दिन के करीब तीन बजे का समय था। छुट्टी के बाद बच्चे स्कूल वैन में बैठकर घर जा रहे थे। वैन अभी रास्ते में थी। अचानक वैन में बैठे सभी बच्चे चैंक पडे। उन्हें सामने से शोर सुनाई दिया। एक आदमी साइकिल पकड़े आगे - आगे भागता चला आ रहा था। उसके पीछे लोगों की भीड़ शोर मचाती उसकी ओर पत्थर फेंकती चली आ रही थी। वैन के पास आते ही उसने साइकिल को वैन के ठीक सामने डाल दिया। अचकचाकर ड्राइवर ने वैन में ब्रेक लगा दिया।
वैन के रुकते ही वह व्यक्ति दौड़कर वैन में चढ़ गया। अब वह तेजी से ड्राइवर की सीट की ओर बढ़ा। उसके हाथ में एक पिस्तौल नजर आ रहा था। जिसे उसने वैन में चढ़ते ही अपनी जेब से निकाल लिया था। उसके हाथ में पिस्तौल देखकर पीछा करने वाली भीड़ डर कर रुक गई।
उसने वह पिस्तौल ड्राइवर के सिर पर लगाते हुए कहा - ‘जल्दी से बैक करके वैन को ले के चलो।’
पहले तो ड्राइवर ने मना किया लेकिन जब उसने पिस्तौल को सिर में मारते हुए फिर धमकाया तो घबराकर ड्राइवर ने वैन पीछे घुमाई और तेजी से आगे की ओर बढ़ा दी। वैन में पहली और दूसरी कक्षा के दस बच्चे बैठे थे। उसमें से एक ड्राइवर का बेटा भी था जो आगे बैठा था। एक आठवीं कक्षा की छात्रा गुंजन शर्मा भी वैन में थी जो कि पिछली सीट पर बैठी थी। मगर गड़बड़ होती देख वह पीछे से वैन में आगे आ गई।
अब वैन के सामने कोई नहीं था। वैन सड़क पर तेजी से भागी चली जा रही थी। पुलिस वैन का पीछा करने लगी थी। पकड़े जाने के डर से वैन के अपहरणकर्ता ने ड्राइवर से वैन को तेज और तेज चलाने के लिए कहा। वैन जब आगे एक चेकपोस्ट के पास से गुजरी तो वैन को इस बुरी तरह भागता देख एक सिपाही ने वैन रोकने के लिए कहा।
यह देख वह व्यक्ति चीखा - ‘हट जाओ सामने से’ ... और यह कहते कहते उसने पिस्तौल का रुख सामने किया और गोली चला दी। हड़बड़ी में वह गोली वैन में अंदर ही टकराई उसके छर्रे बिखर गए। उनमें से एक टुकड़ा गुंजन के हाथ में आ गिरा। उसने घबराकर उसे नीचे फेंक दिया। लगता उस व्यक्ति के सिर पर खून सवार था। पुलिस वाला डरकर पीछे हट गया।
आगे नागालैंड का बार्डर था जहाँ घने जंगलों का सिलसिला शुरू होता था। जब वैन जंगल के करीब से गुजरने लगी तो अपहरणकर्ता ने ड्राइवर को वैन वहीं एक किनारे पर रोक देने को कहा। ड्राइवर ने तुरंत वैन रोक दी।
अपहरणकर्ता तेजी से वैन से उतरने के लिए लपका। वैन से उतरते हुए अचानक कुछ सोचकर वह अंदर की ओर मुड़ा और उसने दो नन्हीं बच्चियों को पकड़ लिया। इस तरह अजनबी व्यक्ति द्वारा पकडने पर वे दोनों बच्चियां जोर - जोर से रोने लगीं। वैन में सवार अन्य बच्चे भी सहम गए।
‘ऐ चुप्प’ - अपहरणकर्ता गुर्राया।
कोई उपाय न देख वे गुंजन की ओर निरीह दृष्टि से देखती हुई चिल्लाईं - ‘बा आमक भोसुआ आमि की करी। मान टू एवक मारी दीवा’
गुंजन को लगा कि जैसे यह पुकारने वाली रोती हुई प्यारी बच्ची अनुष्का न होकर उसकी छोटी बहन नैन्सी है जो उससे मदद के लिए गुहार लगा रही है - ‘बचा लो न दीदी ये आदमी हमें मार देगा।’
गुंजन एकदम से आगे बढ़ी और उस व्यक्ति से बोली -‘अंकल, इन दोनों को छोड़ दो मुझे ले चलो मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ।’
कहते कहते उसने ड्राइवर की ओर इस आशा भरी नज़र से देखा कि उस समय वैन में उन सबसे बड़ा था शायद वह उनकी कोई मदद करेगा।
अपनी ओर गुंजन को ताकता हुए देख ड्राइवर बोला - ‘चली जाओ चली जाओ, कुछ नहीं होगा, ये तुम्हें छोड़ देंगे।’
गुंजन को एकबारगी बड़े जोर का गुस्सा आया। जिसे वह बड़ा समझ रही थी वह कितना छोटा निकला। बजाय बचाने के वह उसे खुद खतरे में जाने के लिए कह रहा था।
पुलिस पीछे आने वाली थी। अपहरणकर्ता के पास ज्यादा सोचने का समय नहीं था। उसने तत्काल गुंजन का हाथ पकड़ा और वैन से नीचे कूद गया।
वह गुंजन को लेकर सीधा उस घने जंगल में घुस गया। पुलिस द्वारा पकड़ लिए जाने के डर से वह तेजी से भागता चला जा रहा था जबकि तेरह साल की गुंजन उसके पीछे घिसटती चली जा रही थी। काँटेदार झाड़ियों में उसके कपड़े फँसते अटकते जा रहे थे। मगर वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह जल्दी से जल्दी आसाम पुलिस की पहुँच से दूर नागालैंड की सीमा में घुस जाना चाहता था।
कुछ देर बाद पेड़ों और झाड़ियों की घनी सीमा थोड़ी कम हुई क्योंकि आगे एक नदी थी। उसने बजाय सीधे रास्ते से जाने के जहाँ ज्यादा पानी भरा था वहाँ से गुंजन को लेकर जाना पसंद किया। उसने गुंजन को पानी में डुबा दिया और फिर उसे पानी में ही खींचता हुआ नदी पार करने लगा। शायद वह इस तरह अपने पावों के निशान न छोड़कर पीछे आनेवाली पुलिस का ध्यान बँटाना चाहता था। इसका पता तब और लगा जब उसने गुँजन की एक बाँह पकड़ कर आगे बढ़कर झाडियों के बीच एक बड़ा सा 8 बनाया। उसका इरादा न केवल पुलिस को बल्कि उसके साथ आने वाले कुत्तों को भी कनफ्यूज करने का था। काँटेदार झाड़ियों और मच्छर तथा कीड़ों के बीच इस तरह बेदर्दी से घसीटे जाने से गुंजन की चीख निकल गई। उसके कपड़े कई जगह से फट गए और शरीर में काँटे चुभ गए।
मगर अपहरणकर्ता ने इस बात की कोई परवाह न की। काफी देर चलने के बाद आगे बढ़ते - बढ़ते वह बाँसों के एक झुरमुट के नीचे रुका । अब तक वह स्वयं भी काफी थक चुका था। उसने गुंजन को वहाँ बैठाया और खुद भी लंबी - लंबी साँसें लेने लगा।
उसने गुंजन से कहा - ‘सुनो लड़की! अभी थोड़ी देर यहाँ बैठो। जब पुलिस ढूँढ़ कर चली जाएगी तो मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूँगा।’
काफी समय हो गया, अँधेरा घिर आया। 2013 की चार दिसंबर की वह रात अब गहराने लगी थी।
उधर पुलिस और तमाम लोग चुप नहीं बैठे थे। रात करीब डेढ़ बजे के करीब अचानक हलचल सी हुई। टार्च की रोशनियाँ चमकने लगीं और ‘गुंजन’ ‘गुंजन’ पुकारने की आवाजें पास आतीं जा रहीं थीं।
जबाब में गुंजन ने जैसे ही आवाज़ देनी चाही अपहरणकर्ता ने अपनी जेब से एक दूसरी पिस्तौल निकाली। उसने उसमें से कुछ गोलियां निकाल कर पहली पिस्तौल में डालते हुए उसको चुप रहने का इशारा किया। साथ ही उसके मुँह में पिस्तौल डालते हुए फुसफुसाया - ‘ अगर आवाज़ निकली तो इस पिस्तौल से भी आवाज़ निकलेगी।’ उसने दोनों पिस्तौलों से गुंजन को कवर किया हुआ था।
मुँह के अंदर पिस्तौल पड़ी होने के कारण गुंजन बोलने की स्थिति में नहीं थी। दोनों दम साधे बाँसों के झुरमुट के बीच पडे रहे और ढ़ूँढ़नेवाले पास से ढ़ूँढते हुए निकल गए।
जब वे कुछ दूर निकल गए तो अपहरणकर्ता ने गुंजन के मुँह से पिस्तौल निकाली और उससे कहा -‘तुम चुपचाप बिना आवाज़ किए यहीं शांत बैठी रहो।़ मैं अभी थोड़ी देर में लौटकर आता हूँ।’
गुंजन ने हाँ में सिर हिलाया तो अपहरणकर्ता ‘गुंजन’ ‘गुंजन’ की आवाज़ लगाता हुआ आगे जाकर उसी भीड़ में जा मिला।
गुंजन कुछ देर तक तो अपहरणकर्ता का इंतजार करती रही। मगर इसके बाद थकान और नींद से उसकी आँखें भारी होने लगीं। उसने सुन रखा था कि इस जंगल में हाथी और दूसरे खतरनाक जानवर भी रहते हैं मगर इस समय नींद के आगे उसके सारे डर दूर हो गए और अंधेरे में झाड़ियों के बीच वह सो गई।
सुबह जब आँख खुली तो उसने देखा कि अपहरणकर्ता अभी तक वापस नहीं आया था। गुंजन वहाँ से घर जाने के लिए जंगल से बाहर निकली। काफी देर इधर - उधर भटकने के बाद उसे कुछ चाय के बागान दिखाई दिए। जब वह बागान को पार कर रही थी तभी उसने कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनी तो वह उसी ओर चल दी।़ जहाँ आगे एक झोपड़ी दिखाइ्र दी जिसमें उसे कुछ लोग मिले।
गुंजन ने उनसे पूछा - ‘अंकल मेन रोड का रास्ता किधर है बता दें, मुझे अपने घर जाना है।’
उन लोगों ने जब एक लड़की को ठंड में भीगे कपड़ों में ऐसी बुरी हालत में देखा तो उसे आग के पास बैठाया। उसके लिए चाय बनाई और पुलिस को खबर कर दी।
खबर मिलते ही जोरहाट और डिब्रूगढ़ से पुलिस के बड़े अधिकारी वहाँ आ गए। उन्होंने बहादुर गुंजन को गले से लगा लिया। जिसने दो नन्हें बच्चों को बचाने के लिए खुद को अपहरणकर्ता को सौंप दिया था। दिसंबर की कड़ाके की ठंड में सारी रात घने जंगल में रही। भीगे कपड़ों में खतरनाक जानवरों के बीच... कई पुलिस अधिकारी की आँखें उसकी दिलेरी पर भर आईं।
आसाम के मुख्यमंत्री ने उसे दो लाख रुपए का पुरस्कार दिया।
उन्होंने प्रदेश स्तर पर प्रतिवर्ष ऐसी बहादुरी दिखाने वाले बहादुर बच्चे को ‘गुंजन शर्मा वीरता पुरस्कार’ दिए जाने की घोषणा भी की। गुंजन को देश के प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया गया।
नन्हें दोस्तो,
साहस कर आगे तो आओ, कदमों में आएगी मंज़िल,
मिल जाएगा हर मनचाहा, चाहोगे, होगा सब हासिल,
खो सकता है कूल किनारा, बने रहे ग़र यूँ ही गाफिल,
जीतेगा हर बाजी अपनी, हिम्मत का सरताज, मेरा दिल,
वैन के रुकते ही वह व्यक्ति दौड़कर वैन में चढ़ गया। अब वह तेजी से ड्राइवर की सीट की ओर बढ़ा। उसके हाथ में एक पिस्तौल नजर आ रहा था। जिसे उसने वैन में चढ़ते ही अपनी जेब से निकाल लिया था। उसके हाथ में पिस्तौल देखकर पीछा करने वाली भीड़ डर कर रुक गई।
उसने वह पिस्तौल ड्राइवर के सिर पर लगाते हुए कहा - ‘जल्दी से बैक करके वैन को ले के चलो।’
पहले तो ड्राइवर ने मना किया लेकिन जब उसने पिस्तौल को सिर में मारते हुए फिर धमकाया तो घबराकर ड्राइवर ने वैन पीछे घुमाई और तेजी से आगे की ओर बढ़ा दी। वैन में पहली और दूसरी कक्षा के दस बच्चे बैठे थे। उसमें से एक ड्राइवर का बेटा भी था जो आगे बैठा था। एक आठवीं कक्षा की छात्रा गुंजन शर्मा भी वैन में थी जो कि पिछली सीट पर बैठी थी। मगर गड़बड़ होती देख वह पीछे से वैन में आगे आ गई।
अब वैन के सामने कोई नहीं था। वैन सड़क पर तेजी से भागी चली जा रही थी। पुलिस वैन का पीछा करने लगी थी। पकड़े जाने के डर से वैन के अपहरणकर्ता ने ड्राइवर से वैन को तेज और तेज चलाने के लिए कहा। वैन जब आगे एक चेकपोस्ट के पास से गुजरी तो वैन को इस बुरी तरह भागता देख एक सिपाही ने वैन रोकने के लिए कहा।
यह देख वह व्यक्ति चीखा - ‘हट जाओ सामने से’ ... और यह कहते कहते उसने पिस्तौल का रुख सामने किया और गोली चला दी। हड़बड़ी में वह गोली वैन में अंदर ही टकराई उसके छर्रे बिखर गए। उनमें से एक टुकड़ा गुंजन के हाथ में आ गिरा। उसने घबराकर उसे नीचे फेंक दिया। लगता उस व्यक्ति के सिर पर खून सवार था। पुलिस वाला डरकर पीछे हट गया।
आगे नागालैंड का बार्डर था जहाँ घने जंगलों का सिलसिला शुरू होता था। जब वैन जंगल के करीब से गुजरने लगी तो अपहरणकर्ता ने ड्राइवर को वैन वहीं एक किनारे पर रोक देने को कहा। ड्राइवर ने तुरंत वैन रोक दी।
अपहरणकर्ता तेजी से वैन से उतरने के लिए लपका। वैन से उतरते हुए अचानक कुछ सोचकर वह अंदर की ओर मुड़ा और उसने दो नन्हीं बच्चियों को पकड़ लिया। इस तरह अजनबी व्यक्ति द्वारा पकडने पर वे दोनों बच्चियां जोर - जोर से रोने लगीं। वैन में सवार अन्य बच्चे भी सहम गए।
‘ऐ चुप्प’ - अपहरणकर्ता गुर्राया।
कोई उपाय न देख वे गुंजन की ओर निरीह दृष्टि से देखती हुई चिल्लाईं - ‘बा आमक भोसुआ आमि की करी। मान टू एवक मारी दीवा’
गुंजन को लगा कि जैसे यह पुकारने वाली रोती हुई प्यारी बच्ची अनुष्का न होकर उसकी छोटी बहन नैन्सी है जो उससे मदद के लिए गुहार लगा रही है - ‘बचा लो न दीदी ये आदमी हमें मार देगा।’
गुंजन एकदम से आगे बढ़ी और उस व्यक्ति से बोली -‘अंकल, इन दोनों को छोड़ दो मुझे ले चलो मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ।’
कहते कहते उसने ड्राइवर की ओर इस आशा भरी नज़र से देखा कि उस समय वैन में उन सबसे बड़ा था शायद वह उनकी कोई मदद करेगा।
अपनी ओर गुंजन को ताकता हुए देख ड्राइवर बोला - ‘चली जाओ चली जाओ, कुछ नहीं होगा, ये तुम्हें छोड़ देंगे।’
गुंजन को एकबारगी बड़े जोर का गुस्सा आया। जिसे वह बड़ा समझ रही थी वह कितना छोटा निकला। बजाय बचाने के वह उसे खुद खतरे में जाने के लिए कह रहा था।
पुलिस पीछे आने वाली थी। अपहरणकर्ता के पास ज्यादा सोचने का समय नहीं था। उसने तत्काल गुंजन का हाथ पकड़ा और वैन से नीचे कूद गया।
वह गुंजन को लेकर सीधा उस घने जंगल में घुस गया। पुलिस द्वारा पकड़ लिए जाने के डर से वह तेजी से भागता चला जा रहा था जबकि तेरह साल की गुंजन उसके पीछे घिसटती चली जा रही थी। काँटेदार झाड़ियों में उसके कपड़े फँसते अटकते जा रहे थे। मगर वह रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह जल्दी से जल्दी आसाम पुलिस की पहुँच से दूर नागालैंड की सीमा में घुस जाना चाहता था।
कुछ देर बाद पेड़ों और झाड़ियों की घनी सीमा थोड़ी कम हुई क्योंकि आगे एक नदी थी। उसने बजाय सीधे रास्ते से जाने के जहाँ ज्यादा पानी भरा था वहाँ से गुंजन को लेकर जाना पसंद किया। उसने गुंजन को पानी में डुबा दिया और फिर उसे पानी में ही खींचता हुआ नदी पार करने लगा। शायद वह इस तरह अपने पावों के निशान न छोड़कर पीछे आनेवाली पुलिस का ध्यान बँटाना चाहता था। इसका पता तब और लगा जब उसने गुँजन की एक बाँह पकड़ कर आगे बढ़कर झाडियों के बीच एक बड़ा सा 8 बनाया। उसका इरादा न केवल पुलिस को बल्कि उसके साथ आने वाले कुत्तों को भी कनफ्यूज करने का था। काँटेदार झाड़ियों और मच्छर तथा कीड़ों के बीच इस तरह बेदर्दी से घसीटे जाने से गुंजन की चीख निकल गई। उसके कपड़े कई जगह से फट गए और शरीर में काँटे चुभ गए।
मगर अपहरणकर्ता ने इस बात की कोई परवाह न की। काफी देर चलने के बाद आगे बढ़ते - बढ़ते वह बाँसों के एक झुरमुट के नीचे रुका । अब तक वह स्वयं भी काफी थक चुका था। उसने गुंजन को वहाँ बैठाया और खुद भी लंबी - लंबी साँसें लेने लगा।
उसने गुंजन से कहा - ‘सुनो लड़की! अभी थोड़ी देर यहाँ बैठो। जब पुलिस ढूँढ़ कर चली जाएगी तो मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूँगा।’
काफी समय हो गया, अँधेरा घिर आया। 2013 की चार दिसंबर की वह रात अब गहराने लगी थी।
उधर पुलिस और तमाम लोग चुप नहीं बैठे थे। रात करीब डेढ़ बजे के करीब अचानक हलचल सी हुई। टार्च की रोशनियाँ चमकने लगीं और ‘गुंजन’ ‘गुंजन’ पुकारने की आवाजें पास आतीं जा रहीं थीं।
जबाब में गुंजन ने जैसे ही आवाज़ देनी चाही अपहरणकर्ता ने अपनी जेब से एक दूसरी पिस्तौल निकाली। उसने उसमें से कुछ गोलियां निकाल कर पहली पिस्तौल में डालते हुए उसको चुप रहने का इशारा किया। साथ ही उसके मुँह में पिस्तौल डालते हुए फुसफुसाया - ‘ अगर आवाज़ निकली तो इस पिस्तौल से भी आवाज़ निकलेगी।’ उसने दोनों पिस्तौलों से गुंजन को कवर किया हुआ था।
मुँह के अंदर पिस्तौल पड़ी होने के कारण गुंजन बोलने की स्थिति में नहीं थी। दोनों दम साधे बाँसों के झुरमुट के बीच पडे रहे और ढ़ूँढ़नेवाले पास से ढ़ूँढते हुए निकल गए।
जब वे कुछ दूर निकल गए तो अपहरणकर्ता ने गुंजन के मुँह से पिस्तौल निकाली और उससे कहा -‘तुम चुपचाप बिना आवाज़ किए यहीं शांत बैठी रहो।़ मैं अभी थोड़ी देर में लौटकर आता हूँ।’
गुंजन ने हाँ में सिर हिलाया तो अपहरणकर्ता ‘गुंजन’ ‘गुंजन’ की आवाज़ लगाता हुआ आगे जाकर उसी भीड़ में जा मिला।
गुंजन कुछ देर तक तो अपहरणकर्ता का इंतजार करती रही। मगर इसके बाद थकान और नींद से उसकी आँखें भारी होने लगीं। उसने सुन रखा था कि इस जंगल में हाथी और दूसरे खतरनाक जानवर भी रहते हैं मगर इस समय नींद के आगे उसके सारे डर दूर हो गए और अंधेरे में झाड़ियों के बीच वह सो गई।
सुबह जब आँख खुली तो उसने देखा कि अपहरणकर्ता अभी तक वापस नहीं आया था। गुंजन वहाँ से घर जाने के लिए जंगल से बाहर निकली। काफी देर इधर - उधर भटकने के बाद उसे कुछ चाय के बागान दिखाई दिए। जब वह बागान को पार कर रही थी तभी उसने कुत्तों के भौंकने की आवाज सुनी तो वह उसी ओर चल दी।़ जहाँ आगे एक झोपड़ी दिखाइ्र दी जिसमें उसे कुछ लोग मिले।
गुंजन ने उनसे पूछा - ‘अंकल मेन रोड का रास्ता किधर है बता दें, मुझे अपने घर जाना है।’
उन लोगों ने जब एक लड़की को ठंड में भीगे कपड़ों में ऐसी बुरी हालत में देखा तो उसे आग के पास बैठाया। उसके लिए चाय बनाई और पुलिस को खबर कर दी।
खबर मिलते ही जोरहाट और डिब्रूगढ़ से पुलिस के बड़े अधिकारी वहाँ आ गए। उन्होंने बहादुर गुंजन को गले से लगा लिया। जिसने दो नन्हें बच्चों को बचाने के लिए खुद को अपहरणकर्ता को सौंप दिया था। दिसंबर की कड़ाके की ठंड में सारी रात घने जंगल में रही। भीगे कपड़ों में खतरनाक जानवरों के बीच... कई पुलिस अधिकारी की आँखें उसकी दिलेरी पर भर आईं।
आसाम के मुख्यमंत्री ने उसे दो लाख रुपए का पुरस्कार दिया।
उन्होंने प्रदेश स्तर पर प्रतिवर्ष ऐसी बहादुरी दिखाने वाले बहादुर बच्चे को ‘गुंजन शर्मा वीरता पुरस्कार’ दिए जाने की घोषणा भी की। गुंजन को देश के प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार प्रदान किया गया।
नन्हें दोस्तो,
साहस कर आगे तो आओ, कदमों में आएगी मंज़िल,
मिल जाएगा हर मनचाहा, चाहोगे, होगा सब हासिल,
खो सकता है कूल किनारा, बने रहे ग़र यूँ ही गाफिल,
जीतेगा हर बाजी अपनी, हिम्मत का सरताज, मेरा दिल,

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