Tuesday, 4 August 2015


कितनी बढ़ गई दीमक,छत पे चढ़ गई दीमक,
चौखटों दीवारों पर, लो पसर गई दीमक,
हम तो बचके चलते थे,देखकर निकलते है,
बस जरा नज़र चूकी, काम कर गई दीमक,
मकड़ियों के जालों की,क्या ख़ता उजालों की,
हम ही देख ना पाए, घर में भर गई दीमक,
सागवान शीशम भी, भरभरा के गिर जाएं,
एक बार अंदर से, जो गुजर गई दीमक,
मिलके साथ रहती है, नोंचके खा जाती है,
छत से ही नहीं दिल से पर उतर गई दीमक,
एक काम कर लेना,इंतजाम कर लेना,
खोखला ही करती है,बस जिधर गई दीमक,
चूके तो मिटा देगी,साफ लिखा था जिसको,
मैं न पढ़ सका था पर इसको पढ़ गई दीमक,
दोस्तो खबर रखो, हर तरफ नज़र रखो,
जब किया तो देखो फिर किधर गई दीमक,

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