Thursday, 15 September 2016

तब और अब
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पेड़ नीम के दो ,
दरवाजे के सामने लगाए,
सोचा था छाया होगी,
ढेरों ऑक्सीजन आए,
रक्षा में ट्री गार्ड लगाए,
पानी दिया हमेशा,
समता किससे करे,
न कोई गुणकारी इस जैसा,
ईशकृपा से दोनों अबतक,
रहे सलामत भाई,
ऑक्सीजन भरपूर दे रहे,
दोनों देते छांई,
धूप और लू से जब जलता,
पथिक आश्रय पाता,
देख उसे तब मन मेरा,
मन ही मन में हरषाता,
दो वर्षों पहले थे इसके ,
ऐसे रूप निराले,
आज बड़े हो झूम रहे हैं,
ये दोनों मतवाले,

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