Thursday, 15 September 2016

गर्मी की छुट्टी

उदित, नंदू, नंदिनी और सुनयना को गर्मी की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार था। क्योंकि इस बार उन्हें उनके ताऊजी ने गर्मी की छुट्टियां दिल्ली में आकर बिताने का आमंत्रण दिया था। जैसे ही छुट्टियों की तारीखों का पता चला उदित और नंदू उछल पड़े। मगर घर आकर उन्हें पता चला कि नंदिनी और सुनयना के स्कूलों की छुट्टियां कुछ दिन बाद होंगी। वे निराश हो गए। इसी बीच ताऊजी का फोन आया कि क्या तैयारी है ? जब उन्हें नंदिना और सुनयना की छुट्टियों के बारे में पता चला तो वे बोले-‘कोई बात नहीं। मैं तुम सबका ट्रेन से रिजर्वेशन करा देता हूं तुम लोग अपनी मम्मी के साथ आ जाना उदित, नंदू खुश हो गए। अब उनके पास समय था। उन्होंने इस बीच झटपट स्कूल द्वारा दिए गए छुट्टियों के काम को पूरा कर लिया।

पंद्रह दिन बाद नियत समय पर तैयार होकर वे सब ट्रेन में सवार होकर दिल्ली आ गए। दिल्ली में पड़ने वाली भयंकर गर्मी से एक पल निजात नहीं थी। उन्हें गांव के वे हरे-भरे वृक्ष और उनके नीचे की वो शीतल छांव याद आई। शुक्र था कि यहां गांव की तरह बिजली की आंखमिचैली नहीं थी।

ताऊजी के सामने भी समस्या थी कि दिल्ली में दर्शनीय स्थानों की तो भरमार थी मगर इस गर्मी में बच्चों को कौन से स्थान घुमाएं? घर से निकलते ही तेज धूप और बढ़ते पारे की तपिश घूमने का सारा मजा किरकिरा कर देती। मगर उन्होंने इसका हल पहले से ही निकाल रखा था। इसीलिए उन्होंने सभी बच्चों से अपने फोटो और स्कूल का पहचान पत्र लेकर दिल्ली आने को कहा था। अगले दिन ही उन्होंने कहा कि सभी अपने फोटो और पहचान पत्र ले लें हम सब राष्ट्रीय बाल भवन चल रहे हैं।

उदित ने पूछा-‘ताऊजी ये बाल भवन क्या है?

ताऊजी ने बताया-‘बाल भवन देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के द्वारा बच्चों को दिया गया उपहार है। इसमें लगभग वह सब कुछ है जो तुम अपने लिए सोच सकते हो।’
सबके मन में उत्सुकता थी। तभी सुनयना ने अपनी नन्हीं आवाज में पूछा-‘उसमें क्या-क्या है ताऊजी?

ताऊजी ने मुस्कराते हुए कहा-‘सुनयना, अभी नहीं बताऊँगा। अब जब तुम आ गए हो तो खुद ही चल कर देख लेना। अब ज्यादा बातें न करो सड़कों पर टैªफिक हो जाएगा हमें जल्दी निकलना है।’

बाल भवन में घुसते ही उनका सामना नन्हीं टेªन की पटरी से हुआ। जिसके सहारे चलते-चलते वे शीध्र ही छोटे से रेलवे प्लेटफार्म पर पहुंच गए।
‘ताऊजी, हम भी ट्रेन पर बैठेंगे।’-नंदिनी ने पूछा तो सबके कान उत्तर सुनने को तैयार हो गए।
‘हां, हां, क्यों नहीं अभी लो टिकट तो ले लो जरा’- ताऊजी की बात सुनते ही सबके चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे। अब उन्हें टेªन के आने की प्रतीक्षा थी। थोड़ी देर में बाल भवन के अंदर का चक्कर लगाकर आ गई। वे तेजी से दौड़कर उसमें चढ़े और सीट पर बैठ गए। जरा सी देर में ट्रेन ने एक जोरदार सीटी मारी और प्लेटफार्म छोड़ दिया।
अचानक नंदू ने सुनयना से कहा- ‘देखो दीवारों पर कैसे सुंदर चित्र बने हुए हैं।’
सुनयना के साथ अन्य कई बच्चों की नज़र भी उस ओर घूम गई।

उन्होंने देखा कि भारत के विभिन्न राज्यों के दर्शनीय स्थलों और वहां की विशेषताओं के चित्रों से दीवारें सजी हुई हैं।  वे इस ट्रेन के माध्यम से पूरे भारत की सैर कर रहे थे। तभी ट्रेन एक सुरंग से होकर गुजरी। रोमांच में कई बच्चे सीटी और तालियां बजाने लगे। कुल मिलाकर यह सफर बहुत रोमांचक रहा।

ट्रेन से उतर कर वे रजिस्ट्रेशन काउंटर की ओर बढ़े। फार्म भर कर जब उसमें फोटो लगाने की बात आई तो पता चला कि नंदू का एक फोटो तो घर पर ही छूट गया। अब क्या हो?
उदित नंदिनी और सुनयना ने अपने मनचाही गतिविधियों को चुन लिया। उदित ने   क्रिकेट और वाद-विवाद में, नंदिनी ने पेंटिंग और लोकनृत्य में और सुनयना ने शतरंज और फोटोग्राफी में भाग लिया। अपने-अपने मनचाही रूचि की गतिविधियों में भाग लेकर वे बहुत खुश थे। उनके जैसे अनेक लड़के और लड़कियां वहां मनचाही गतिविधियों में भाग ले रहे थे। उदित नंदिनी और सुनयना को बहुत मजा आया।

उस दिन तो नंदू ने बाल भवन को घूमकर देखा और पुस्तकालय में किताबें पढ़ी अगले दिन उसने भी अपनी मनचाही गतिविधि बैडमिंटन और कम्प्यूटर में भाग ले लिया।

इसी बीच लाइब्रेरी वाली नीता मैम ने बताया कि एक पांच दिन की कहानी सुनाने की कार्यशाला शुरू होने जा रही है। कहानी सुनने और सुनाने में तो सभी का मन लगता था सो उन्होंने झट से अपना नाम उसमें लिखवा दिया। उस कार्यशाला में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर उदित और नंदिनी को चुन लिया गया। अब उन्हें हजारों बच्चों के बीच आने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर बाल भवन में होने वाले कार्यक्रम को संचालित करना था। इतने बड़े अवसर के मिलने पर वे बहुत खुश थे। उन्होंने तैयारी शुरू कर दी। फिर वह अवसर भी आया तो मौके पर सुन्दर प्रस्तुति देकर उन्होंने सबकी वाहवाही लूटी। अब बालभवन के ग्रीष्मकालीन गतिविधियों का समापन हो चुका था।

एक दिन ताऊजी ने कमल मंदिर, इस्कान मंदिर और अक्षरधाम मंदिर के दर्शन कराए। इसी के साथ वे इंडिया गेट के पास चिल्ड्रेन पार्क भी गए। वहां लगे तरह-तरह के सुंदर झूलों में झूलकर वे बहुत खुश हुए। उन्होंने राष्ट्रपति भवन और संसद भवन की इमारतों को नजदीक से देखा। अब उनके वापसी का समय नजदीक आता जा रहा था कि तभी एक दिन ताऊजी ने उन्हें बताया कि कल हम सब आकाशवाणी दिल्ली के बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेने चलेंगे। सबको कोई न कोई कहानी या कविता सुनानी होगी।

वे सब बहुत खुश हुए। ये उनके लिए एक अनूठा अनुभव था। अगले दिन आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र पर पहुंचकर उन्होंने अपनी कविताएं और कहानियां सुनाईं। उन्हें यह देखकर और भी अच्छा लगा कि उसी दिन प्रधानमंत्रीजी का कार्यक्रम ‘मन की बात’ भी वहीं से प्रसारित हो रहा था। आज शाम की ट्रेन से उनका वापसी का रिजर्वेशन था। इस बार उनके पास अपने दोस्तों को सुनाने के लिए बहुत कुछ था।  

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