कथक के पर्याय - पंड़ित बिरजू महाराज
कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज का जन्म चार फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ था। इन्होंने नृत्य की आरंभिक शिक्षा अपने पिता अच्छन महाराज अपनी माँ व चाचा शंभू महाराज से ली। चैदह वर्ष की उम्र में ही वे दिल्ली संगीत भारती में नृत्य शिक्षक हुए।
1970 से कथक केंद्र से उन्होंने गुरू के रूप में अनेक शिष्यों को तैयार किया। उनके शिष्यों ने अपनी उत्कृष्ट कला से नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से लखनऊ घराने की कथक शैली को देश विदेश में लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने कथक शैली को अंतर्राष्ट्रीय नृत्य जगत में सुस्थापित किया।
उनकी कुछ प्रमुख नृत्य नाटिकाएं कुमार संभवम, गीतोपदेश, होरी, धूम मचायो रे, कथा रघुनाथ की, हव्वा खातून, गीत गोविंद हैं।
कथक के लिए पल - पल समर्पित सृजनशील पंड़ित बिरजू महाराज को उनकी सेवाओं के लिए 1966 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी ने ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया। वर्ष 1986 में ‘पदम भूषण’ व इसी वर्ष मध्यप्रदेश सरकार ने इन्हें ‘कालीदास सम्मान’ दिया। 1987 में वे पुनः ‘पदमविभूषण’ से सम्मानित हुए।
उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने 1974 में ‘अकादमी पुरस्कार’ व 1988 में अकादमी की ‘रत्न सदस्यता’ प्रदान की। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग ने 1994 में ‘यश भारती’ सम्मान दिया।
पंड़ित बिरजू महाराज इस समय कथक केंद्र नई दिल्ली में निदेशक वरिष्ठ गुरू के पद पर कार्यरत हैं। मेरी यहीं पर उनसे मुलाकात हुई। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर उन्होंने पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कुछ इस प्रकार दिए -
क्या कुछ छूट गया, जिसे अभी तक आपने नहीं किया ?
यह एक अंतहीन विद्या है, कला की प्यास है, जो कभी समाप्त नहीं होने वाली है।
जीवन के बारे में आप किस तरह सोचते हैं ?
जीवन जैसे गुरू के द्वारा दिया गया कोई कार्य है, जिसे अपने परिश्रम के द्वारा पूरा करने का प्रयास चलता रहे।
आपका प्रिय स्वप्न क्या है ?
मेरा प्रिय स्वप्न है कि यह कला फलती फूलती रहे। अच्छे शिष्यों के द्वारा यह कला नए शिखरों को छुए और नए प्रतिमान स्थापित करे।
और आपका दुःस्वप्न ?
शास्त्रीय नृत्य संगीत पर विदेशी असर न होने पाए और भारतीयता पर आँच न आए।
प्रेम के बारे में आपका क्या कहना है ?
प्रेम एक लगाव है, और हमें अपना कार्य , जिम्मेदारी , विद्या तथा ईश्वर से प्रेम होना चाहिए।
किस तरह की स्थितियाँ आप नापसंद करते हैं ?
बहुत भीड ़- भाड़, शोर, फालतू की बातें, ये सभी स्थितियाँ, कोई भी दिन जो संगीत की चर्चा के बिना हो मुझे पसंद नहीं है।
आपके आदर्श कौन - कौन रहे ?
मेरी माँ पिताजी और पूर्वज
कथक में भविष्य की आशा के रूप में आप किसका नाम लेना चाहेंगे ?
शाश्वती सेन, दुर्गा आर्या, मालती श्याम, किरण चैहान, वेरोनिक अजान, वैसे और भी नाम हैं जिनसे भविष्य के लिए आशा है। बाकी हमारे बेटे और भाई दीपक, जयकिशन, कृष्णमोहन और राममोहन तो हैं ही।
कथक का शास्त्र लिपिबद्ध होने में क्या प्रगति हुई है ?
ठुंमरी की एक किताब मेरे द्वारा छपवाई गई है, जिसमें बिंदादीन महाराज की रचनाएं स्वर लिपिबद्ध हैं। इसका अगला संस्करण जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। और भी कुछ किताबें प्रकाशित करने की योजना है।
एक ओर विदेशी हमारे शास्त्रीय नृत्य संगीत की ओर आकर्षित हो रहे हैं जबकि भारतीय युवा पाश्चात्य व फिल्मी नृत्य की ओर ... आप क्या कहना चाहेंगे ?
पुरानी फिल्मों के नृत्य व लेखन में जो गहराई थी, वह अब नहीं रह गई है। कई विदेशी शिष्य भी हमारी परंपरा को सीख रहे हैं।
आप कथक कला के विकास के लिए और क्या करना चाहते हैं ?
मेरी इच्छा है कि गुरूकुल पूरे भारत में अनेक जगह स्थापित हों व भारतीय परंपरा को सुरक्षित रखते हुए सही शिक्षा दी जाय।
प्रयोग को आप किस रूप में देखते हैं ?
सही ढं़ग का प्रयोग विद्या नृत्य कला व संगीत का नायाब पथप्रदर्शक है।
कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज का जन्म चार फरवरी 1938 को लखनऊ में हुआ था। इन्होंने नृत्य की आरंभिक शिक्षा अपने पिता अच्छन महाराज अपनी माँ व चाचा शंभू महाराज से ली। चैदह वर्ष की उम्र में ही वे दिल्ली संगीत भारती में नृत्य शिक्षक हुए।
1970 से कथक केंद्र से उन्होंने गुरू के रूप में अनेक शिष्यों को तैयार किया। उनके शिष्यों ने अपनी उत्कृष्ट कला से नृत्य नाटिकाओं के माध्यम से लखनऊ घराने की कथक शैली को देश विदेश में लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने कथक शैली को अंतर्राष्ट्रीय नृत्य जगत में सुस्थापित किया।
उनकी कुछ प्रमुख नृत्य नाटिकाएं कुमार संभवम, गीतोपदेश, होरी, धूम मचायो रे, कथा रघुनाथ की, हव्वा खातून, गीत गोविंद हैं।
कथक के लिए पल - पल समर्पित सृजनशील पंड़ित बिरजू महाराज को उनकी सेवाओं के लिए 1966 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी ने ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से सम्मानित किया। वर्ष 1986 में ‘पदम भूषण’ व इसी वर्ष मध्यप्रदेश सरकार ने इन्हें ‘कालीदास सम्मान’ दिया। 1987 में वे पुनः ‘पदमविभूषण’ से सम्मानित हुए।
उत्तरप्रदेश संगीत नाटक अकादमी ने 1974 में ‘अकादमी पुरस्कार’ व 1988 में अकादमी की ‘रत्न सदस्यता’ प्रदान की। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग ने 1994 में ‘यश भारती’ सम्मान दिया।
पंड़ित बिरजू महाराज इस समय कथक केंद्र नई दिल्ली में निदेशक वरिष्ठ गुरू के पद पर कार्यरत हैं। मेरी यहीं पर उनसे मुलाकात हुई। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से समय निकाल कर उन्होंने पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कुछ इस प्रकार दिए -
क्या कुछ छूट गया, जिसे अभी तक आपने नहीं किया ?
यह एक अंतहीन विद्या है, कला की प्यास है, जो कभी समाप्त नहीं होने वाली है।
जीवन के बारे में आप किस तरह सोचते हैं ?
जीवन जैसे गुरू के द्वारा दिया गया कोई कार्य है, जिसे अपने परिश्रम के द्वारा पूरा करने का प्रयास चलता रहे।
आपका प्रिय स्वप्न क्या है ?
मेरा प्रिय स्वप्न है कि यह कला फलती फूलती रहे। अच्छे शिष्यों के द्वारा यह कला नए शिखरों को छुए और नए प्रतिमान स्थापित करे।
और आपका दुःस्वप्न ?
शास्त्रीय नृत्य संगीत पर विदेशी असर न होने पाए और भारतीयता पर आँच न आए।
प्रेम के बारे में आपका क्या कहना है ?
प्रेम एक लगाव है, और हमें अपना कार्य , जिम्मेदारी , विद्या तथा ईश्वर से प्रेम होना चाहिए।
किस तरह की स्थितियाँ आप नापसंद करते हैं ?
बहुत भीड ़- भाड़, शोर, फालतू की बातें, ये सभी स्थितियाँ, कोई भी दिन जो संगीत की चर्चा के बिना हो मुझे पसंद नहीं है।
आपके आदर्श कौन - कौन रहे ?
मेरी माँ पिताजी और पूर्वज
कथक में भविष्य की आशा के रूप में आप किसका नाम लेना चाहेंगे ?
शाश्वती सेन, दुर्गा आर्या, मालती श्याम, किरण चैहान, वेरोनिक अजान, वैसे और भी नाम हैं जिनसे भविष्य के लिए आशा है। बाकी हमारे बेटे और भाई दीपक, जयकिशन, कृष्णमोहन और राममोहन तो हैं ही।
कथक का शास्त्र लिपिबद्ध होने में क्या प्रगति हुई है ?
ठुंमरी की एक किताब मेरे द्वारा छपवाई गई है, जिसमें बिंदादीन महाराज की रचनाएं स्वर लिपिबद्ध हैं। इसका अगला संस्करण जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। और भी कुछ किताबें प्रकाशित करने की योजना है।
एक ओर विदेशी हमारे शास्त्रीय नृत्य संगीत की ओर आकर्षित हो रहे हैं जबकि भारतीय युवा पाश्चात्य व फिल्मी नृत्य की ओर ... आप क्या कहना चाहेंगे ?
पुरानी फिल्मों के नृत्य व लेखन में जो गहराई थी, वह अब नहीं रह गई है। कई विदेशी शिष्य भी हमारी परंपरा को सीख रहे हैं।
आप कथक कला के विकास के लिए और क्या करना चाहते हैं ?
मेरी इच्छा है कि गुरूकुल पूरे भारत में अनेक जगह स्थापित हों व भारतीय परंपरा को सुरक्षित रखते हुए सही शिक्षा दी जाय।
प्रयोग को आप किस रूप में देखते हैं ?
सही ढं़ग का प्रयोग विद्या नृत्य कला व संगीत का नायाब पथप्रदर्शक है।
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