Thursday, 15 September 2016

   कनउजी लोकोक्तियों में नारी

लोकोक्ति वह झरोखा है जिसके माध्यम से हम तत्कालीन समाज के आंतरिक स्वरूप को समझ सकते हैं। जहां हमारे ग्रंथों में यत्र नार्यस्तु पूजंते रमते तत्र देवता  लिखा गया वहीं हिंदी साहित्य में प्रसादजी की ‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो  से लेकर मैथिलीशरण गुप्तजी की ‘आंचल में है दूध और आंखों में पानी’ व निरालाजी की ‘वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे, इलाहाबाद के पथ पर ... तक हमें नारी के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। मगर इन सब से अलग कनउजी लोक साहित्य की लोकोक्तियों में नारी जीवन के विविध पहलुओं का जितना विशद मनोवैज्ञानिक व्यवहारिक रूप दिखाई देता है वह अपने आप में अनूठा है।
पुत्री, बहन, पत्नी मां व अन्य सामाजिक संबंधों में नारी को लेकर अनेक लोकोक्तियां प्रचलित हैं जिनके परिपेक्ष्य में नारी की सामाजिक स्थिति को बखूबी देखा जा सकता है। हमारे ग्रामीण समाज में लड़कियां जबतक पिता के घर में रहतीं हैं उनका बिना बनाव श्रंृगार के साधारण रूप में रहना उचित माना गया है। तभी तो कहा जाता है कि- ‘बाप की बेटी ,गूदर लपेटी,
परंतु जब यही लड़की ब्याह कर ससुराल आ जाती बहू बन जाती है तो उसका बनाव श्रंृगार उचित और लोक सम्मत होता है और कहा जाता है - लीपे पोते देहरिया और पहने ओढ़े मेहरिया,
गोकि लोकोक्तियों के शाब्दिक अर्थ ही नहीं होते उनके व्यापक अर्थ होते हैं। इनका प्रयोग जीवन के विविध क्षेत्रों में मिसाल के तौर पर किया जाता हैं। महिलाओं की वाचालता यानि अधिक बोलने की आदत की खासी आलोचना होती रही है। इस दृष्टि से कनउजी लोकोक्तियों में कई उदाहरण मिलते हैं।
जैसे-‘चटोर फोरै अपनो घरा, बतोर फोरै चार घरा,
 यानि कि चटोर स्त्री तो अपने घर को ही फोड़ती यानि अपने घर का ही नुकसान करती है जबकि वाचाल स्त्री चार घरों को फोड़ती है और जब तोड़ने फोड़ने की बात होगी तो जाहिर सी बात है कि ऐसी प्रवृत्ति की आलोचना भी होगी। कुछ महिलाएं जो अपने ऐसे स्वभाव के कारण विशेष तौर पर जानी जाती रहीं हैं और जिन पर कहने सुनने का कोई असर नहीं होता उन पर तीखे व्यंग्य लोकोक्तियों के माध्यम से किए गए।
एक उदाहरण देखें -‘दुतो दुतो कहां चलीं, खसम पूत कुसवाउन चलीं,
 अर्थात इधर की बातें उधर करने की आदत वाली स्त्री घर से निकल कर चल दी है। अब ये अपनी आदत के मुताबिक चुगली करेंगी और लोग इसके पति और पुत्र को कोसेंगे।
विवाह के बाद घर में परिवार की स्थितियों में बड़ा परिवर्तन आता है। जीवन के नए क्षेत्र में प्रवेश करने वाला नवयुवक द्वंद्व में फंस जाता है। उसके एक ओर जन्म देने वाली मां होती है जिसने पाल पोस कर इतना बड़ा किया होता है और दूसरी ओर होता है जवान उम्र का सहज आकर्षण। इस द्वंद्व में तलवार की धार पर चलता युवक व नववधू जरा भी संतुलन बरकरार रखने में चूके कि सुनने को मिलता है -
‘जब से आई कनलगू, तब से छूटी थनलगू,
सामाजिक मनोविज्ञान की दृष्टि से कनउजी लोकोक्तियों में नारी संबंधी सामाजिक रिश्तों पर भी प्रकाश पड़ा है। बेटे का बेटा और बेटी का बेटा दोनों के साथ किए गए व्यवहार में कहीं न कहीं सोच का अंतर साफ झलकता है। अगर ऐसा न होता तो भला लोक में यह उक्ति प्रचलन में क्यों आती -
‘पूत को पूत करेजे को टूक, धिय को पूत को पूत कठौती को टूक,
यानि बेटेे का बेटा तो कलेजे का टुकड़ा और लड़की का बेटा लकड़ी का टुकड़ा, इसके पीछे अन्य कारण तो होंगे ही साथ ही वंश परंपरा का नाम चलना, मोक्ष, पितृ तर्पण जैसी धार्मिक मान्यताओं का जुड़ाव तो लगभग साफ ही दिखाई देता है।
यह लोकोक्ति-
‘गिनन मैं न गूंथन मैं, मैं दूल्हा की मौसी,
 रिश्तों की सामाजिक मान्यता को, उसके पारिवारिक जीवन में महत्व को जहां प्रदर्शित करती है वहीं बहन के घर में भाई कुत्ता और ससुर के घर में जमाई...
कहकर कटु शब्दों में ऐसे रिश्ते को निंदित किया है। लोक मत के अनुसार ये लोग वहां ज्यादा दिन तक रहे तो सम्मान नहीं पाते।
यद्यपि आज समय बदल चुका है कनउजी समाज की नारी अपनी पारंपरिक छवि को तोड़कर उससे बाहर आने की भरपूर कोशिश कर रही है। हमारे भारतीय समाज में भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है वाली स्थिति रही है। ऐसे में आम परिवारों में पत्नी को खाने को दो वक्त की रोटी और पति का साथ मिलता रहे वह भी उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि से कम न था। लोक में प्रचलित यह उक्ति अपनी कहानी आप कह रही है- ‘अन्न की खक्क पिया की गारी ,जे ना मिटियौ नाथ हमारी’
इसका अर्थ है हे ईश्वर, मेरे घर में कभी खाद्यान्न की और मेरे पति की गालियों की कमी न रहने देना। यह लोकोक्ति पुरुष प्रधान समाज के अहम को तो संतुष्ट करनेवाली है मगर समाज में नारी की किस दयनीय स्थिति को प्रकट कर रही है, यह स्पष्ट है। वास्तविक स्थिति तो यह है कि हमारे समाज ने नारी को देवी कहकर दासी का दर्जा दिया है और उससे बिना अधिकार वाली रानी के जैसा व्यवहार किया है। नारी की परवशता उसकी शिक्षा और आथर््िाक स्वतंत्रता से दूर हो सकती है।
महिलाओं की वाचालता उनकी श्रृंगारप्रियता पर अनेक लोकोक्तियां कनउजी समाज में प्रचलन में रहीं हैं। कुछ उदाहरण  देखें - ‘ऐसे पै तौ ऐसी, काजर दए पै कैसी’
पीतर की नथनी पै इतनो गुमान, जो कहु सोने की होती तौ चलती उतान,
डेढ़ बाल कनपटी पै जूड़ा
दरअसल ये सीधे-सीधे बनाव श्रंृगार की उक्तियां न होकर सामाजिक तानेबाने में रची बसी अनेक स्थितियों का प्रतिबिम्बन हैं।
ऐसा नहीं कि महिलाएं ही आलोचना के शिकार हुए हैं वाचाल पुरुष भी लोक की वक्रदृष्टि से बच नहीं सके हैं। पुरुषों की ऐसी अनेक प्रवृत्तियों पर अंकुश के रूप में नीति का यह दोहा प्रचलन में है-
ढ़ीले हाथ कुल्हाड़ी मारै,
हंस के मांगै दम्मा,
पर तिरिया सै करै मसखरी,
तीनौैैैैैैैैै काम निकम्मा,    
यानि कि ढ़ीले-ढाले हाथों में कुल्हाड़ी पकड़कर लकडी़ चीरना, अपने दिए गए पैसों को हँसकर मांगना, दूसरे की स्त्री से मसखरी करना, ये तीनों काम निकम्मों के हैं।
सामाजिक कुप्रथाओं और रूढ़ियों पर भी लोकोक्तियों के माध्यम से प्रहार किए गए हैं। जैसे बेमेल विवाह को लेकर यह उक्ति देखिए-
जब बीबी भईं खाट कौ,
तब मियां चले घाट कौ,
बहुविवाह पर भी आक्षेप करती हुई यह उक्ति भी दर्शनीय है -
कांटो बुरो करील को,
औ बदरी को घाम,
सौत बुरी है चून की,
औ साझे को काम,
कनउजी लोक में उक्ति के रूप में ऐसे कहते हैं कि ‘सौत तौ चूनौ की नाहीं भली’ और ‘साझे की हंड़िया चैराहे पै फूटत’
समाज में विधवा नारी की स्थिति भी शोचनीय रही है। ऐसे में आर्थिक और धार्मिक रूप से परतंत्र बेसहारा नारी पर दया और सहानुभूति तो परिवार और समाज की होती है लेकिन उसका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं होता। जैसा कि यह लोकोक्ति स्वयं बयान कर रही है। कहते हैं -रांड कौ मांड़ै को आसरो,
मांड़ चावल के धोए हुए पानी को कहते हैं। प्राचीन परंपराओं रूढ़ियों की संवाहक बूढ़ी अनुभवी स्त्रियों की अपेक्षा नई रोशनी की बहुओं के बीच पाढ़ियों के अंतर्विरोध हमेशा से ही मुखर रहे हैं। जैसे कि इस लोकोक्ति में कहा गया है - ‘नौ सौ खेल बसंतो खेलैं,तिन्हैं सिखावैं चंदो,
मां और पत्नी के दो नारी रूपों के संबंधों को रेखांकित करती यह लोकोक्ति उनके मनोवैज्ञानिक स्वरूप को उदघाटित कर रही है। जरा देखें -‘अम्मा टटोवै पेट,मेहरिया टटोवै फेंट
बाहर से थका हारा व्यक्ति जब घर लौटता हैं तो मां उसके खाली पेट को देखती है सोचती है कि वह भूखा होगा जबकि पत्नी उसकी जेब देखती है कि कितना कमा कर लाया है। सास और बहू के पारस्परिक अंर्तद्वंद्व को देखकर ही शायद यह उक्ति प्रचलन में आई होगी-‘सास मरी बहू को ठौर’
महिलाओं की वाचालता को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है अक्सर ऐसे में मनमुटाव व पारिवारिक संघर्ष भी देखने को मिलते रहे हैं। सामाजिक जीवन में यह दृश्य आम हैं। तभी तो कहा जाता है-‘भुस मैं आगी बार जमालो दूर भई’
महिलाओं की वाचालता या छिद्रान्वेषी आदत धीरे-धीरे उनका स्वभाव बन गई। इसके पीछे के कारणों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि समाज के इस आधे हिस्से को हमने सिर्फ चूल्हे चैके तक ही महदूद कर दिया। उसकी जीवन उर्जा को निकलने का उचित मार्ग भी नहीं दिया। वह उर्जा इसी प्रकार विकृत होकर क्षरित हुई। पुरुष समाज ने गाली भी उसी को दी जबकि वह ही इसका जिम्मेदार था। ऐसी प्रवृत्ति पर ही तो यह लोकोक्ति कही गई है- कानी अपनो टिटरो नाहीं देखत,दुसरे की फुली निहात्त,
यानि अपना बड़ा दोष भी न देखना बल्कि दूसरे का छोटा दोष भी बहुत बडा करके बताना।
कनउजी लोकोक्तियों में नारी संबंधी उक्तियों को देखने से पता चलता है कि इनमें नारी के मां रूप को सर्वाधिक सम्मान से देखा गया है। सारी आलोचनाओं के बावजूद नारी की क्षमताओं का दायरा इतना विस्तृत है कि इसके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। जरा देखे यह लोकोक्ति तो जैसे अपनी कहानी आप कह रही है-
अम्मा पिसनहारी हुय के लरिका पाल लेत, बाप लखपती हुय के नाहीं पाल पाउत,
‘आस को बाप निराश की अम्मा’ नारी के विशाल मन और सम्माननीय क्षमताओं की ओर ही इंगित है।
संक्षेप में हम देखते हें कि कनउजी लोकोक्तियों में नारी जीवन के विविध पहलुओं उसकी सामाजिक स्थिति के बारे में बहुत जानकारी मिलती है। अभी तक उसके विचारों भावनाओं को विश्व समाज में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह अधिकारिणीं है। धीरे-धीरे सामाजिक जागरूकता के आते स्थिति में परिवर्तन भी आते जा रहे हैं। विख्यात ‘द सेकेंड सेक्स’ पुस्तक के अध्ययन से पता चलता है कि विश्व के सभी समाजों में कमोवेश यही स्थितियां हैं। देखिए निम्न लोकोक्ति समाज के इसी पुरुषवादी रवैए को तो दर्शाती है-
जोरू जोर की,नही तो और की,
आज तो बदले समय में पैर की जूती वाली उस छवि से निकलती हुई नारी आज हिमालय के शिखरों पर, सुदूर अंतरिक्ष में झंड़े फहरा रही है। विश्व के सभी समाजों में शैक्षिक आर्थिक व सामाजिक जागरूकता के आते उनकी स्थितियों में परिवर्तन आता जा रहा है।          
इस प्रकार हम देखते हैं कि कनउजी लोकोक्तियों में नारी के कई रूप उजागर हुए हैं। विभिन्न कुप्रथाओं रूढ़ियों व कुप्रवृत्तियों पर चोट की गई है। हल्के रूप में ये व्यंग्योक्तियां कनउजी समाज की तात्कालिक तस्वीर प्रस्तुत करने में सहायक हैं।


         

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