उसकी उम्र चौदह साल थी और वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था। नाम था वेंकटेश्वर राव । नारागनी वेंकटेश्वर राव, सीधा सादा भोला भाला, गोल मटोल मुँह चेहरे से मासूमियत टपकती हुई।
उस दिन रविवार था छुट्टीवाला दिन, सो खा - पीकर उसने एक बैटनुमा लकड़ी उठाई और घर से निकल लिया। बाहर उसके पड़ोस का दोस्त मिल गया। फिर क्या था दोनों चल दिए खेल के मैदान की ओर। वे आपस में बातचीत करते हुए चले जा रहे थे। घर के पास के छोटे रास्ते को पार करते हुए अब वे दोनों रेलवे ट्रैक के किनारे - किनारे चलने लगे। दरअसल रेलवे लाइन के उस पार खेल का मैदान था।
सारे इलाके के बच्चे वहीं के खुले मैदान में खेलते थे। बड़े बच्चे क्रिकेट खेलते, छोटे बच्चे उसे देखते या खुद किसी छोटी मोटी टीम का हिस्सा बन जाते और किसी कोने में खेलने लगते। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही वहाँ बच्चों का जमावड़ा लग जाता।
बस खाने के समय या उससे कुछ पहले बच्चे वहाँ से फुरसत पाकर घर आ जाते। किसी के घर से स्वीकृति मिल जाती तो कोई चुपके से बहाने बनाकर आ जाता। जिन्हें देर हो जाती तब तक उनकी जगह दर्शकों में से किसी से भर जाती। आपके पास खेल का सामान हो या न हो तो भी आप वहाँ जा सकते हैं। आपको खेलने का अवसर मिलने की पूरी संभावनाएं होती हैं।
वेंकटेश्वर और उसके दोस्त तो अक्सर छुट्टी के दिन वहाँ जाते थे। उसके स्कूल ब्रहमपुर के अनेक लड़के वहाँ खेलने आते थे।उनके साथ वेंकटेश्वर को भी खेलने में अच्छा लगता था। इसी सिलसिले में अपनी व मित्रों की बातें करते हुए वे चले जा रहे थे।
तभी रेलवे ट्रेक के किनारे एक प्लास्टिक की खाली बोतल पर वेंकटेश्वर की नजर पड़ी। हाथ में पकड़ी लकड़ी से अनायास ही उसने उसमें चोट मार दी। बोतल लड़खड़ाती हुई आगे पत्थरों के पास गिरी। आगे बढ़कर उसने उसको फिर हिट किया तो हवा में उछलती बोतल रास्ते के बीचोंबीच गिरी। वेंकटेश्वर ने उसमें फिर लकड़ी की चोट मारी तो बोतल उड़ती हुई रेलवे ट्रेक के बिलकुल बीच में जा गिरी। वह उसे उठाने के लिए फिर आगे बढ़ा। अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था।
पहले उसने अपने दोस्त को ही बोतल उठाकर लाने के लिए इशारा किया। लेकिन उसके दोस्त ने मुँह पिचकाते हुए उससे कहा - ‘ छोड़ यार ! चलते हैं जल्दी, देर हो रही है।’
‘अभी चलते हैं’- कहता हुआ वेंकटेश्वर बोतल उठाने के लिए ट्रैक के बीच पहुँचा।
अचानक उसकी नजर पटरी के बीच पड़े खाली स्थान पर गई। पटरी के बीच कम से कम छह इंच का टुकड़ा था ही नहीं । उसने जल्दी से अपने मित्र को पास बुलाकर दिखाया और कहा - देख, इससे तो दुर्घटना हो सकती है। हमें इसकी खबर केबिन मैंन को करनी चाहिए।’
उसका दोस्त झुँझला गया और बोला - ‘ट्रैक टूटा है तो टूटा रहे, हमें क्या ? चलो खेलने चलते हैं।’
‘नहीं’ हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।’ मैं तो जाऊँगां’। - वेंकटेश्वर बोला।
‘
तो तू जा, मैं तो चला खेल के मैदान में, खबर करके वहीं आ जाना।’ - उसका दोस्त यह कहकर आगे बढ़ गया।
वेंकटेश्वर उस भयावह पल की कल्पना करके काँप गया, जब उस ट्रैक पर कोई गाड़ी आ जाएगी और दुर्घटना हो जाएगी। अगर उसने समय रहते यह सूचना न पहुँचाई तो उस संभावित भयंकर दुर्घटना का जिम्मेवार वह स्वयं को समझेगा।यह सोचकर वह तेजी से केबिन की ओर दौड़ पड़ा।
केबिन उससे एक सौ पचास गज की दूरी पर था। वह दौड़ता हुआ केबिन के निकट जा पहुँचा।उसे उस समय वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज भी लगाई,मगर कोई उत्तर न पाकर वह वहाँ से आगे की ओर दौड़ गया।केबिन मैन शायद वहाँ नहीं था या संभवता उस तक बच्चे की आवाज नहीं पहुँच पाई। जो भी हो।
अब वेंकटेश्वर आगे ही आगे दौड़ता चला जा रहा था। उसका लक्ष्य पेड़ना रेलवे स्टेशन था जो वहाँ से सामने दिखाई दे रहा था। उसके पैरों में मानो पंख लग गए। जब वह हाँफता हुआ प्लेटफार्म पर चढ़ा तो उसकी नजर सीधी स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर थी।
उसे तेजी से इस तरह भागते देख कई लोग उसकी ओर देखने लगे क्योंकि उस समय कोई ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं थी। मगर उसने उन सब की परवाह नहीं की। जब वह धड़धड़ाते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसा तो कुर्सी पर बैठे स्टेशन मास्टर चैंक गए और प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगे।
वेंकटेश्वर के मुँह से टूटे - फूटे शब्दों में निकला - ‘वह... वहाँ...टूटा है।’
स्टेशन मास्टर ने पूछा - ‘अरे’ जरा साँस तो ले लो। क्या कहाँ टूटा है ?’
इतनी देर में अपनी साँसों को व्यवस्थित करते हुए वेंकटेश्वर स्टेशन मास्टर से फिर बोला -‘ट्रैक... ट्रैक टूटा है आगे, आने वाली गाड़ी को रोक दो।’
स्टेशन मास्टर ने चैंकते हुए पूछा - ‘कहाँ, किस जगह की बात कर रहे हो?’
‘यहीं केबिन से थोड़ा आगे,पटरी के बीच खाली जगह है।’ - वेंकटेश्वर के स्वर में दृढ़ता थी।
स्टेशन मास्टर ने एक नजर अपनी घड़ी पर डाली फिर वेंकटेश्वर की ओर देखा उन्हें लगा, हो न हो ये लड़का सच बोल रहा हो। अभी गुड़िवाड़ा पैसिंजर के आने में समय है। तब तक ट्रैक की जाँच करवा लेते हैं।
स्टेशन मास्टर को सोच में पड़े देख वेंकटेश्वर ने एक बार फिर कहा - ‘सर, आने वाली ट्रेन को रोक दो।’उसे लगा बच्चा समझकर स्टेशन मास्टर उसकी बात पर कहीं ध्यान न दें।
स्टेशन मास्टर तेजी से एक्शन में आ गए उन्होंने तुरंत ट्रैक की जांच करने वाले कर्मचारियों को बुलाया। फिर वेंकटेश्वर की ओर इशारा करते हुए कहा - ‘इस लड़के के साथ जाओ और देखो, ट्रैक कहाँ खराब है। केबिन के आगे ट्रैक में कहीं कोई गड़बड़ है। जल्दी देखकर मुझे सूचना दो। गुड़िवाड़ा पैसिंजर आने वाली है। मैं यहाँ तुम्हारी खबर का इंतजार कर रहा हूँ।
वेंकटेश्वर उनके साथ तुरंत चल पड़ा। उसे खुशी थी कि स्टेशन मास्टर ने उसकी सूचना पर एकदम भरोसा नहीं किया तो उसे गलत भी नहीं माना। उन्होंने तथ्यों की जाँच के लिए इन कर्मचारियों को उसके साथ भेज दिया। अब वह उन कर्मचारियों को बता रहा था कि कैसे वह केबिन मैन को बताने गया था मगर उनके न मिलने पर वह दौडता हुआ पेड़ना स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँचा।
बातों - बातों में वे केबिन से आगे उस स्थान तक आ पहुँचे। टूटे टैªेक को देखते ही रेलकर्मियों ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि वास्तव में वेंकटेश्वर की खबर बिलकुल सही थी। टैªेक में खराबी थी। आने वाली गाड़ी को रोक दिया जाए। स्टेशन मास्टर ने गुड़िवाड़ा से पेड़ना आ पहुँची, पैसेंजर ट्रेन को लाल सिग्नल दिखाकर रोका दिया।
स्टेशन के पास तक आ पहुªँची ट्रेन के रुक जाने से यात्री उतर - उतर कर आने लगे। कारण जानने पर उन्हें पता लगा कि नन्हें साहसी बालक की सूझबूझ के कारण एक टेªन हादसा होने से बच गया। सभी वेंकटेश्वर की प्रशंसा करने लगे। लगभग एक घंटे बाद ट्रैक सही होने पर ट्रेन आगे बढी।
अगले दिन ‘वार्ता’ समाचार एजेंसी ‘आंध्र ज्योति’ ‘आंध्र भूमि’ ‘विशाल आंध्रा’ आदि अनेक समाचार पत्रों में वेंकटेश्वर की साहस और सूझबूझ की सराहना करते हुए घटना का विवरण प्रकाशित किया। पेड़ना की म्यूनिसिपल चेयरपर्सन पदमजा कुमारी व उसके बार्ड कौंसलर वी. वेणुगोपाल राव ने वेंकटेश्वर के साहस को सलाम करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस परेड ग्राउण्ड में सारे जिले के गणमान्य लोगों के बीच वेंकटेश्वर की सूझबूझ धैर्य और हिम्मत की तारीफ करते हुए जिलाधिकारी के. प्रभाकर रेड्डी ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त तेरह बर्षीय बालक त्रिनाथ को भी याद किया।जिसने इसी प्रकार टूटे ट्रैक की सूचना सही समय पर देकर एक बड़ी दुर्घटना होने से बचाई थी।
विद्यालय के प्रधानाचार्य व जिलाधिकारी द्वारा वेंकटेश्वर का नाम भी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली भेजा गया। नारागनी वेंकटेश्वर राव को 2005 में यह पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी ने अपने हाथों से प्रदान किया।
नन्हे दोस्तो -
मुðी में हम किस्मत रखते मंजिल अपनी पाँवों में,
घर हो अथवा बेघर हों शहरों में हों या गाँवों में,
पर्वत सागर तूफाँ बिजली चाहे कैसी बाधा हो,
हर इच्छा पूरी होगी , आ देखे अपनी चाहों में,
सारे इलाके के बच्चे वहीं के खुले मैदान में खेलते थे। बड़े बच्चे क्रिकेट खेलते, छोटे बच्चे उसे देखते या खुद किसी छोटी मोटी टीम का हिस्सा बन जाते और किसी कोने में खेलने लगते। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही वहाँ बच्चों का जमावड़ा लग जाता।
बस खाने के समय या उससे कुछ पहले बच्चे वहाँ से फुरसत पाकर घर आ जाते। किसी के घर से स्वीकृति मिल जाती तो कोई चुपके से बहाने बनाकर आ जाता। जिन्हें देर हो जाती तब तक उनकी जगह दर्शकों में से किसी से भर जाती। आपके पास खेल का सामान हो या न हो तो भी आप वहाँ जा सकते हैं। आपको खेलने का अवसर मिलने की पूरी संभावनाएं होती हैं।
वेंकटेश्वर और उसके दोस्त तो अक्सर छुट्टी के दिन वहाँ जाते थे। उसके स्कूल ब्रहमपुर के अनेक लड़के वहाँ खेलने आते थे।उनके साथ वेंकटेश्वर को भी खेलने में अच्छा लगता था। इसी सिलसिले में अपनी व मित्रों की बातें करते हुए वे चले जा रहे थे।
तभी रेलवे ट्रेक के किनारे एक प्लास्टिक की खाली बोतल पर वेंकटेश्वर की नजर पड़ी। हाथ में पकड़ी लकड़ी से अनायास ही उसने उसमें चोट मार दी। बोतल लड़खड़ाती हुई आगे पत्थरों के पास गिरी। आगे बढ़कर उसने उसको फिर हिट किया तो हवा में उछलती बोतल रास्ते के बीचोंबीच गिरी। वेंकटेश्वर ने उसमें फिर लकड़ी की चोट मारी तो बोतल उड़ती हुई रेलवे ट्रेक के बिलकुल बीच में जा गिरी। वह उसे उठाने के लिए फिर आगे बढ़ा। अब उसे इस खेल में मजा आने लगा था।
पहले उसने अपने दोस्त को ही बोतल उठाकर लाने के लिए इशारा किया। लेकिन उसके दोस्त ने मुँह पिचकाते हुए उससे कहा - ‘ छोड़ यार ! चलते हैं जल्दी, देर हो रही है।’
‘अभी चलते हैं’- कहता हुआ वेंकटेश्वर बोतल उठाने के लिए ट्रैक के बीच पहुँचा।
अचानक उसकी नजर पटरी के बीच पड़े खाली स्थान पर गई। पटरी के बीच कम से कम छह इंच का टुकड़ा था ही नहीं । उसने जल्दी से अपने मित्र को पास बुलाकर दिखाया और कहा - देख, इससे तो दुर्घटना हो सकती है। हमें इसकी खबर केबिन मैंन को करनी चाहिए।’
उसका दोस्त झुँझला गया और बोला - ‘ट्रैक टूटा है तो टूटा रहे, हमें क्या ? चलो खेलने चलते हैं।’
‘नहीं’ हमें इसकी सूचना देनी चाहिए।’ मैं तो जाऊँगां’। - वेंकटेश्वर बोला।
‘
तो तू जा, मैं तो चला खेल के मैदान में, खबर करके वहीं आ जाना।’ - उसका दोस्त यह कहकर आगे बढ़ गया।
वेंकटेश्वर उस भयावह पल की कल्पना करके काँप गया, जब उस ट्रैक पर कोई गाड़ी आ जाएगी और दुर्घटना हो जाएगी। अगर उसने समय रहते यह सूचना न पहुँचाई तो उस संभावित भयंकर दुर्घटना का जिम्मेवार वह स्वयं को समझेगा।यह सोचकर वह तेजी से केबिन की ओर दौड़ पड़ा।
केबिन उससे एक सौ पचास गज की दूरी पर था। वह दौड़ता हुआ केबिन के निकट जा पहुँचा।उसे उस समय वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। उसने आवाज भी लगाई,मगर कोई उत्तर न पाकर वह वहाँ से आगे की ओर दौड़ गया।केबिन मैन शायद वहाँ नहीं था या संभवता उस तक बच्चे की आवाज नहीं पहुँच पाई। जो भी हो।
अब वेंकटेश्वर आगे ही आगे दौड़ता चला जा रहा था। उसका लक्ष्य पेड़ना रेलवे स्टेशन था जो वहाँ से सामने दिखाई दे रहा था। उसके पैरों में मानो पंख लग गए। जब वह हाँफता हुआ प्लेटफार्म पर चढ़ा तो उसकी नजर सीधी स्टेशन मास्टर के कमरे की ओर थी।
उसे तेजी से इस तरह भागते देख कई लोग उसकी ओर देखने लगे क्योंकि उस समय कोई ट्रेन प्लेटफार्म पर नहीं थी। मगर उसने उन सब की परवाह नहीं की। जब वह धड़धड़ाते हुए स्टेशन मास्टर के कमरे में घुसा तो कुर्सी पर बैठे स्टेशन मास्टर चैंक गए और प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगे।
वेंकटेश्वर के मुँह से टूटे - फूटे शब्दों में निकला - ‘वह... वहाँ...टूटा है।’
स्टेशन मास्टर ने पूछा - ‘अरे’ जरा साँस तो ले लो। क्या कहाँ टूटा है ?’
इतनी देर में अपनी साँसों को व्यवस्थित करते हुए वेंकटेश्वर स्टेशन मास्टर से फिर बोला -‘ट्रैक... ट्रैक टूटा है आगे, आने वाली गाड़ी को रोक दो।’
स्टेशन मास्टर ने चैंकते हुए पूछा - ‘कहाँ, किस जगह की बात कर रहे हो?’
‘यहीं केबिन से थोड़ा आगे,पटरी के बीच खाली जगह है।’ - वेंकटेश्वर के स्वर में दृढ़ता थी।
स्टेशन मास्टर ने एक नजर अपनी घड़ी पर डाली फिर वेंकटेश्वर की ओर देखा उन्हें लगा, हो न हो ये लड़का सच बोल रहा हो। अभी गुड़िवाड़ा पैसिंजर के आने में समय है। तब तक ट्रैक की जाँच करवा लेते हैं।
स्टेशन मास्टर को सोच में पड़े देख वेंकटेश्वर ने एक बार फिर कहा - ‘सर, आने वाली ट्रेन को रोक दो।’उसे लगा बच्चा समझकर स्टेशन मास्टर उसकी बात पर कहीं ध्यान न दें।
स्टेशन मास्टर तेजी से एक्शन में आ गए उन्होंने तुरंत ट्रैक की जांच करने वाले कर्मचारियों को बुलाया। फिर वेंकटेश्वर की ओर इशारा करते हुए कहा - ‘इस लड़के के साथ जाओ और देखो, ट्रैक कहाँ खराब है। केबिन के आगे ट्रैक में कहीं कोई गड़बड़ है। जल्दी देखकर मुझे सूचना दो। गुड़िवाड़ा पैसिंजर आने वाली है। मैं यहाँ तुम्हारी खबर का इंतजार कर रहा हूँ।
वेंकटेश्वर उनके साथ तुरंत चल पड़ा। उसे खुशी थी कि स्टेशन मास्टर ने उसकी सूचना पर एकदम भरोसा नहीं किया तो उसे गलत भी नहीं माना। उन्होंने तथ्यों की जाँच के लिए इन कर्मचारियों को उसके साथ भेज दिया। अब वह उन कर्मचारियों को बता रहा था कि कैसे वह केबिन मैन को बताने गया था मगर उनके न मिलने पर वह दौडता हुआ पेड़ना स्टेशन मास्टर के कमरे में पहुँचा।
बातों - बातों में वे केबिन से आगे उस स्थान तक आ पहुँचे। टूटे टैªेक को देखते ही रेलकर्मियों ने स्टेशन मास्टर को सूचित किया कि वास्तव में वेंकटेश्वर की खबर बिलकुल सही थी। टैªेक में खराबी थी। आने वाली गाड़ी को रोक दिया जाए। स्टेशन मास्टर ने गुड़िवाड़ा से पेड़ना आ पहुँची, पैसेंजर ट्रेन को लाल सिग्नल दिखाकर रोका दिया।
स्टेशन के पास तक आ पहुªँची ट्रेन के रुक जाने से यात्री उतर - उतर कर आने लगे। कारण जानने पर उन्हें पता लगा कि नन्हें साहसी बालक की सूझबूझ के कारण एक टेªन हादसा होने से बच गया। सभी वेंकटेश्वर की प्रशंसा करने लगे। लगभग एक घंटे बाद ट्रैक सही होने पर ट्रेन आगे बढी।
अगले दिन ‘वार्ता’ समाचार एजेंसी ‘आंध्र ज्योति’ ‘आंध्र भूमि’ ‘विशाल आंध्रा’ आदि अनेक समाचार पत्रों में वेंकटेश्वर की साहस और सूझबूझ की सराहना करते हुए घटना का विवरण प्रकाशित किया। पेड़ना की म्यूनिसिपल चेयरपर्सन पदमजा कुमारी व उसके बार्ड कौंसलर वी. वेणुगोपाल राव ने वेंकटेश्वर के साहस को सलाम करते हुए उसे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर पुलिस परेड ग्राउण्ड में सारे जिले के गणमान्य लोगों के बीच वेंकटेश्वर की सूझबूझ धैर्य और हिम्मत की तारीफ करते हुए जिलाधिकारी के. प्रभाकर रेड्डी ने प्रशंसा पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने वर्ष 2000 में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्राप्त तेरह बर्षीय बालक त्रिनाथ को भी याद किया।जिसने इसी प्रकार टूटे ट्रैक की सूचना सही समय पर देकर एक बड़ी दुर्घटना होने से बचाई थी।
विद्यालय के प्रधानाचार्य व जिलाधिकारी द्वारा वेंकटेश्वर का नाम भी राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली भेजा गया। नारागनी वेंकटेश्वर राव को 2005 में यह पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी ने अपने हाथों से प्रदान किया।
नन्हे दोस्तो -
मुðी में हम किस्मत रखते मंजिल अपनी पाँवों में,
घर हो अथवा बेघर हों शहरों में हों या गाँवों में,
पर्वत सागर तूफाँ बिजली चाहे कैसी बाधा हो,
हर इच्छा पूरी होगी , आ देखे अपनी चाहों में,
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