Tuesday, 4 August 2015

लील गई लहरें - मोनिका

‘ दीदी कहाँ जा रही हो ? - रितु ने अपनी बडी बहन को बर्तन और कपडे समेटते देखा तो पूछ लिया।
‘ये बर्तन और कपडे धोने चलना है नदी पर, चलो इधर आओ, कुछ बर्तन तुम भी उठाकर ले चलो’ - मोनिका ने रितु को पास बुलाते हुए कहा।
उससे छोटी बहन निकिता जो वहीं खेल रही थी, झट से बोल पड़ी - ‘दीदी, मैं भी चलूँ।
हाँ, आ जाओ ,ये कपडे उठा लो।’- मोनिका ने उसे भी चलने की अनुमति देते हुए कहा।
बडी बहन गरिमा की शादी के बाद घर की सारी जिम्मेदारी का भार मोनिका के कंधों पर ही आ चुका था। उसके पिता विकलांग थे और माँ अक्सर बीमार ही रहती। घर की आय का एकमात्र óोत सैनिक रहे दादा की पेंशन थी। दादी रही नहीं ं थी और अठत्तर साल के दादा के जीवन का भी कोई ठिकाना नहीं था। पता नहीं कब उस बूढ़े पेड़ की छाया और सहारा इस परिवार को मिलना बंद हो जाए।
ऐसे में सत्तरह साल की मोनिका ही थी जो इस परिवार की धुरी के रूप में गृहस्थी की गाड़ी खींच रही थी। तीन महीने पहले बड़ी बहन गरिमा की शादी में जिस जिम्मेदारी से उसने बढ़ - चढ़कर काम किया, उसे देखकर गाँव कालेश्वर के लोगों ने उसकी बड़ी तारीफ की।
बातें करते - करते तीनों बहनें गाँव से लगभग चार सौ मीटर दूर बहने वाली अलकनंदा नदी के पास पहुँचीं। मोनिका कपड़े धोने में लग गई और दोनों बहनें खेल में।
अलकनंदा नदी का प्रवाह गर्मी के बावजूद पहाडी इलाका होने के कारण काफी तेज था। अचानक निकिता ने रितु से पूछा - ‘ दीदी, ये अलकनंदा नदी कहाँ से आती है?
‘हमें नहीं पता, आओ चलो, दीदी ग्यारहवीं में पढ़ती है,उससे चलकर पूछते हैं’- रितु ने मोनिका की तरफ इशारा करते हुए कहा और वे दोनों दौड़कर मोनिका के पास पहुँचीं।
उन्होंने पूछा - ‘दीदी, हमें यह बताओ, ये अलकनंदा नदी कहाँ से निकलती है?
बद्रीनाथ धाम से ऊपर शतपथ और भगीरथ खड़क नाम के हिमनदों से निकलती है हमारी ये अलकनंदा, अब जाओ और खेलो जा के... - मोनिका ने उन्हें समझाया।
जहाँ मोनिका कपड़े धो रही थी वहीं पास में गाँव का दस साल का लड़का साहिल भी था। वह नदी में नहाने रहा था। मोनिका ने एक बार उसे किनारे पर ही रहने की हिदायत दी।
नहाते - नहाते अचानक साहिल का पैर उखडा और वह अलकनंदा के तेज बहाव में बहने लगा। पहले तो उसने स्वयं सँभलने की कोशिश की। मगर जब वह सफल न हुआ तो - ‘दीदी बचाओ’ ‘बचाओ दीदी’ की गुहार लगाने लगा।
कपड़े धोती मोनिका ने आवाज सुनकर नजरें उठाई तो देखा साहिल नदी की तेज धारा में बेसहारा बहने लगा था।
मोनिका ने तुरंत कपड़े छोड़े और तेजी से नदी के किनारे - किनारे दौड़ती हुई साहिल के पास पहुँची। अंदाजा लगाकर वह अलकनंदा की हरहराती तेज धारा में कूद गई। जल्दी ही उसने साहिल को जा पकड़ा।
अब नदी के तेज प्रवाह का सामना करते हुए उसे साहिल को सुरक्षित किनारे तक लाना था।
अलकनंदा का तेज प्रवाह उसे सँभलने नहीं दे रहा था। साहिल बुरी तरह उससे चिपटा हुआ था। ऐसे में साहिल और खुद को बचा पाना मोनिका के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था।
मोनिका ने सारी ताकत समेटते हुए साहिल को किनारे की ओर धकेला। उसने साहिल के बाल पकड़ कर उसे चट्टान की ओर चढ़ाया। साहिल ने झपट कर चट्टान का एक सिरा मजबूती  से पकड़ लिया। वह बुरी तरह हाँफ रहा था।
अब मोनिका ने ऊपर चढ़ने की कोशिश की। उसने एक झटके से ऊपर की ओर एक बड़े पत्थर पर चढ़ने के लिए छलांग लगाई। दुर्भाग्य से पता नहीं पैरों के नीचे कोई दलदली जमीन आई या कोई नुकीला पत्थर जिससे उसका पैर अचानक मुड़ गया और वह लड़खड़ा गई।
इतना समय बहुत था। पानी के तेज प्रवाह नेेे उसे सँभलने का मौका नहीं दिया। अब तक रितु और निकिता भी दौड़कर वहाँ ऊपर आ चुकी थीं। पर वो भी दूर से ‘दीदी’ ‘दीदी’ चिल्ला कर रह गईं, कुछ न कर सकीं। उनके देखतेे-देखते मोनिका अलकनंदा की भीषण लहरों में डूबती उतराती बहती चली गई।      
दोनों बहने और साहिल बदहवास दौड़ते हुए घर पहुँचे और उन्होंने सब हाल कह सुनाया। पर घर में ऐसा था कौन जो सुनकर कुछ कर पाता। वहाँ थे बीमार माँ, विकलांग पिता, बूढ़े दादा और छोटा भाई
मोनिका के चाचा गाँव के प्रधान थे उन्होंने शीघ्र ही पुलिस थाना कर्णप्रयाग में फोन से सूचना दी और गाँव वालों को लेकर अलकनंदा की ओर चल पड़े। मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
अलकनंदा में वहाँ से दस किलोमीटर आगे तक कई दिनो ं की खोज के बाद भी मोनिका का कोई अता पता न लग सका। सारा गाँव शोक में डूब गया। उसका परिवार तो बेसहारा सा हो गया। हर   घर में मोनिका की कर्मठता बहादुरी और कार्यकुशलता के चर्चे थे।
मोनिका के चाचा गाँव के प्रधान हरीश चैहान ने सारे घटनाक्रम का ब्योरा समाचार पत्रों की कटिंग व एफ आई आर के साथ विधिवत भर कर राष्ट्रीय बाल कल्याण परिषद नई दिल्ली को भेजा। मोनिका ने अपनी जान पर खेल कर साहिल के प्राणों की रक्षा की थी।उसकी बहादुरी की सराहना की गई और इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उसे देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा मरणोपरांत राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया गया।

नन्हे दोस्तो -

बैेठे भला रहें कैसे, जब कोई सामने डूबे,
होने ना देंगे पूरे हम, मौत के भी मंसूबे,
रहे जान या जाए इसमें भला कौन सी अड़चन,
वक्त पड़े तो दे देते हम, ये नन्हा सा जीवन,




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