Tuesday, 4 August 2015


होती जातीं हैं सतत, हमसे ऐसी भूल,
मन दर्पन धुँधला हुआ,हमें झाड़नी धूल,
दुनियाँ से होकर अलग, करना काम विशेष,
आएं वापस लौटकर, जग हो अपना देश,
बदल जाए इस जगत से, अपना यह व्यवहार,
करना है कुछ दिन हमें, खुद से साक्षात्कार,
दौड़ भाग संसार की, चली रहे अविराम,
पर मैं इससे ले रहा, कुछ दिन का विश्राम,
कल बेहतर हो इसलिए, मित्र विदा दो आज,
समझो सर्विस के लिए, जाता हूँ गैराज,

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