राक गार्डन चार हेक्टेयर जमीन पर फैला हुआ है। यह कई भागों में बँटा हुआ है। प्रत्येक भाग एक अलग तरह के मूर्तिशिल्प से दर्शकों का परिचय और एक अलग तरह का अनुभव कराता है। प्रत्येक ब्लाक में एक से दूसरे में जाने के लिए रहस्यमय छोटे से दरवाजे हैं।
यद्यपि यह आसान बात नहीं है कि हर कोई कलाकार की दृष्टि को संपूर्णता से समझ सके। लेकिन फिर भी इसे देखते हुए उन अकेले व्यक्ति के कृतित्व की विशालता को देखकर उनके प्रति मन में निश्चय ही विशिष्ट सम्मान के भाव जन्म लेते हैं।
मूर्तिशिल्प में खाली बेकार ड्रम जिनसे कि राक गार्डन की बाहरी चहारदीवारी भी बनी हुई है। टूटे बर्तन, टूटी क्राकरी के टुकड़े,साइकिल के विभिन्न पुर्जे,उसके फ्रेम,बिजली के टूटे फूटे सामान, जंग लगे लोहे और स्टील के फर्नीचर,प्राकृतिक पथरीली चट्टानों के टुकड़े, काँच की टूटी - फूटी रंगबिरंगी चूड़ियाँ, बोतलों के ढ़क्कन, फ्यूज ट्यूब लाइटें पक्षियों के पंख और कंकड़ पत्थर यहाँ तक कि नाइयों की दुकानों से कटे हुए बाल,इसके अलावा सैकड़ों बेकार वस्तुओं के टुकड़े।
ऐसा महसूस होता है कि जैसे उन सभी बेकार की वस्तुओं से उनकी लगातार बातचीत चलती रहती है कि उसे किस सौंदर्य में ढ़लना है। बरसों बरस की उनकी इस मेहनत की प्रक्रिया में उन्होंने राकगार्डन को एशिया के सबसे बड़े पुनर्नवीकरण केंद्र के रूप में विकसित कर दिया। जो कि उसकी महान प्रतिभा के प्रतीक के रूप में चंड़ीगढ़ में स्थित है। राक गार्डन इस बात का अद्वितीय उदाहरण है कि हम बेकार के सामान का कितना अच्छा उपयोग कर सकते हैं।
नेकचंद कहते थे कि प्रकृति स्वयं ही वस्तुओं को पुर्नउत्पादित करती है और हम सबको इससे सीखना चाहिए कि हम भी उसकी भाँति उपयोगी वस्तुओं का पुनर्निमाण कैसे कर सके। उनका विश्वास था कि प्रकृति की इच्छा और मानव की रचनात्मकता में कोई विरोध नहीं है। ऐसा वे सिर्फ कहते ही नहीं थे उन्होंने इसे करके दिखाया था। सौंदर्य की दिशा में उनकी प्रस्तुति ‘राक गार्डन’ मानव और प्रकृति के बीच की इसी एकता को प्रदर्शित करती है।
एक कलाकार के रूप में नेकचंद ने सीमेंट के घोल का अदभुत प्रयोग कर मनचाही आकृतियों का निर्माण किया। विशेष रूप से झरने की दीवार या खाई, जो झरने के लिए बनाई गई हैं। इसके लिए उन्होंने भारी टाट के कपड़ों का उपयोग किया है। जिससे सीमेंट के खंबों और दीवारों पर विशेष आकर्षण और प्रभाव उत्पन्न हो गया है। झरने का पानी रिसाइकल होकर वापस आता है। इसके लिए उन्होंने मोटर लगाए हैं लेकिन वे इतनी दूरी पर हैं कि इनकी आवाज झरने के संगीत में खो जाती हैं। ऐसा महसूस होता है कि यह प्राकृतिक ही हैं
कहाँ पर प्राकृतिक शुरू होता है और मानव निर्मित खत्म यह अंतर करना बहुत मुशकिल है। उन्होंने कंकरीट के पेड़ बनाए हैं जो बिलकुल असली जैसे हैं।
पुरुष ओर स्त्री चिड़िया और जानवर सभी जैसे उनके हाथों के चमत्कारिक स्पर्श से जीवंत बन गए हैं। उन्होंने अनुपयोगी लोहे का भी अच्छा उपयोग किया है। जिसमें साइकिल के पुर्जों के ऊपर सीमेंट लगाकर उन्हें भी विभिन्न आकार दिया गया है। साइकिल की सीट को जहाँ चेहरे में तब्दील किया गया है वहीं फ्रेम को टाँगों में बदल दिया है।
प्रत्येक आकृति में भिन्न - भिन्न ढ़ंग की पच्चीकारी की गई है। बाह्य आवरण सीमेंट की पृष्ठभूमि में काँच की रंगबिरंगी चूड़ियों बोतल के ढ़क्कनों, टूटी क्राकरी के टुकड़ों या अन्य अनुपयोगी वस्तुओं से कलात्मक ढंग से जड़ा गया है। अधिकतर मूर्तियाँ, जानवर या मानवीय आकार में हैं। कुछ आकृतियाँ सामान्य से बड़ी हैं तो कुछ छोटी भी।
उनके द्वारा निर्मित चरित्रों में सुंदर काँच की चूड़ियों से बनी स्त्री आकृतियाँ भी हैं। जो कलात्मक ढ़ंग से इंच - इंच रंगबिरंगी व सुनहरी चूड़ियों से ढ़की है। उनके चेहरों को नजदीक से देखने पर विभिन्न भाव प्रकट होते हैं। वे आकृतियाँ भारतीय स्त्रियों की खुशी को अभिव्यक्त करतीं हैं। उनके सिर पर असली बालों का प्रयोग हुआ है। विभिन्न मूर्तिशिल्पों में टूटी केतली, टूटे कप व टूटी ट्रे का खूबसूरती से प्रयोग कर विभिन्न शेड बनाए गए हैं।
नेकचंद की इस महान प्रतिभा और कला के कद्रदान देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी रहे। जहाँ एक ओर चंड़ीगढ़ के एअरफोर्स सेंटर में बेकार पड़े नाकारा सामान को उपयोगी बनाने के लिए उनके मार्गनिर्देशन में ‘मिनी राकगार्डन’ बनाया गया, वहीं अन्य देशों में भी उनके उपयोगी सुझाव पाने के लिए उन्हें समय - समय पर आमंत्रित किया जाता रहा।
स्विटजरलैंड में उनकी कला पर एक पुस्तक ‘नेकचंद आउटसाइडर आर्टस’ नाम से प्रकाशित हुई। भारत के विभिन्न राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री समय - समय पर राकगार्डन में जाकर नेकचंद की कला की सराहना कर चुके हैं। अमेरिका इंग्लैंड़ जर्मनी आदि देशों में उनके प्रशंसकों ने ‘नेकचंद फाउण्डेशन’ नामक संस्था बनाई है जिसका मुख्यालय इग्लैंड में है। वे सभी समय - समय पर राकगार्डन की बेहतरी के लिए प्रयास करते रहते हैं। राकगार्डन के विस्तार चरण के लिए उन्होंने महंगे ‘मैजिक मिरर’ भेंट किए थे।
आज राकगार्डन में ओपन एयर स्टेज, झूले, ऊँट की सवारी, बच्चों के लिए अंदर मोटर बाइक आदि विविध आकर्षण हैं। अब शहर के बीचोबीच यह शांत सुरम्य अनोखा संसार, बच्चों और युवाओं के लिए एक अच्छा पिकनिक स्थल जैसा है। जहाँ आकर वे नेकचंद के इस स्वप्निल संसार के बीच बैठकर अपने भविष्य के लिए भी सपनों का संसार कल्पित करते हैं। नेकचंद का रचनात्मक मन भी अनुपयोगी से कुछ न कुछ उपयोगी रचता रहता था।
राकगार्डन में घूमते - घूमते आपको एक स्थान पर लोहे के कुँए के ऊपर का ढ़ांचा नजर आएगा जिसके चारों ओर घिरनियाँ लगीं हैं जिसे देखकर हो सकता है आपको अमीर खुसरो के जीवन की घटी वह घटना याद आ जाए जिसमें जब वे प्यासे एक ऐसे ही किसी कुँए के पास पहुँचे थे और उन्हें पहचान कर चार पनिहारियों ने पानी पिलाने के लिए उनसे चार अलग - अलग विषयों खीर, चरखा, कुत्ता और ढ़ोल पर कविता सुनाने की शर्त रखी। विलक्षण प्रतिभा के धनी खुसरो ने चारों की फरमाइश दो पंक्तियों में पूरी कर उन्हें खुश करके पानी पिया। कविता कुछ यूँ थी -‘खीर पकाई जतन से ,चरखा दिया चलाय, आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढ़ोल बजा,। अब न ऐसे कुएँ रहे न उनके कद्रदान। तो वह लोहे का फ्रेम भी अनुपयोगी हो गया। मगर नेकचंद की कलात्मक दृष्टि ने उसे उपयोगी बना लिया। आज राकगार्डन में दर्शक उसके पानी में पैसे फेंक कर अपने भाग्य की आजमाइश करते हैं और मनोरंजन करते हैं।
यद्यपि यह आसान बात नहीं है कि हर कोई कलाकार की दृष्टि को संपूर्णता से समझ सके। लेकिन फिर भी इसे देखते हुए उन अकेले व्यक्ति के कृतित्व की विशालता को देखकर उनके प्रति मन में निश्चय ही विशिष्ट सम्मान के भाव जन्म लेते हैं।
मूर्तिशिल्प में खाली बेकार ड्रम जिनसे कि राक गार्डन की बाहरी चहारदीवारी भी बनी हुई है। टूटे बर्तन, टूटी क्राकरी के टुकड़े,साइकिल के विभिन्न पुर्जे,उसके फ्रेम,बिजली के टूटे फूटे सामान, जंग लगे लोहे और स्टील के फर्नीचर,प्राकृतिक पथरीली चट्टानों के टुकड़े, काँच की टूटी - फूटी रंगबिरंगी चूड़ियाँ, बोतलों के ढ़क्कन, फ्यूज ट्यूब लाइटें पक्षियों के पंख और कंकड़ पत्थर यहाँ तक कि नाइयों की दुकानों से कटे हुए बाल,इसके अलावा सैकड़ों बेकार वस्तुओं के टुकड़े।
ऐसा महसूस होता है कि जैसे उन सभी बेकार की वस्तुओं से उनकी लगातार बातचीत चलती रहती है कि उसे किस सौंदर्य में ढ़लना है। बरसों बरस की उनकी इस मेहनत की प्रक्रिया में उन्होंने राकगार्डन को एशिया के सबसे बड़े पुनर्नवीकरण केंद्र के रूप में विकसित कर दिया। जो कि उसकी महान प्रतिभा के प्रतीक के रूप में चंड़ीगढ़ में स्थित है। राक गार्डन इस बात का अद्वितीय उदाहरण है कि हम बेकार के सामान का कितना अच्छा उपयोग कर सकते हैं।
नेकचंद कहते थे कि प्रकृति स्वयं ही वस्तुओं को पुर्नउत्पादित करती है और हम सबको इससे सीखना चाहिए कि हम भी उसकी भाँति उपयोगी वस्तुओं का पुनर्निमाण कैसे कर सके। उनका विश्वास था कि प्रकृति की इच्छा और मानव की रचनात्मकता में कोई विरोध नहीं है। ऐसा वे सिर्फ कहते ही नहीं थे उन्होंने इसे करके दिखाया था। सौंदर्य की दिशा में उनकी प्रस्तुति ‘राक गार्डन’ मानव और प्रकृति के बीच की इसी एकता को प्रदर्शित करती है।
एक कलाकार के रूप में नेकचंद ने सीमेंट के घोल का अदभुत प्रयोग कर मनचाही आकृतियों का निर्माण किया। विशेष रूप से झरने की दीवार या खाई, जो झरने के लिए बनाई गई हैं। इसके लिए उन्होंने भारी टाट के कपड़ों का उपयोग किया है। जिससे सीमेंट के खंबों और दीवारों पर विशेष आकर्षण और प्रभाव उत्पन्न हो गया है। झरने का पानी रिसाइकल होकर वापस आता है। इसके लिए उन्होंने मोटर लगाए हैं लेकिन वे इतनी दूरी पर हैं कि इनकी आवाज झरने के संगीत में खो जाती हैं। ऐसा महसूस होता है कि यह प्राकृतिक ही हैं
कहाँ पर प्राकृतिक शुरू होता है और मानव निर्मित खत्म यह अंतर करना बहुत मुशकिल है। उन्होंने कंकरीट के पेड़ बनाए हैं जो बिलकुल असली जैसे हैं।
पुरुष ओर स्त्री चिड़िया और जानवर सभी जैसे उनके हाथों के चमत्कारिक स्पर्श से जीवंत बन गए हैं। उन्होंने अनुपयोगी लोहे का भी अच्छा उपयोग किया है। जिसमें साइकिल के पुर्जों के ऊपर सीमेंट लगाकर उन्हें भी विभिन्न आकार दिया गया है। साइकिल की सीट को जहाँ चेहरे में तब्दील किया गया है वहीं फ्रेम को टाँगों में बदल दिया है।
प्रत्येक आकृति में भिन्न - भिन्न ढ़ंग की पच्चीकारी की गई है। बाह्य आवरण सीमेंट की पृष्ठभूमि में काँच की रंगबिरंगी चूड़ियों बोतल के ढ़क्कनों, टूटी क्राकरी के टुकड़ों या अन्य अनुपयोगी वस्तुओं से कलात्मक ढंग से जड़ा गया है। अधिकतर मूर्तियाँ, जानवर या मानवीय आकार में हैं। कुछ आकृतियाँ सामान्य से बड़ी हैं तो कुछ छोटी भी।
उनके द्वारा निर्मित चरित्रों में सुंदर काँच की चूड़ियों से बनी स्त्री आकृतियाँ भी हैं। जो कलात्मक ढ़ंग से इंच - इंच रंगबिरंगी व सुनहरी चूड़ियों से ढ़की है। उनके चेहरों को नजदीक से देखने पर विभिन्न भाव प्रकट होते हैं। वे आकृतियाँ भारतीय स्त्रियों की खुशी को अभिव्यक्त करतीं हैं। उनके सिर पर असली बालों का प्रयोग हुआ है। विभिन्न मूर्तिशिल्पों में टूटी केतली, टूटे कप व टूटी ट्रे का खूबसूरती से प्रयोग कर विभिन्न शेड बनाए गए हैं।
नेकचंद की इस महान प्रतिभा और कला के कद्रदान देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी रहे। जहाँ एक ओर चंड़ीगढ़ के एअरफोर्स सेंटर में बेकार पड़े नाकारा सामान को उपयोगी बनाने के लिए उनके मार्गनिर्देशन में ‘मिनी राकगार्डन’ बनाया गया, वहीं अन्य देशों में भी उनके उपयोगी सुझाव पाने के लिए उन्हें समय - समय पर आमंत्रित किया जाता रहा।
स्विटजरलैंड में उनकी कला पर एक पुस्तक ‘नेकचंद आउटसाइडर आर्टस’ नाम से प्रकाशित हुई। भारत के विभिन्न राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री समय - समय पर राकगार्डन में जाकर नेकचंद की कला की सराहना कर चुके हैं। अमेरिका इंग्लैंड़ जर्मनी आदि देशों में उनके प्रशंसकों ने ‘नेकचंद फाउण्डेशन’ नामक संस्था बनाई है जिसका मुख्यालय इग्लैंड में है। वे सभी समय - समय पर राकगार्डन की बेहतरी के लिए प्रयास करते रहते हैं। राकगार्डन के विस्तार चरण के लिए उन्होंने महंगे ‘मैजिक मिरर’ भेंट किए थे।
आज राकगार्डन में ओपन एयर स्टेज, झूले, ऊँट की सवारी, बच्चों के लिए अंदर मोटर बाइक आदि विविध आकर्षण हैं। अब शहर के बीचोबीच यह शांत सुरम्य अनोखा संसार, बच्चों और युवाओं के लिए एक अच्छा पिकनिक स्थल जैसा है। जहाँ आकर वे नेकचंद के इस स्वप्निल संसार के बीच बैठकर अपने भविष्य के लिए भी सपनों का संसार कल्पित करते हैं। नेकचंद का रचनात्मक मन भी अनुपयोगी से कुछ न कुछ उपयोगी रचता रहता था।
राकगार्डन में घूमते - घूमते आपको एक स्थान पर लोहे के कुँए के ऊपर का ढ़ांचा नजर आएगा जिसके चारों ओर घिरनियाँ लगीं हैं जिसे देखकर हो सकता है आपको अमीर खुसरो के जीवन की घटी वह घटना याद आ जाए जिसमें जब वे प्यासे एक ऐसे ही किसी कुँए के पास पहुँचे थे और उन्हें पहचान कर चार पनिहारियों ने पानी पिलाने के लिए उनसे चार अलग - अलग विषयों खीर, चरखा, कुत्ता और ढ़ोल पर कविता सुनाने की शर्त रखी। विलक्षण प्रतिभा के धनी खुसरो ने चारों की फरमाइश दो पंक्तियों में पूरी कर उन्हें खुश करके पानी पिया। कविता कुछ यूँ थी -‘खीर पकाई जतन से ,चरखा दिया चलाय, आया कुत्ता खा गया,तू बैठी ढ़ोल बजा,। अब न ऐसे कुएँ रहे न उनके कद्रदान। तो वह लोहे का फ्रेम भी अनुपयोगी हो गया। मगर नेकचंद की कलात्मक दृष्टि ने उसे उपयोगी बना लिया। आज राकगार्डन में दर्शक उसके पानी में पैसे फेंक कर अपने भाग्य की आजमाइश करते हैं और मनोरंजन करते हैं।
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