कहाँ से लेते हो ?
उसने मुस्कराते हुए जबाब दिया -यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा तुमने... हम अपनी प्राणशक्ति उन पाँच तत्वों में से किसी एक तत्व से ले सकते हैं।
‘जैसे’ ? - मैंने हैरान होते हुए पूछा।
उसने बताया -‘तुम हवा से साँस लेते हो, जबकि मैं हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि और आकाश यानि शून्य निर्वात से भी जीवनी शक्ति ग्रहण कर सकता हूँ।’
‘ओह, मुझे याद आया। मैंने एक फिल्म में दूसरे ग्रह के प्राणी को धूप यानि अग्नि से जीवनी शक्ति पाते देखा था।’ - मैंने कहा।
उसने मुझे आगे बताया -‘ये जो बाल देख रहे हो न मेरे ...
‘मैंने उसके बालों की ओर ध्यान से देखा तो मुझे वे बाल कुछ-कुछ उस बाली जैसे दिखे जिसे हम लोग एक दूसरे की पीठ पर फेंककर चिपका देते हैं। ऐसे पतले-पतले सैकड़ों बाल उसके सिर पर थे।’
हाँ - मैंने कहा।
वह बोला-‘दरअसल यह बाल नहीं हैं।’
‘हंय...तो फिर’? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘ये प्राणशक्ति से भरे सिलैंडर हैं। जिनमें एक-एक में सैकडों साल का ईंधन भरा हुआ है।’ - उसने बताया।
‘सैकड़ों साल... आपकी उम्र क्या है’ ? मैंने हैरान होकर पूछा।
उसने ठंड़ी सांस भरते हुए कहा -‘चलो मैं शुरू से ही तुम्हें बताता हूँ। राजू, हजारों साल पहले हमारा ग्रह भी तुम्हारी पृथ्वी की तरह विविध वनस्पतियों, जीव जंतुओं से भरपूर था।’
 उसने बताया -‘हमारे यहाँ अनेक दुधारू पशु थे। वैज्ञानिकों ने देखा ये चारा खाते है फिर उसके पेट में कुछ ऐसी रासायनिक क्रियाएं होतीं हैं जिनसे वह चारा दूध में बदल जाता है। उन्होंने सोचा क्यों न हम एक ऐसी मशीन बनाएं जिसमें उनके पेट जैसा वातावरण हो। वे उसमें चारा डालें और दूध बना लें। उन्होंने बना ली।
फिर सोचा आखिर चारे पर भी निर्भर क्यों रहा जाए। चारा भी तो हवा में मौजूद तत्वों से पोषकता ग्रहण करता है। क्यों न हम हवा से सीधे ऐसे पोषक तत्वों को ले लें, जो हवा से चारे ,चारे से गाय और गाय के दूध के जरिए हमें मिलते हैं।’
मेरा मुँह खुला रह गया।
यही नहीं उन्होंने मछलियों से मिलने वाले प्रोटीन को भी सीधे लेना शुरू दिया। जो वे समुद्री वनस्पतियों को खाकर पातीं थीं। वनस्पतियाँ सागर के पानी से और सागर का पानी वातावरण से...
 मगर इससे प्रकृति का चक्र धीरे - धीरे बिगड़ता चला गया। और लंबे समय में ये जीव जंतु वनस्पतियाँ कम होते गए, और ...
और क्या हुआ ? मैंने पूछा।
...और एक दिन यह जीवन चक्र खत्म हो गया। अब हमारा ग्रह सूना है। हमारी उम्र हजारों साल है। कभी पुराना समय याद आता है तो मैं तुम्हारी इस धरती पर आ जाता हूँ।
यानी अब से पहले भी आते रहे हो यहाँ ? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
हाँ, अक्सर ... कई बार आता रहता हूँ। - उसने कहा
मैंने पूछा -  अच्छा, वो यू एफ ओ यानी उड़नतश्तरियों के जरिए...
नहीं, नहीं, मैंने कहा न अभी तुमसे जब तक हम न चाहें कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। - उसने बताया।
मगर मैंने तो जान लिया है तुम्हारे बारे में ...- मैंने जब ऐसा बोला तो वह मुस्कराया।
‘राजू,मत भूलो तुम यह सब सपने में देख रहे हो। -उसने कहा।
‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो ?’ मैंने जब यह प्रश्न किया तो वह हँसने लगा।
बोला - ‘सपने की इस बात पर भला कौन विश्वास करेगा। शायद तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हें मैंने ही सपने में बुलाया है।’
-आप मेरी भाषा में कैसे बोलते हो ?
‘ये बुलबुले देख रहे हो। इनसे होकर किसी भी भाषा की तरंगें मेरे पास आएंगी, मेंरी भाषा में बदल जाएंगी।
हाँ, कमल, मैं भी उसकी इस बात पर जोर से चैंक पड़ा जिससे मेरी आँख खुल गई।
‘ओह’ - सभी बोल पडे।
‘अब तुम्हें अपने सपने में वह कब बुलाएगा ?’ - अचानक नंदिनी ने राजू से पूछा।
‘क्यों ? ’ - कमल ने नंदिनी से पूछा और सब उसकी ओर देखने लगे।
- ‘मुझे तो उपहार में उसके वे बुलबुले चाहिए जिनसे अपने देश की सैकड़ांे बोलियों और भाषाओं में बिखरे बाल साहित्य को हिंदी में सुन सकूँ।-स्टेला ने कहा।
अपने देश ही क्यों दुनिया के सारे देशों के बाल साहित्य को क्यों नहीं ? -    राजू बोला।
‘बाल साहित्य ही क्यों, जितनी अलिखित विरासत है वह सारी की सारी संग्रहीत होनी चाहिए।’- स्टेला ने जल्दी से कहा।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो,जब हमें आइडिया मिल ही गया है तो क्यों न हम खुद इस तरह का यंत्र बनाने का प्रयास करें।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो, वैसे हमारे ब्रहमाण्ड में ऐसे ग्रह जरूर हो सकते हैं जिनमें विज्ञान हमसे आगे हो।
‘कुछ भी कहो, ये सपना था बहुत मजेदार’ - नंदिनी ने कहा तो सबने सहमति में सिर हिलाया
इस तरह वे सभी राजू के सपने में दूसरे ग्रह से आए मेहमान के बारे में बातें करते हुए घर की ओर चल दिए।


         

Monday, 4 April 2016

बाघ का सामना

उत्तराखंड राज्य के टिहरी गढ़वाल जिले की घनसाली तहसील का वह एक लगभग चालीस परिवारों का छोटा सा गांव है। जिसका नाम है बडियार, यह गांव मुख्य सडक से लगभग दो किलोमीटर अंदर की ओर है।
16 जुलाई 2014 की शाम का झुटपुटा फैल रहा था। पहाड़ों पर तो वैसे भी शाम कुछ तेजी से गहराने लगती है। इसलिए अंधेरा होने में देर न लगी। सात साढ़े सात का समय हो रहा था। गांव का ट्रांसफारमर फुँक चुका था। इसलिए गांव में अंधेरा तेजी से छा चुका था। इक्का दुक्का घरों से दिए की की टिमटिमाती रोशनी अंधेरे के साम्राज्य में सेंध लगाती हुई घरों की चहारदीवारी के अंदर ही दम तोड़ती नज़र आ रही थी। अर्जुन का घर गांव से कुछ बाहर की ओर हटकर था।
 आज स्कूल से बारह बजे छुट्टी होने के बाद जब अर्जुन घर आया तो उसने खुद दाल भात और रोटी बनाई। वह अक्सर ऐसा करता था। उसे खाना बनाने का शौक जो था। खाना खाकर अब वह पढ़ने के लिए घर में अंदर बैठा अपनी स्कूल की किताबें पलट रहा था और मोबाइल से हल्की धुन में गाने भी सुन रहा था। आज वह और उसकी मम्मी घर में अकेले थे। अर्जुन अपने चार भाई बहनों में सबसे छोटा था। उसकी दीदी अपनी बड़ी बहन के यहां गई हुई थी।
उसके पिता तो बचपन में तभी गुजर गए थे जब वह तीन साल का था। अब तो उसे उनका चेहरा भी याद नहीं। मां ने जैसे तैसे करके तीन बच्चों को पाला। अब वे उसी स्कूल में भोजन माता के रूप में कार्यरत हैं जिसमें पंद्रह साल का अर्जुन कक्षा ग्यारह का छात्र है। मां की उम्मीद है कि जल्दी ही वह पढ-़लिख कर कहीं नौकरी करेगा मां का हाथ बंटाएगा।
तभी बाहर बरामदे से बगल के कमरे में बंधे जानवरों के रंभाने की आवाज आई। मां ने कहा - ‘पता है, भूख लगी है। आ रही हूँ, जरा ठहरो।’ अर्जुन मैं भैंस और बछड़े को चारा देकर आती हूँ।’ कहकर वे जानवरों को चारा डालने बाहर की ओर चल दी। जानवरों को चारा डालते ही उन्हें अंधेरे में आभाष हुआ जैसे कोई जानवर अपने दोनों पंजों पर खड़ा होकर उनकी ओर बढ़ रहा है। जैसे ही उन्हें उसके खतरनाक होने का अंदेशा हुआ। उनका गला रुंध गया। जबतक वे संभलें संभलें उसने उनपर बाईं ओर से हमला कर दिया। उनके मुंह से अनचाहे ही एक जोरदार चीख निकल गई।
अंदर अर्जुन अपनी किताबों में उलझा था। तभी अचानक शाम के सन्नाटे को चीरती हुई चीख की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह तुरंत बाहर की ओर भागा।
बाहर आकर उसने हल्के अंधेरे में देखा कि उसकी मां बेहोश पड़ी थी और एक बाघ उनकी ओर खतरनाक ढ़ंग से बढ़ रहा है। अर्जुन उस समय खाली हाथ था। उसने जोरदार आवाज लगाकर बाघ को ललकारा और तुरंत पीछे मुड़कर दरवाजे के साथ रखे दरांती और लाठी को उठाया। अब वह तेजी से बाघ की ओर बढ़ा। बाघ को अपने और शिकार के बीच में आया यह व्यवधान पसंद नहीं आया और वह अर्जुन की मां को छोड़कर अर्जुन की ओर ही बढ़ने लगा।
दरांती तो छोटी थी हां मगर वह डंडा लंबा था। सो अर्जुन ने आगे बढ़कर पूरी ताकत से उसे घुमाकर बाघ के सिर पर प्रहार किया। जोर से लगी चोट से बाघ लड़खड़ा गया और पलट गया। इसी बीच अर्जुन ने झट से अपनी मां को उठा कर दरवाजे के अंदर कर दिया और फिर से बाघ का सामना करने के लिए आ गया।
उसने देखा कि उससे चोट खाकर बाघ अब जानवरों के कमरे की ओर जाने लगा था। अब अर्जुन ने जोर से आवाज लगाते हुए बाघ पर हमला कर दिया। बाघ ने जब बाधा के रूप में अर्जुन को अपने सामने पाया तो वह अर्जुन पर ही टूट पड़ा। मगर अर्जुन पहले ही से इसके लिए तैयार था। उसने घुमाकर डंडे के तीन चार जोरदार प्रहार उस पर कर दिए। इस हमले से वह बौखला गया और उसने पलट कर अर्जुन पर हमला कर दिया। अर्जुन ने न केवल अपने को बचाया बल्कि उसे अपने डंडे का प्रसाद भी दे दिया। इस बीच वह उसे ललकारता भी जा रहा था। हालांकि इस झड़प में उसके हाथों पर बाघ के पंजों के कुछ निशान लग चुके थे मगर उसने इसकी परवाह नहीं की।
इतना शोरगुल सुनकर पड़ोस के घरों के लोगों ने भी आवाजें लगानी शुरू कर दीं। क्या हुआ... कौन है... कहते हुए लोग आ गए। जब उन्होंने अर्जुन की बाघ से भिडन्त देखी तो वे दंग रह गए। उन्होंने तुरंत शोर मचाते हुए पत्थर फेंकना शुरू कर दिया जिससे घबराकर वह बाघ जंगल की ओर भाग गया। उस रात ग्यारह बजे तक गांव के लोगों का जमावड़ा अर्जुन के घर के पास लगा रहा। लोगों ने टार्च की रोशनी डाल कर शोर मचाकर खेतों के नजदीक जाकर पक्का किया कि अब बाघ वहां नहीं है। वह वहां से भाग चुका था। गांव के लोगों ने अर्जुन की मां के हाथ में घाव पर देशी दवा लगाकर पट्टी बांध दी गई। वे अगले दिन उन्हें इलाज के लिए घनसाली पिलखी ले गए।
वन विभाग ने वन्य जीव द्वारा घायल किए जाने के कारण अर्जुन की मां विक्रमा देवी को अनुग्रह राशि के रूप में पंद्रह हजार रुपए की धनराशि दी। राज्य के मुख्यमंत्री ने अर्जुन को बाघ से अपनी मां की जान बचाने के लिए इक्यावन हजार रुपए देने की घोषणा की। जब राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार के लिए भेजे गए चार नामों में से अर्जुन का नाम संजय चोपड़ा पुरस्कार के लिए चुने जाने की सूचना मिली तो बडियार के लोग खुशी से झूम उठे।
अर्जुन को जब प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार देने के बलिए दिल्ली बुलाया गया तो वह अपनी मां और अपने स्कूल शिक्षक के साथ गया। यह उसकी पहली दिल्ली यात्रा थी। वहां देश के कोने कोने से उसी की तरह से बहादुर बच्चे आए थे। उनसे और देश के बड़ी बड़ी हस्तियों से मिलकर वह बेहद खुश था। अर्जुन सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहता है।

नन्हे दोस्तो,

मां पर आए संकट जो तो हाजिर अपनी जां है,
हों कुछ पल नाराज़ भले पर,मां तो आखिर मां है,
गलत इरादा कर कोई आए ये मजाल किसकी है,
एक पल में दे देंगे ये जां, देन भी तो उसकी है,
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Tuesday, 4 August 2015

पापा की बेटी

घर के अंदर बैठी रिया पढ़ाई कर रही थी। माँ अंदर रसोई में घरेलू काम में उलझी हुई थी। रिया के पापा भी इस समय घर पर थे। रिया को बचपन से ही पढ़ने का शौक था। सो कभी उसके मम्मी पापा ने उसे पढने से नहीं रोका। न तो बाहर स्कूल में पढ़ने जाने में और न ही घर पर पढ़ने में।
जब भी कभी रिया पढने बैठती मम्मी उसे काम करने की न कहतीं। या तो वे खुद काम कर लेतीं या उसे बाद पर टाल देतीं। अव्वल तो रिया ही उन्हें कुछ भी कहने का मौका न हीं देती। वह माँ के काम में हाथ बँटाना अपनी जिम्मेदारी समझती थी। अपनी समझ से सारे काम निबटाने के बाद ही पढ़ने बैठती थी।
आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। रिया का छोटा भाई स्कूल जा चुका था और अभी - अभी वह पढ़ने बैठी थी। यह मार्च महीने की दस तारीख थी। यू पी बोर्ड की परीक्षाएं अमूमन इसी महीने में होतीं हैं।
उसकी पढ़ाई में व्यवधान न हो इसलिए एक - एक कर उसके मम्मी पापा दोनों घर के बाहर निकल गए।
रिया के पापा एक सीधे सादे किसान थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली जिले में रहते और उसका विशेष ध्यान रखते थे। रिया का भी अपने पापा से विशेष लगाव था।
अभी वह प्रश्नोत्तरों को एक बार पढ़कर उन्हें दोबारा से दोहराने की तैयारी कर रही थी। उसे बाहर की ओर से आता हुआ शोर सुनाई दिया। पहले तो उसने इस ओर ध्यान नहीं दिया मगर जब लड़ाई की आवाजों के बीच जब उसे अपने पापा की आवाज सुनाई दी तो वह अपने आप को ना रोक सकी।
जब वह घर से बाहर निकल कर आई तो बाहर का माहौल बहुत अशांत था। उसके ताऊ और पापा से कुछ लोग जोर - जोर से चिल्लाते हुए लड़ रहे थे। कोई जमीन के बारे में विवाद था। जो उन लोगों और उसके पापा , ताऊ के बीच काफी समय से चल रहा था। वैसे तो रिया के पापा शांत स्वभाव के थे मगर जब कोई घर पर चढ़ कर आए और उल्टा - सीधा बोले तो कोई अपने गुस्से पर काबू कहाँ तक रखे।
अब बातचीत में तेजी आती जा रही थी। विरोधी लगातार हावी होने की कोशिश कर रहे थे। वे हमलावर हो रहे थे। और अब तो उन्होंने हाथों में अवैध हथियार लहराने शुरू कर दिए। रिया को लगा कि आज कुछ बड़ी गड़बड़ होने वाली है। रिया के ताऊ ने उन लोगों से चले जाने के लिए कहा।
मगर वे कई लोग थे और आज कुछ सोच कर ही आए थे। बात बढने पर अचानक उनमें से एक ने आगे बढ़कर हवा में गोली चला दी। चारो तरफ अफरा - तफरी फैल गई। वे तेजी से रिया के पापा की ओर बढ़े।
 किसी अनहोनी की आशंका से रिया पापा की ओर दौड़ी। और फिर वही हुआ जिसका डर था एक हमलावर रिया के पापा का निशाना बनाकर पिस्तौल तान दी।
किसी के ‘हिम्मत है तो चला गोली’- कहते ही उसने हिम्मत दिखाते हुए गोली चला दी। मगर इसी बीच रिया तेजी से पापा और गोली के बीच आ गई। वह गोली रिया को लगी। चारो तरफ ‘हाय’ ‘हाय’ का शोर मच गया। रिया की माँ भी दौड़ती हुई आईं और हमलावरो की चलाई गोली का शिकार बनकर घायल होकर गिर गईं।
लडकी के गोली लगते ही वहाँ का माहौल बदल गया। ऐसे में हमलावरों ने भी भागने में ही अपनी भलाई समझी। इधर रिया के सीने में गोली लगते देख सब उसे बचाने दौड़े। उसके पापा ने उसे बाहों में भर लिया।
वे उसे और उसकी माँ को लेकर डाक्टर के पास पहुँचे मगर तब तक देर हो चुकी थी। रिया की मम्मी तो बच गईं परन्तु रिया को न बचाया जा सका। रिया ने अपने सीने पर गोली खा ली मगर अपने पापा पर आँच न आने दी।
रिया के साहस और बलिदान ने सुनने और जानने वाले सभी लोगों की आँखें नम कर दीं। उसकी बहादुरी और प्रेम ने सभी को हैरत में डाल दिया। देश के प्रधानमंत्री जी ने उसे मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया।
बापू गयाधानी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाते समय रिया के पापा और मम्मी की आँखों के सामने उसका प्यारा चेहरा बार - बार आ रहा था। मानो वह कह रही हो - ‘पापा मैं तुम्हारी बेटी हूँ, तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगी।’पापा की आँखों से आँसू रोकने की कोशिश में छलके जा रहे थे।

दोस्तो -

हम चिडियों सी चहक चहक, घर चिचियाहट से भर दें,
हँस-हँस कर गम की सारी स्थिति परिवर्तित कर दें,
इस रोती - धोती दुनिया को हँसने का अवसर दें,
अमृत दें, हमको बदले में चाहे लोग जहर दंे,

     

ऐसे टला ट्रेन हादसा

उसकी उम्र चौदह  साल थी और वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था। नाम था वेंकटेश्वर राव । नारागनी वेंकटेश्वर राव, सीधा सादा भोला भाला, गोल मटोल मुँह चेहरे से मासूमियत टपकती हुई।
उस दिन रविवार था छुट्टीवाला दिन, सो खा - पीकर उसने एक बैटनुमा लकड़ी उठाई और घर से निकल लिया। बाहर उसके पड़ोस का दोस्त मिल गया। फिर क्या था दोनों चल दिए खेल के मैदान की ओर। वे आपस में बातचीत करते हुए चले जा रहे थे। घर के पास के छोटे रास्ते को पार करते हुए अब वे दोनों रेलवे ट्रैक के किनारे - किनारे चलने लगे। दरअसल रेलवे लाइन के उस पार खेल का मैदान था।
 सारे इलाके के बच्चे वहीं के खुले मैदान में खेलते थे। बड़े बच्चे क्रिकेट खेलते, छोटे बच्चे उसे देखते या खुद किसी छोटी मोटी टीम का हिस्सा बन जाते और किसी कोने में खेलने लगते। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही वहाँ बच्चों का जमावड़ा लग जाता।
बस खाने के समय या उससे कुछ पहले बच्चे वहाँ से फुरसत पाकर घर आ जाते। किसी के घर से स्वीकृति मिल जाती तो कोई चुपके से बहाने बनाकर आ जाता। जिन्हें देर हो जाती तब तक उनकी जगह दर्शकों में से किसी से भर जाती। आपके पास खेल का सामान हो या न हो तो भी आप वहाँ जा सकते हैं। आपको खेलने का अवसर मिलने की पूरी संभावनाएं होती हैं।
वेंकटेश्वर और उसके दोस्त तो अक्सर छुट्टी के दिन वहाँ जाते थे। उसके स्कूल ब्रहमपुर के अनेक लड़के वहाँ खेलने आते थे।उनके साथ वेंकटेश्वर को भी खेलने में अच्छा लगता था। इसी सिलसिले में अपनी व मित्रों की बातें करते हुए वे चले जा रहे थे।
तभी रेलवे ट्रेक के किनारे एक प्लास्टिक की खाली बोतल पर वेंकटेश्वर की नजर पड़ी। हाथ में पकड़ी लकड़ी से अनायास ही उसने उसमें चोट मार दी। बोतल लड़खड़ाती हुई आगे पत्थरों के पास गिरी। आगे बढ़कर उसने उसको फिर हिट किया तो हवा में उछलती बोतल रास्ते के बीचोंबीच गिरी। वेंकटेश्वर ने उसमें फिर लकड़ी की चोट मारी तो बोतल उड़ती हुई रेलवे ट्रेक के बिलकुल बीच में जा गिरी। वह उसे उठाने के लिए फिर आगे बढ़ा। अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था।
पहले उसने अपने दोस्त को ही बोतल उठाकर लाने के लिए इशारा किया। लेकिन उसके दोस्त ने मुँह पिचकाते हुए उससे कहा - ‘ छोड़ यार ! चलते हैं जल्दी, देर हो रही है।’
‘अभी चलते हैं’- कहता हुआ वेंकटेश्वर बोतल उठाने के लिए ट्रैक के बीच पहुँचा।
अचानक उसकी नजर पटरी के बीच पड़े खाली स्थान पर गई। पटरी के बीच कम से कम छह इंच का टुकड़ा था ही नहीं । उसने जल्दी से अपने मित्र को पास बुलाकर दिखाया और कहा - देख, इससे तो दुर्घटना हो सकती है। हमें इसकी खबर केबिन मैंन को करनी चाहिए।’
उसका दोस्त झुँझला गया और बोला - ‘ट्रैक टूटा है तो टूटा रहे, हमें क्या ? चलो खेलने चलते हैं।’
‘नहीं’ हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।’ मैं तो जाऊँगां’। - वेंकटेश्वर बोला।
‘
तो तू जा, मैं तो चला खेल के मैदान में, खबर करके वहीं आ जाना।’ - उसका दोस्त यह कहकर आगे बढ़ गया।
वेंकटेश्वर उस भयावह पल की कल्पना करके काँप गया, जब उस ट्रैक पर कोई गाड़ी आ जाएगी और दुर्घटना हो जाएगी। अगर उसने समय रहते यह सूचना न पहुँचाई तो उस संभावित भयंकर दुर्घटना का जिम्मेवार वह स्वयं को समझेगा।यह सोचकर वह तेजी से केबिन की ओर दौड़ पड़ा।
केबिन उससे एक सौ पचास गज की दूरी पर था। वह दौड़ता हुआ केबिन के निकट जा पहुँचा।उसे उस समय वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज भी लगाई,मगर कोई उत्तर न पाकर वह वहाँ से आगे की ओर दौड़ गया।केबिन मैन शायद वहाँ नहीं था या संभवता उस तक बच्चे की आवाज नहीं पहुँच पाई। जो भी हो।
अब वेंकटेश्वर आगे ही आगे दौड़ता चला जा रहा था। उसका लक्ष्य पेड़ना रेलवे स्टेशन था जो वहाँ से सामने दिखाई दे रहा था। उसके पैरों में मानो पंख लग गए। जब वह हाँफता हुआ प्लेटफार्म पर चढ़ा तो उसकी नजर सीधी स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर थी।
उसे तेजी से इस तरह भागते देख कई लोग उसकी ओर देखने लगे क्योंकि उस समय कोई ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं थी। मगर उसने उन सब की परवाह नहीं की। जब वह धड़धड़ाते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसा तो कुर्सी पर बैठे स्टेशन मास्टर चैंक गए और प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगे।
वेंकटेश्वर के मुँह से टूटे - फूटे शब्दों में निकला - ‘वह... वहाँ...टूटा है।’
स्टेशन मास्टर ने पूछा - ‘अरे’ जरा साँस तो ले लो। क्या कहाँ टूटा है ?’
इतनी देर में अपनी साँसों को व्यवस्थित करते हुए वेंकटेश्वर स्टेशन मास्टर से फिर बोला -‘ट्रैक... ट्रैक टूटा है आगे, आने वाली गाड़ी को रोक दो।’
स्टेशन मास्टर ने चैंकते हुए पूछा - ‘कहाँ, किस जगह की बात कर रहे हो?’
‘यहीं केबिन से थोड़ा आगे,पटरी के बीच खाली जगह है।’ - वेंकटेश्वर के स्वर में दृढ़ता थी।
स्टेशन मास्टर ने एक नजर अपनी घड़ी पर डाली फिर वेंकटेश्वर की ओर देखा उन्हें लगा, हो न हो ये लड़का सच बोल रहा हो। अभी गुड़िवाड़ा पैसिंजर के आने में समय है। तब तक ट्रैक की जाँच करवा लेते हैं।
स्टेशन मास्टर को सोच में पड़े देख वेंकटेश्वर ने एक बार फिर कहा - ‘सर, आने वाली ट्रेन को रोक दो।’उसे लगा बच्चा समझकर स्टेशन मास्टर उसकी बात पर कहीं ध्यान न दें।
स्टेशन मास्टर तेजी से एक्शन में आ गए उन्होंने तुरंत ट्रैक की जांच करने वाले कर्मचारियों को बुलाया। फिर वेंकटेश्वर की ओर इशारा करते हुए कहा - ‘इस लड़के के साथ जाओ और देखो, ट्रैक कहाँ खराब है। केबिन के आगे ट्रैक में कहीं कोई गड़बड़ है। जल्दी देखकर मुझे सूचना दो। गुड़िवाड़ा पैसिंजर आने वाली है। मैं यहाँ तुम्हारी खबर का इंतजार कर रहा हूँ।
 वेंकटेश्वर उनके साथ तुरंत चल पड़ा। उसे खुशी थी कि स्टेशन मास्टर ने उसकी सूचना पर एकदम भरोसा नहीं किया तो उसे गलत भी नहीं माना। उन्होंने तथ्यों की जाँच के लिए इन कर्मचारियों को उसके साथ भेज दिया। अब वह उन कर्मचारियों को बता रहा था कि कैसे वह केबिन मैन को बताने गया था मगर उनके न मिलने पर वह दौडता हुआ पेड़ना स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँचा।
बातों - बातों में वे केबिन से आगे उस स्थान तक आ पहुँचे। टूटे टैªेक को देखते ही रेलकर्मियों ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि वास्तव में वेंकटेश्वर की खबर बिलकुल सही थी। टैªेक में खराबी थी। आने वाली गाड़ी को रोक दिया जाए। स्टेशन मास्टर ने गुड़िवाड़ा से पेड़ना आ पहुँची, पैसेंजर ट्रेन को लाल सिग्नल दिखाकर रोका दिया।
 स्टेशन के पास तक आ पहुªँची ट्रेन के रुक जाने से यात्री उतर - उतर कर आने लगे। कारण जानने पर उन्हें पता लगा कि नन्हें साहसी बालक की सूझबूझ के कारण एक टेªन हादसा होने से बच गया। सभी वेंकटेश्वर की प्रशंसा करने लगे। लगभग एक घंटे बाद ट्रैक सही होने पर ट्रेन आगे बढी।
अगले दिन ‘वार्ता’ समाचार एजेंसी ‘आंध्र ज्योति’ ‘आंध्र भूमि’ ‘विशाल आंध्रा’ आदि अनेक समाचार पत्रों में वेंकटेश्वर की साहस और सूझबूझ की सराहना करते हुए घटना का विवरण प्रकाशित किया। पेड़ना की म्यूनिसिपल चेयरपर्सन पदमजा कुमारी व उसके बार्ड कौंसलर वी. वेणुगोपाल राव ने वेंकटेश्वर के साहस को सलाम करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस परेड ग्राउण्ड में सारे जिले के गणमान्य लोगों के बीच वेंकटेश्वर की सूझबूझ धैर्य और हिम्मत की तारीफ करते हुए जिलाधिकारी के. प्रभाकर रेड्डी ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त तेरह बर्षीय बालक त्रिनाथ को भी याद किया।जिसने इसी प्रकार टूटे ट्रैक की सूचना सही समय पर देकर एक बड़ी दुर्घटना होने से बचाई थी।
विद्यालय के प्रधानाचार्य व जिलाधिकारी द्वारा वेंकटेश्वर का नाम भी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली भेजा गया। नारागनी वेंकटेश्वर राव को 2005 में यह पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी ने अपने हाथों से प्रदान किया।

नन्हे दोस्तो -

मुðी में हम किस्मत रखते मंजिल अपनी पाँवों में,
घर हो अथवा बेघर हों शहरों में हों या गाँवों में,
पर्वत सागर तूफाँ बिजली चाहे कैसी बाधा हो,
हर इच्छा पूरी होगी , आ देखे अपनी चाहों में,


लील गई लहरें - मोनिका

‘ दीदी कहाँ जा रही हो ? - रितु ने अपनी बडी बहन को बर्तन और कपडे समेटते देखा तो पूछ लिया।
‘ये बर्तन और कपडे धोने चलना है नदी पर, चलो इधर आओ, कुछ बर्तन तुम भी उठाकर ले चलो’ - मोनिका ने रितु को पास बुलाते हुए कहा।
उससे छोटी बहन निकिता जो वहीं खेल रही थी, झट से बोल पड़ी - ‘दीदी, मैं भी चलूँ।
हाँ, आ जाओ ,ये कपडे उठा लो।’- मोनिका ने उसे भी चलने की अनुमति देते हुए कहा।
बडी बहन गरिमा की शादी के बाद घर की सारी जिम्मेदारी का भार मोनिका के कंधों पर ही आ चुका था। उसके पिता विकलांग थे और माँ अक्सर बीमार ही रहती। घर की आय का एकमात्र óोत सैनिक रहे दादा की पेंशन थी। दादी रही नहीं ं थी और अठत्तर साल के दादा के जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं था। पता नहीं कब उस बूढ़े पेड़ की छाया और सहारा इस परिवार को मिलना बंद हो जाए।
ऐसे में सत्तरह साल की मोनिका ही थी जो इस परिवार की धुरी के रूप में गृहस्थी की गाड़ी खींच रही थी। तीन महीने पहले बड़ी बहन गरिमा की शादी में जिस जिम्मेदारी से उसने बढ़ - चढ़कर काम किया, उसे देखकर गाँव कालेश्वर के लोगों ने उसकी बड़ी तारीफ की।
बातें करते - करते तीनों बहनें गाँव से लगभग चार सौ मीटर दूर बहने वाली अलकनंदा नदी के पास पहुँचीं। मोनिका कपड़े धोने में लग गई और दोनों बहनें खेल में।
अलकनंदा नदी का प्रवाह गर्मी के बावजूद पहाडी इलाका होने के कारण काफी तेज था। अचानक निकिता ने रितु से पूछा - ‘ दीदी, ये अलकनंदा नदी कहाँ से आती है?
‘हमें नहीं पता, आओ चलो, दीदी ग्यारहवीं में पढ़ती है,उससे चलकर पूछते हैं’- रितु ने मोनिका की तरफ इशारा करते हुए कहा और वे दोनों दौड़कर मोनिका के पास पहुँचीं।
उन्होंने पूछा - ‘दीदी, हमें यह बताओ, ये अलकनंदा नदी कहाँ से निकलती है?
बद्रीनाथ धाम से ऊपर शतपथ और भगीरथ खड़क नाम के हिमनदों से निकलती है हमारी ये अलकनंदा, अब जाओ और खेलो जा के... - मोनिका ने उन्हें समझाया।
जहाँ मोनिका कपड़े धो रही थी वहीं पास में गाँव का दस साल का लड़का साहिल भी था। वह नदी में नहाने रहा था। मोनिका ने एक बार उसे किनारे पर ही रहने की हिदायत दी।
नहाते - नहाते अचानक साहिल का पैर उखडा और वह अलकनंदा के तेज बहाव में बहने लगा। पहले तो उसने स्वयं सँभलने की कोशिश की। मगर जब वह सफल न हुआ तो - ‘दीदी बचाओ’ ‘बचाओ दीदी’ की गुहार लगाने लगा।
कपड़े धोती मोनिका ने आवाज सुनकर नजरें उठाई तो देखा साहिल नदी की तेज धारा में बेसहारा बहने लगा था।
मोनिका ने तुरंत कपड़े छोड़े और तेजी से नदी के किनारे - किनारे दौड़ती हुई साहिल के पास पहुँची। अंदाजा लगाकर वह अलकनंदा की हरहराती तेज धारा में कूद गई। जल्दी ही उसने साहिल को जा पकड़ा।
अब नदी के तेज प्रवाह का सामना करते हुए उसे साहिल को सुरक्षित किनारे तक लाना था।
अलकनंदा का तेज प्रवाह उसे सँभलने नहीं दे रहा था। साहिल बुरी तरह उससे चिपटा हुआ था। ऐसे में साहिल और खुद को बचा पाना मोनिका के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
मोनिका ने सारी ताकत समेटते हुए साहिल को किनारे की ओर धकेला। उसने साहिल के बाल पकड़ कर उसे चट्टान की ओर चढ़ाया। साहिल ने झपट कर चट्टान का एक सिरा मजबूती  से पकड़ लिया। वह बुरी तरह हाँफ रहा था।
अब मोनिका ने ऊपर चढ़ने की कोशिश की। उसने एक झटके से ऊपर की ओर एक बड़े पत्थर पर चढ़ने के लिए छलांग लगाई। दुर्भाग्य से पता नहीं पैरों के नीचे कोई दलदली जमीन आई या कोई नुकीला पत्थर जिससे उसका पैर अचानक मुड़ गया और वह लड़खड़ा गई।
इतना समय बहुत था। पानी के तेज प्रवाह नेेे उसे सँभलने का मौका नहीं दिया। अब तक रितु और निकिता भी दौड़कर वहाँ ऊपर आ चुकी थीं। पर वो भी दूर से ‘दीदी’ ‘दीदी’ चिल्ला कर रह गईं, कुछ न कर सकीं। उनके देखतेे-देखते मोनिका अलकनंदा की भीषण लहरों में डूबती उतराती बहती चली गई।      
दोनों बहने और साहिल बदहवास दौड़ते हुए घर पहुँचे और उन्होंने सब हाल कह सुनाया। पर घर में ऐसा था कौन जो सुनकर कुछ कर पाता। वहाँ थे बीमार माँ, विकलांग पिता, बूढ़े दादा और छोटा भाई
मोनिका के चाचा गाँव के प्रधान थे उन्होंने शीघ्र ही पुलिस थाना कर्णप्रयाग में फोन से सूचना दी और गाँव वालों को लेकर अलकनंदा की ओर चल पड़े। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अलकनंदा में वहाँ से दस किलोमीटर आगे तक कई दिनो ं की खोज के बाद भी मोनिका का कोई अता पता न लग सका। सारा गाँव शोक में डूब गया। उसका परिवार तो बेसहारा सा हो गया। हर   घर में मोनिका की कर्मठता बहादुरी और कार्यकुशलता के चर्चे थे।
मोनिका के चाचा गाँव के प्रधान हरीश चैहान ने सारे घटनाक्रम का ब्योरा समाचार पत्रों की कटिंग व एफ आई आर के साथ विधिवत भर कर राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नई दिल्ली को भेजा। मोनिका ने अपनी जान पर खेल कर साहिल के प्राणों की रक्षा की थी।उसकी बहादुरी की सराहना की गई और इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उसे देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया गया।

नन्हे दोस्तो -

बैेठे भला रहें कैसे, जब कोई सामने डूबे,
होने ना देंगे पूरे हम, मौत के भी मंसूबे,
रहे जान या जाए इसमें भला कौन सी अड़चन,
वक्त पड़े तो दे देते हम, ये नन्हा सा जीवन,




Monday, 3 August 2015

संकट में सूझबूझ

स्कूल से आते ही जील को पापा का इंतजार था। वह दो बार मम्मी से पूछ चुकी थी।
 ‘मम्मी, पापा कब आएंगे।
‘शाम को, तुम्हें तो पता है, जैसे रोज आते हैं। क्या बात है आज कुछ खास है क्या?- मम्मी ने पूछा।
जील ने नहीं बताया। वह इसे रहस्य रखना चाहती थी।
बोली - कुछ नहीं, बस ऐसे ही। मैने सोचा कहीं आज शायद देर से न आएं, कहीं उन्हें जाना न हो,
उसकी मम्मी को जील की आदत का पता था। वे समझ गईं -‘ये लड़की अब पापा को ही सारी बात बताएगी और किसी को नहीं।’ वह मुस्कराते हुए घर के काम में लग गईं।
जील के पापा जब शाम को घर आए तो वह लपक कर पापा के पास पहुँची, और उनके आगे एक कागज बढ़ा दिया।
क्या है ये ?- पापा ने एक उचटती सी निगाह कागज पर डाली और मुस्कराते हुए पूछा।
‘पापा, हम न स्कूल की तरफ से दोस्तों के साथ कारवाँ रिसार्ट जा रहे है पिकनिक पर’ - जील ने जल्दी से अपनी बात कही।
कहाँ, शिवराजपुर, तो फिर... - पापा ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
‘पापा, ! आपको इस कागज पर साइन करने हैं कि आपको मुझे पिकनिक पर भेजने में कोई आपत्ति नहीं है।’ - जील थोड़ा झुंझलाती हुई बोली।
‘अच्छा, तो ऐसा बोलो न, लेकिन सोच लो अगर आपत्ति हुई तो’- उसके पापा ने अपनी जेब से कलम निकालते हुए कहा।
क्यों पापा ? - जील ने सवाल किया।
‘बेटी, मेरे ये साइन करना इस बात की गवाही है कि मेरी बच्ची कोई शरारत नहीं करेगी, सबका कहना मानेगी। अनुशासन में रहेगी। क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ ?’ - पापा ने कागज पर लिखते हुए पूछा।
पापा के गले में बाहें डालते हुए जील ने कहा - ‘पापा आपको मेरी कभी शिकायत नहीं मिलेगी बल्कि मैं कुछ ऐसा करूँगी जिससे आपको गर्व ही होगा।’
‘हमें तुमसे यही उम्मीद है’ - पापा ने जील के गाल थपथपाते हुए कहा।
धीरे - धीरे बीस फरवरी 2014 का वह दिन भी नजदीक आ गया जिस दिन जील को पिकनिक पर जाना था। पूरे दिन का कार्यक्रम था। सुबह से ही सब उत्साहित थे। उस दिन जील अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ जल्दी उठी। फोन पर एक दूसरे से अपडेटस लेते हुए वे सब नियत समय पर अपने स्कूल में पहुँच गए। स्कूल से कुल चार बसें जा रहीं थी। बस में बैठकर वे सब शीघ्र ही पावागढ के पास जांबुआ गाँव के पास बने कारवाँ रिसार्ट पहुँच गए।
रिजार्ट में बच्चों के मनोरंजन के लिए खूब साधन थे। सो बच्चों को वहाँ खूब मजा आया। करीब चार बजे बार - बार कहने पर वे घर वापसी को राजी हुए। जल्दी - जल्दी तीन बसों के बच्चे सवार हो गए। चैथी बस के बच्चे अभी नहीं आए थे। जब उसके बच्चे आए तब तक आगे की तीनों बसें जा चुकीं थीं। साथ पहुँचने की जल्दी में ड्राइवर ने बस की गति बढ़ा दी। तेज गति में उछलती कूदती बस में बच्चों को खूब आनंद आ रहा था।
तभी सामने जा रहे एक वाहन से आगे निकलने के क्रम में ड्राइवर ने तेजी से अपनी बस की गति बढ़ाई। बस बड़ी तेजी से उसे पार करती हुई उससे आगे निकली। पता नहीं क्या हुआ? बस अचानक साँप की तरह लहराई। बस के एक साथ कई झटके खाने से बच्चों को बड़ा मजा आया और खुशी का एक चिल्लाहट भरा जोर का शोर उभरा। मगर बस की इस चाल से समझदार जील को पता चल गया कि ड्राइवर बस से अपना नियंत्रण खो बैठा है।
उसने तुरंत अपने दोनों हाथों को अपने सिर के पीछे लगाया और अपना सिर अपने दोनों पाँवों के बीच डाल लिया। बस सिर्फ एक ही तरफ के पहियों पर थी। वह कुछ ही क्षणों में पलट गई और काफी दूर तक घिसटती चली गई। उसकी खिड़कियों के शीशे टूटे और बिखर कर बच्चों के शरीर में घुस गए। कुछ क्षण पहले का उनका उल्लास रुदन में परिवर्तित हो गया। ऐसे ही किसी बच्चे का हाथ कटा और लहरा कर जील के सामने आ गिरा। चारों तरफ चीख पुकार मच गई।
कुछ पल तो किसी को कुछ समझ नहीं आया। धीरे -धीरे जील उठी। अपनी सतर्कता के कारण उसे खरोंच भी न आई थी। उसने देखा कि सभी घायल पड़े हैं। उसने जल्दी - जल्दी दो तीन बच्चों को बस से बाहर निकाला और उनकी टीम बनाकर अपना बचाव अभियान शुरू कर दिया। जिन बच्चों की हालत ज्यादा खराब थी वे कोमा में न चले जाएं इसलिए उसने उनके गालों को थपथपाना शुरू कर दिया। ऐसा ही उसने अन्य बच्चों से करने के लिए कहा।
उसने जल्दी ही एक राहगीर को रोक कर 100 नम्बर पर पुलिस और 108 नम्बर पर एम्बूलेंस को फोन कर दिया। जिससे पंद्रह से बीस मिनट के अंदर पुलिस और एम्बूलेंस आ गई और घायलों को नजदीक के रेफरल हाॅस्पिटल में भर्ती कर दिया गया। समय पर सहायता मिल जाने के कारण कोई जन हानि नहीं हुई। इसका श्रेय जील की सूझबूझ ही जाता है।
परंतु जील इसका श्रेय रामकृष्ण मिशन आश्रम के बड़ौदा सेंटर को देती है। जहाँ वह ध्यान और पूजा के लिए जाती है। इससे मजबूत हुई आत्मिक शक्तियों के कारण यह संभव हो सका कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी संयम रख कर वह अपने साथियों की मदद कर सकी उनकी जान बचा सकी।
जील कहती है मैं मानती हूँ कि मैं अपने भाग्य के कारण नहीं बची बल्कि जो घायल हुए थे उनको बचा सकूँ इसलिए उनके भाग्य से बची।
जील को उसके इस साहस पूर्ण कार्य के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा सम्मानित किया गया।
नन्हे दोस्तो,

मन से हो मजबूत, लड़ो तुम संकट को टारो,
कैसी भी बाधा आए तुम हिम्मत मत हारो,
फर्क नहीं पड़ता इससे ज्यादा हो या कम का,
किरन एक ही सीना देती चीर अकेले तम का,


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