Tuesday, 4 August 2015

हमें राष्ट्रीय स्तर पर एक बाल साहित्य अकादमी चाहिए

{ निम्नलिखित वक्तव्य अंतराष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन 18-19 अक्टूबर 2014 को उत्तराखण्ड बाल कल्याण साहित्य संस्थान खटीमा जिला ऊधमंिसंहनगर उत्तराखण्ड भारत में पढ़ा गया। जिसमें मैंने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास यानि नेशनल बुक ट्रस्ट्र नईदिल्ली के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था।}


मित्रो,

मैं अपनी बात की शुरुआत एक सच्ची घटना से करता हॅंू जो मुझे मेरे एक मित्र ने सुनाई थी। बरसों पूर्व जब वे दिल्ली से वाराणसी के बीच रेलवे के एक रिजर्व कूपे में सफर कर रहे थे। उनके सामने की बर्थ पर एक विदेशी सज्जन बैठे थे। जैसी कि स्वाभाविक जिज्ञासा हम सब की होती है उनकी भी हुई। उन्होंने अभिवादन किया। किताब पढ़ने में व्यस्त उन सज्जन ने जरा सी नज़रें उठाई और अभिवादन का उत्तर दिया और फिर पढ़ने में मशगूल हो गए।

मि़त्र के मन में अनेक प्रश्न कुलबुला रहे थे। सफर लंबा था और पड़ोसी सज्जन किताब से बाहर नहीं आ रहे थे।
मित्र ने उनसे दूसरा प्रश्न किया - आप किस देश के निवासी हैं ?
उन्होंने एक बार फिर धीरे से किताब के पृष्ठों से अपनी नज़रें जरा उपर कीं और संक्षिप्त सा उत्तर दिया - पोलॅैंड

मित्र महोदय ने अपना सामान वगैरह ठीक करके रखा, अब वे आराम से बैठे यह चाह रहे थे कि सहयात्री से कुछ बात करें मगर सहयात्री था कि किताब से बाहर आने का नाम नहीं ले रहा था।

धृष्टता करते हुए मित्र महोदय ने फिर एक प्रश्न कर दिया - क्या आप पहली बार भारत आए हैं?
नहीं दूसरी बार - जबाब देकर वे एक बार फिर किताब में खो गए।

अंग्रेजी भाषा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर जब ंिहंदी में मिले तो मित्र महोदय की उत्सुकता और भी ज्यादा बढ़ गई।
फिर तो जैसे मित्र के सब्र का बांध ही टूट गया।
उन्होंने एक साथ दो प्रश्न दाग दिए - आपको भारत कैसा लगा ? आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?

लगातार हो रहे प्रश्नों के वार से वे सज्जन समझ गए कि ये व्यक्ति उसे पढ़ने नहीं देगा। उन्होंने अपनी किताब को एक तरफ रख दिया और पूरे मन से बात करने के मूड में आ गए।

विदेशी सज्जन ने कहा - मुझे तो भारत जैसा लगा है मैं बताता हूॅ मगर पहले आप मुझे ये बताओ कि आपको भारत कैसा लगा ?

मित्र महोदय चैंके - मुझे कैसा लगा ? हँँसते हुए बोले - मैं तो यहाँ रहता ही हँू।

विदेशी सज्जन ने कहा - रहते तो हो, मगर जानते भी हो कुछ भारत के बारे में ?

मित्र बोले - हाॅं हाॅं क्यों नहीं, पूछिए आप ? क्या जानना चाहते हैं ?

जरा बताएं आप, जिस वाराणसी में जा रहे हैं उसे वाराणसी क्यों कहते हैं ?-विदेशी सज्जन ने प्रश्न पूछा।
यह वरुणा और असी नाम की दो नदियों के पास बसा है इसलिए इसे वाराणसी भी कहते हैं वैसे इसके और भी नाम हैं....-मित्र ने मुस्कराते हुए तत्काल उत्तर दिया।

फिर एक-एक करके प्रश्नों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो देश के अन्य राज्यों की ओर जाने लगा।
अब तो मित्र महोदय को पसीना छूटने लगा।

क्योंकि जिस राज्य में हम रहते हैं या जिससे वास्ता होता है उसके बारे में हमको अमूमन पर्याप्त जानकारी होती है मगर अन्य राज्यों की जानकारी को लेकर हम प्रायः कूपमंडूक ही होते हैं।

यही हाल उन मित्र महोदय का हुआ। धीरे-धीरे जबाब चुकने लगे और एक समय आया जब मित्र महोदय सोचने लगे कि कहाँ मैंने इससे पंगा ले लिया इससे तो अच्छा था कि मैं चुप ही रहता।

जब मित्र के उत्तर की जगह मौन ने ले ली तब उन विदेशी सज्जन ने कहा - आपको तो अपने देश की संस्कृति के बारे में नहीं पता। आइए मैं बताता हूँ कि आपके देश की संस्कृति क्या है ?

फिर एक - एक करके उन्होंने जो भारत के बारे में बताना शुरू किया तो मित्र महोदय के दिमाग के परखच्चे उड़ने लगे।
उन्हें लगा कि उनका देश के बारे में ज्ञान कितना थोथा था। वे अपने देश के बारे में कुछ भी तो नहीं जानते और बिना जाने उस पर गर्व करते हैं।

यहाॅ हम आपको ये बताते चलें कि मित्र महोदय राष्ट्रीय स्तर की सांस्कृतिक संस्था में कार्यरत थे और इस घटना से सबक लेते हुए उन्होंने स्वयं को सुधारा, अक्सर वे यह वाकया मित्रों को बताते हैं जिसने उनके जीवन में परिवर्तन ला दिया।
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मित्रो, एक बार सोचें, बच्चों को अगर छोड़ दें तो कमोवेश यह स्थिति कहींे न कहीें हमारी भी तो है।

जब मैंने यह घटना प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘बालभारती’ की संपादक विभा जोशी को बताई तो उन्होंने मुझसे बच्चों को देश की संस्कृति की जानकारी देने के लिए एक श्रंृखला लिखने का आग्रह किया और ‘रंगरंगीला देश’ के नाम से यह लगातार लगभग तीन वर्ष तक ‘बालभारती’ में चली और बेहद लोकप्रिय हुई।

हम आज भी कितना कम जानते हैं अपने देश के बारे में... इसकी समृद्ध संस्कृति के बारे में...

विड़ंवना यह है कि जब हम आम तौर पर देश के बालसाहित्य की बात करते हैं तो केवल ंिहंदी के बाल साहित्य की गिनती करने लगते हैं समग्र भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य की नहीें और जब बच्चे की बात करते हैं तो हमारी नज़र में जो छवि होती है वह ज्यादातर एक लड़के की होती है लड़की की नहीें...

राष्ट्रीय पटल पर हमारे पास आज ऐसी कोई नियमित बाल पत्रिका नहीं है जिसमें हम भारतीय भाषाओं के बालसाहित्य को एकसाथ देख सकें।

ऐसा भी नहीं कि कुछ काम न हुआ हो। इधर पिछले कुछ वर्षों में चैबीस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करने वाली संस्था साहित्य अकादमी ने बालसाहित्य में पुरस्कार की शुरुआत की है और विदेशी बालसाहित्य के अतिरिक्त अन्य भाषाओं से भी अनूदित करवा कर हिंदी के पाठकों को बालसाहित्य उपलब्ध करवाया हैं।

विशेषकर कथा साहित्य में जो हरिकृष्ण देवसरे जी के संपादन में ‘भारतीय बाल कहानियां’ के नाम से चार पुस्तकों का सेट वर्ष दो हजार नौ में आया। जिसमें असमिया, बांग्ला, डोगरी, अॅंग्रेजी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकड़ी, मणिपुरी, मराठी, मलयालम, मैथिली, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, राजस्थानी, सिंधी, तमिल, तेलगु और उर्दू से अनूदित प्रतिनिधि बाल कहानियाॅं हैं। उसका गर्मजोशी से पाठकों ने स्वागत किया। जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तब से तकरीबन हर वर्ष ही ये पुस्तकें पुर्नमुद्रित हुईं हैं।

ये स्थिति दर्शाती है कि ऐसी भारतीय भाषाओं की पुस्तकों के सेट अन्य विधाओं बालकविता, बालनाटक, संस्मरण, यात्रावृतांत, डायरी में भी आने चाहिए। मैं तो कहना चाहूँगा बल्कि इनके भी उपखंड़ों मसलन साहस कथाएं, हास्य कथाएं, जासूसी कथाएं, विज्ञान कथाएं आदि वर्गीकरण में भी उपलब्द्ध हों।

मेरे देखते - देखते दिल्ली में साहित्य अकादमी की पुस्तक खरीदने के लिए उसके कार्यालय से दूर स्थित उसके स्टोर में जाना पड़़ता था मगर अब उसके कार्यालय में ही बहुत सुन्दर ‘बुक शाॅप’ है। और अभी दिल्ली से चलते - चलते मुझे सूचना मिली कि अब दिल्ली के दो मेट्रो स्टेशनों पर भी वह अपनी पुस्तकें उपलब्द्ध कराएगी। वह भी पंद्रह प्रतिशत छूट के साथ। ये पहल स्वागत योग्य है। यहाॅ उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ऐसी पहल कुछ समय पूर्व कर चुका है।

मगर इसके भी पूर्व राष्ट्रीय फलक पर एक बाल पत्रिका की आवश्यकता है। जिसके माध्यम से समसामयिक बालसाहित्य से एक मंच पर परिचय हो सके। यह एक विडंबना ही कही जाएगी कि जिन बाल साहित्यकारों को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जाता है उनके बाल साहित्य से हमारा परिचय नहीें हो पाता है।
इस दिशा में साहित्य अकादमी को पत्र लिखकर व्यक्तिगत रूप से मैंने कुछ प्रयास किए हैं मगर अभी तक उस प्रयास के कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आए हैं।

यद्यपि राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नई दिल्ली यानि नेशनल बुक ट्रस्ट्र अटठाइस भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करता है और उसने ‘राष्ट्रीय बाल साहित्य केंद्र’ के नाम से बाल साहित्य संर्वधन के लिए अलग शाखा बना रखी है।
बाल पाठकों की पठन रुचि को बढ़ावा देने के लिए वह अनेक उपयोगी कार्यक्रम संचालित करता है। उसके माध्यम से ही ‘पाठक मंच बुलेटिन’ नामक बाल पत्रिका हिंदी व अंग्रेजी में निकलती है। जो कि चालीस हजार की संख्या में छपकर दूर दराज के पाठक वर्ग तक पहुँचती है,जो अन्य बाल पत्रिकाओं की प्रसार संख्या को देखते हुए वैसे तो काफी बड़ी संख्या है। मगर हमारे देश की जनसंख्या के पैंतीस प्रतिशत अठारह वर्ष तक के पैंतालिस करोड़ बच्चों के सामने यह संख्या भी ऊँट के मंुह में जीरा जैसी ही है।

‘पाठक मंच बुलेटिन’ के वर्ष के दो अंक देश के किसी राज्य के सुदूर क्षेत्र में जाकर बच्चों के साथ तैयार किए जाते हैं जिसमें कहानी, कविता, चित्र, लेख, मुखपृष्ठ सब कुछ बच्चों की भागीदारी से तय होता है। सौभाग्य से ऐसी ही एक कार्यशाला में हिमाचल प्रदेश के ऊना शहर से दूर दराज गाँव में बच्चों के साथ एक अंक तैयार करवाने का अवसर मुझे कुछ वर्ष पूर्व मिला।

एक समय था जब राष्ट्रीय बालभवन, नईदिल्ली द्वारा डा. मधु पंत के निर्देशन में बाल साहित्यकार सम्मेलन आयोजित किए गए। लगातार कई वर्षों तक चले इन सम्मेलनों में पढ़े गए पर्चे बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित किए गए। इनमें से कुछ सम्मेलनों में भाग लेने का अवसर मुझे भी मिला। डा. मधु पंत के वहाँ से जाने के बाद वह सिलसिला रुक गया। यहाँ हम आपको यह बताते चलें कि राष्ट्रीय बाल भवन का मुख्य कार्य बाल साहित्य के संर्वधन नहीं है। बाल प्रतिभा उन्नयन का है साहित्य उसका एक हिस्सा है। हाँ ऐसे बाल साहित्यकार सम्मेलन राष्ट्रीय स्तर पर बनी केंद्रीय हिंदी निदेशालय, हिंदी या अन्य भाषाओं की अकादमियां, राष्ट्रीयविज्ञान प्रसार आदि अनेक संस्थाएं कर सकतीं हैं।

कितनी बड़ी विसंगति है कि हमारी आजादी के छह दशक बीत जाने के बाद अभी कुछ महीने पूर्व ही हमारे सबसे स्वाभाविक पड़ोसी मित्र देश नेपाल का साहित्यिक प्रतिनिधि मंडल पहली बार हमारे देश की साहित्यिक यात्रा पर आया। साहित्य अकादमी के आमंत्रण पर मुझे उनसे मिलने और बात करने का अवसर मिला।

मुझे लगता है कि अब जबकि इस वर्ष का नोबेल शांति पुरस्कार एक बच्चे मलाला यूसुफजई को और ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के माध्यम से बाल अधिकारों के लिए लड़ने वाले कैलाश सत्यार्थी के रूप में पड़ोसी और हमारे देश के सामने आया है। अब हमारी सोच के केंद्र में बच्चे होने चाहिए।

जरा सोचें कि पैंतालिस करोड़ की विशाल संख्या के बीच हजार दो हजार की संख्या में किसी पुस्तक की प्रतियाँ छपवाकर हम किस तरह का भरम पाले बैठे हैं।

हमें राष्ट्रीय स्तर पर एक बाल साहित्य अकादमी चाहिए। जो न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य की बढ़ती माॅंग को पूरा करे बल्कि ज्यादा बाल साहित्यकार भी तैयार करे।

मित्रो, मुझे लगता है राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय भाषाओं के बाल साहित्यकारों के निकट आने से हमें अपने देश की बच्चों की आशाओं सपनांे और उनकी आकांक्षाओं को निकट से जानने का अवसर मिलेगा। हम और हमारे बच्चे अपनी सांस्कृतिक विविधता से रूबरू होकर अपनी अस्मिता अपनी पहचान अपने भारतीय मूल्यों से परिचित हो सकेंगे।


गत दिनों राजस्थान के बाल साहित्य पर केंद्रित ‘मधुमती’ पत्रिका का अंक पढ़ने को मिला। जिसके अनुसार राजस्थानी बाल साहित्य में बाल उपन्यास, कहानियाँ, कविताएं तो खूब मिलती हैं परंतु, रोमांच, जासूसी कहानियों की अनुपलब्द्धता का जिक्र किया गया था। वहीं अगर हम बांग्ला बाल साहित्य पर नज़र डालते हैं तो हमें एक से बढ़कर एक रहस्य रोमांच जासूसी की कहानियों की पूरी श्रंृखला दिखाई देती है।

दरअसल बंगाल में परंपरा रही है कि कोई साहित्यकार तब तक बड़ा साहित्यकार नहीं माना जाता है जब तक उसने बच्चों के लिए न लिखा हो। यही कारण है कि रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर सत्यजीत रे, आशापूर्णा देवी, सुकुमार राय, अवनीद्रनाथ टैगोर, समरेश बसु, सुनील गंगोपाध्याय, सुचित्रा भटटाचार्य, विभूतिभूषण वंधोपाध्याय, गुरुकिशोर घोष आदि अनेक नाम हैं जिन्होंने बच्चों के लिए उत्तम साहित्य रचा।

एक सर्वे में यह बात निकलकर सामने आई कि छह से नौ साल के बच्चे जीवनी पढ़ना पसंद नहीं करते हैं। दरअसल हमारे देश में आयु वर्ग के अनुसार लेखन की परंपरा उस तरह से नहीं रही जैसी अन्य देशों में हुई।  मगर अब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नईदिल्ली व अन्य संस्थाएँ इस दिशा में सँिक्रय हंै।

भारतीय बाल साहित्य में इस पर खूब काम हुआ हैं। असमिया बाल साहित्य में दिनेशचंद गोस्वामी कीे सौ वैज्ञानिकों के परिचय और कार्यों के बारे में ‘शताधिक महान बिजनानी’ नाम की पुस्तक उपलब्ध है। वही बांग्ला बाल साहित्य में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता की जीवनी ‘आमादेर निवेदिता’ के नाम से स्वामी विवेकानंद के जीवन और कार्यों पर शोध करने वाले शंकरीप्रसाद बसु ने लिखी है वही अवनींद्रनाथ टैगोर ने तो अपने बचपन की कहानी ही ‘अपन कथा’ के नाम से बच्चों के लिए लिखी।

मेरा उद्देश्य यहाँ पुस्तकों की गिनती करना नहीं बल्कि ये बताना है कि दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है और उससे भी अधिक तेजी से बढ़ रहीं हैं हमारे बच्चों की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं...

जमाना विशेषज्ञता का है। शिशु साहित्यकार, बाल साहित्यकार, किशोर साहित्यकार, से भी आगे बढ़कर हमें हर आयु - वर्ग के लिए विशेष विशेषज्ञ साहित्यकार की आवश्यकता है। हमारे देश का ही नहीं बल्कि विश्व का विशाल बाल पाठक हमारी ओर उत्सुक नयनों से निहार रहा है। हम कब उनके सपनों के पंखों को नई उड़ान नई ऊँँँँँँचाइयाँ देंगे। अभी ...कब...

मित्रो, कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने कहा था - ‘अरब के तीर तलवार की भाषा जानने वाले हमलावर सिपाहियों की अरबी और भारत के व्यापारिक वर्ग की हिंदी के मेल से इतनी प्यारी भाषा उर्दू का जन्म हुआ है’। तो क्या हम सभी भारतीय बाल साहित्यकार एक मंच पर आकर ऐसी भाषा, ऐसी संस्कृति अपनी आगामी पीढ़ी को नहीं दे सकते जिसमें भारत की समग्रता की खुश्बू हो ? क्यों नहीं दे सकते हैं ? दे सकते हैं।

देश के हर स्थान विशेष की अपनी अलग विशेषता है अपनी महक है। जो राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य अकादमी के सामूहिक और बेहतर प्रयासों से सामने निकलकर एक मंच पर  आएगी और देश के नौनिहालों के समग्र विकास में सहायक बनेगी।


 आप सब ने मेरी बातों को ध्यानपूर्वक सुना इसके लिए आप सब का धन्यवाद, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास यानि नेशनल बुक ट्रस्ट्र नईदिल्ली का धन्यवाद जो उसने आप सबके बीच मुझे मेरे मन की बात कहने का मौका दिया।

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