Thursday, 15 September 2016

स्मृति के वातायन से एक संस्मरण


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एक प्रसंग मानस से
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बात सन 1977 की है तब मैं ऋषिभूमि इंटर कालेज सौरिख (तब)फर्रुखाबाद उ.प्र. में दसवीं कक्षा का छात्र था। श्री ज्ञानेन्द्र देव त्रिपाठी वहाँ प्रधानाचार्य हुआ करते थे। प्रार्थना स्थल पर वे अक्सर मानस का यह उद्धरण हम बच्चों को सुनाते थे। जो मुझे आज तक भूला नहीं है।
धनुषयज्ञ प्रसंग में जब सारे राजा हार गए कोई धनुष तोड़ना तो दूर हिला भी न सका।राजा जनक भी---
वीर विहीन मही मैं जानी,कह चुके और लक्ष्मण भी -- कन्दुक इव ब्रह्मांड उठावौ,का उद्घोष कर चुके । तब गुरु विश्वामित्र ने लक्ष्मण को शान्त करते हुए राम से कहा--
उठहु राम भंजहु भव चापा,
मेटहु तात जनक परितापा।
तब-
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा,
हरषु विषाद न कछु उर आवा ।
ठाढ़़े भए उठि सहज सुभाए,
ठवनि जुबा मृगराजु लजाए।
वे कहते थे--राम को पता था कि वे धनुष तोड़ देंगे लेकिन फिर भी उनकी चाल में घमंड नहीं था।बल्कि वे सहज स्वाभाविक ढ़ंग से उठ खडे हए। मगर वो उनका वह सहज स्वाभाविक ढ़ंग से उठना भी जवान सिंहों को लज्जित कर देने वाला था।
कहने का अर्थ है कि हमारा उठना बैठना हर क्रिया कलाप हमारे व्यक्तित्व का परिचायक है। हम मुख की बजाय बाडी लैंग्वैज से ज्यादा बोलते हैं जिसे लोग समझते भी हैं। हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
आज गोस्वामी तुलसीदास जी और न ही ज्ञानेन्द्र देव त्रिपाठी जी उपरोक्त दोनों ही इस दुनिया में नहीं है। पर अपनी दी हुई शिक्षाओं के रूप में वे आज भी हमारे साथ हैं।
उनकी स्मृतियों को नमन...

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