Thursday, 15 September 2016



सफलता की कहानी

राक गार्डन के निर्माता-नेकचंद सैनी


कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। अगर इंसान अपने मन में ठान लंे तो मुश्किलों में राह निकलती चली जाती है। ऐसे ही धुन के पक्के धुनी थे चंड़ीगढ़ में राक गार्डन के निर्माता नेकचंद सैनी।उनका जीवन एक ऐसे व्यक्ति की सफलता की कहानी है जो सभी को प्रेरित और रोमांचित करती है। यह कहानी यह भी बताती है कि कोई भी अच्छा काम करने की कोई उम्र नहीं होती है उसे किसी भी आयु में शुरू किया जा सकता है।
 15 दिसंबर 1924 को जिला गुरदासपुर (अब पाकिस्तान में) के शंकरगढ़ में जन्में नेकचंद की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर हुई।उन्होंने 1943 में दसवीं की परीक्षा पास की और पी. डब्ल्यू. डी. में नौकर हो गए।सन 1947 में देश के हिंसात्मक विभाजन के बाद वे अपना पैतृक गाँव छोड़कर भारत आ गए थे। देश में बड़े पैमाने पर होने वाले नव निर्माण के कार्यक्रमों में अपने विभाग के माध्यम से लग गए। चूँकि वे वहाँ पी डब्ल्यू. डी. में नौकर थे इसलिए यहाँ आकर भी इसी विभाग में नौकरी पा गए। शुरू में करनाल में रहे फिर पानीपत फरीदाबाद होते हुए वे सन 1953 में चंड़ीगढ़ आ गए। इस बीच 1950 में उनका विवाह दिल्ली के दरियागंज में हो गया।
 उन दिनों रोड़ इंस्पेक्टर के रूप में उनका काम सड़कों का निरीक्षण करना होता था। अब तक उनका जीवन एक आम शहरी व्यक्ति का जीवन था।
उन दिनों चंड़ीगढ़ शहर धीरे - धीरे विकसित होना शुरू हुआ था। साइकिल से सड़कों का निरीक्षण करते हुए नेकचंद को वहाँ के टूटे पत्थरों ने आकर्षित किया। वे भारत की प्राचीनतम पहाड़ी संृखला की चट्टानों के टूटे पत्थर थे।
वह सन 1958 का कोई दिन था जब नेकचंद खेल खेल में ही
बेकार अनुपयोगी घड़े और पत्थर अपनी साइकिल के पीछे रखकर लाने लगे । इन्हें वे एक स्थान पर जमा करने लगे। यह स्थान मुख्य शहर से दूर जंगल का एक हिस्सा था। जहाँ आम तौर पर कोई आता जाता न था।
अब तो नेकचंद का यह रोज का काम हो गया,सारे दिन घूम - घूम कर साइकिल से सड़कों का निरीक्षण करते और वापसी में लौटते हुए अनुपयोगी,बेकार, कबाड़ समझी जाने वाली वस्तुओं को साइकिल के पीछे रखकर उस स्थान तक लेकर आते।
उन्होंने धीरे -धीरे जंगल के उस हिस्से की सफाई कर वहाँ पेड़ लगाए। कंधे पर बाँस रख कर उसके दोनों सिरों पर कनस्तर बाँध कर वहाँ दूर से पानी लाते। इस तरह उन्होंने सबसे पहले वहाँ झोपड़ीनुमा कमरा बनाया।
अब उन्होंने उन बेकार चीजों को आकार देना शुरू किया। शाम को आकर वे जैसे ही काम में लगते जल्दी ही अँधेरे की चादर फैलनी शुरू हो जाती। रात का सुनसान अँधेरा वातावरण और साँप मच्छरों से भरा जंगल भाँय-भाँय करता।उस जंगल में बिजली तो थी नहीं।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है यह बात ऐसे ही नहीं कही गई है। यह उनका जुनून ही था जिसने उन्हें रास्ता दिखाया।
नेकचंद ने बताया  - मैंने कबाड़ में पड़े टायरों को ढूँढ़ा और उन्हें जलाकर उनकी रोशनी में रात में घंटों काम करने लगा। जब फुरसत पाते तो घर चले जाते, अगले दिन आकर फिर यही क्रम जारी रहता। पति की इस लगन को देखकर पत्नी ने भी उनका साथ दिया। वे भी अक्सर आ जातीं और उन्हें सहयोग करतीं।
एक गहन आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह नेकचंद ने इस गार्डन को एक ध्यान और प्रार्थना की तरह निर्मित किया। उनके लिए जंगल का यह एकांत स्थान एक पवित्र स्थल की तरह रहा जहाँ पहुँच कर वे मूर्तियों जानवर चिड़िया आदमी आदि की आकृतियों को अपनी कल्पना के रंगों में सजाते उन्हें निर्मित करते उनके लिए ये आकृतियाँ निर्जीव जड़ वस्तुएँ न होकर उनकी साथी थीं जिनसे वे अक्सर निर्माण की प्रक्रिया के दौरान वे ठोकते ,पीटते,सहलाते, पुचकारते,प्यार करते और उन पर अधिकार जताते।
इस तरह से लगे लगे उन्होंने एक दो नहीं,सौ पचास नहीं, बीस हजार आकृतियाँ तैयार कर लीं। ये सारी आकृतियाँ एक दूसरे से भिन्न थीं। वे धीरे - धीरे अपने उस संसार को सजाते रहे,जिसके
कि वे स्वयं निर्माता थे। उस संसार के एक एक निवासियों में रंग भरते रहे। इनमें कलाकार, मदारी , नौकर, राजा, सिपाही, पक्षी, जानवर जैसे तरह तरह के प्राणी थे।इस सृजन कार्य में उनके साथ होते बहती हवा, मौसम, तरह - तरह की चिड़ियाँ व कीट पतंगे। जो अपनी बोली भाषा में नेकचंद के इस कार्य को देखते और सराहते।
   सन 1973 में सरकार की एक सर्वेक्षण टीम ने अचानक जंगल के बीच छिपे इस खूबसूरत रचना संसार को खोज निकाला। सर्वे टीम के सारे सदस्य इसकी विशालता और अद्वितीय खूबसूरती को देखकर दंग रह गए। चूँकि यह सब सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बना हुआ था इसलिए कानूनन इसे उस स्थान पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं था। एक ओर विश्व विख्यात स्विस वास्तुकार ली कूर्बिजियर द्वारा डिजाइन किया गया नियोजित चंडीगढ़ शहर और दूसरी ओर सरकारी दृष्टि से अनियोजित और अनधिकृत भूमि पर बसा नेकचंद का यह अद्वितीय रचना संसार। फिर नेकचंद बेहद सीधे सरल व्यक्ति। उनके पीछे कोई राजनीतिक या किसी अन्य प्रकार का कोई समर्थन नहीं। अगर कुछ था तो एक जुनून एक समर्पण...
  आज तो उनके कार्य का इतना महत्व समझ में आता है लेकिन उस शुरुआती दौर में जब कोई सहारा नहीं था तब भी उनकी महान प्रतिभा और किए गए कार्य को समझने वाले भले लोग सामने आए और आगे बढ़कर न केवल उनके इस अद्वितीय कार्य की प्रशंसा की बल्कि उन्हें सहयोग और सहारा भी दिया। सौभाग्यवश स्थानीय प्रशासन ने भी इस कार्य के महत्व को समझा और नेकचंद को अपने प्रयास जारी रखने को कहा। उन्होंने नेकचंद को कार्यकर्ता उपलब्ध कराए और ट्रक भी सामान की ढुलाई के लिए दिया। अब तो नागरिक भी यदा कदा अनुपयोगी कबाड़ आदि को वहाँ पहँुचाने लगे। सन 1976 में जब सरकार ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में लिया तो जमीन पर रखीं वे मूर्तिशिल्प आकृतियों को व्यवस्थित क्रम में रखा गया।
इस स्थान की विशालता और आकृतियों में प्रयुक्त पत्थरों की बहुतायत के देखते हुए इसे ‘राक गार्डन’ नाम दिया गया। जंगल में छिपे इस रचना संसार का पता जब पहली बार लोगों को हुआ तो वे इसे देखने के लिए टूट पड़े। दस मई 1978 को इस स्वप्निल कलाकृतियों के अनूठे संसार को औपचारिक रूप से आम जनता के दर्शनार्थ खोल दिया गया।
यद्यपि कहने सुनने में ये सब बातें इतनी सीधी सरल कहानी की तरह आसान लगतीं हैं मगर यह इतना सरल और आसान नहीं रहा। नेकचंद को ईष्यालु लोगों स्थानीय कई नौकरशाहों और वकीलों का विरोध झेलना पडा। राक गार्डन के विस्तार और इसके खर्चों को लेकर हुए विरोध की लड़ाईयाँ में उलझना पड़ा। इसमें अदालत के केस भी शामिल हैं। लेकिन सन 1989 में यह सब पूर्ण रूप से उनके पक्ष में हो गया। उन्हें राकगार्डन के खर्चों और सुरक्षा संबंधी सारे अधिकार प्राप्त हो गए। यद्यपि इस बीच कई बार बाजी पक्ष में आती दिखाई दी ओर कभी विपक्ष में। एक बार तो राक गार्डन को उजाड़ने के आदेश भी हो गए थें लेकिन शहर की सौदर्य पारखी जनता व संभ्रान्त लोगों ने मानव सृंखला बनाकर उसे रोका।
वे बोले - ‘ये बुलडोजर पहले हम पर चलेगा फिर राक गार्डन पर।’
उनके इस महत कार्य की पहली बड़ी मान्यता विदेश से मिली जब मार्च अप्रैल 1980 में उनकी इन कलाकृतियों की प्रदर्शनी पेरिस में लगी। जहाँ पेरिस के मेयर ने कबाड़ से बनाई गईं इन खूबसूरत कलाकृतियों की सराहना करते हुए नेकचंद को वहाँ का सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया।
सन 1983 में भारत सरकार ने राक गार्डन चंडीगढ़ पर एक डाक टिकट जारी किया। 24 मार्च 1984 को भारत के महामहिम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उन्हें ‘पदम श्री’ सम्मान  से सम्मानित किया।
सन 1985 में नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद इन्हें राक गार्डन का ‘क्रियेटिव डाइरेक्टर’ बना दिया गया।एक मुलाकात में नेकचंद ने बताया था कि वैसे तो बहुत लोगों का साथ और सहयोग मुझे मिला मगर चंड़ीगढ़ के गर्वनर रहे महामहिम सिद्धार्थशंकर राय के सद प्रयासों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
प्रसिद्ध कामेडी सीरियलों के निर्माता व हास्य अभिनेता जसपाल भट्टी ने एक मुलाकात में अपने अंदाज में बताया था कि -‘इस पत्थरों के शहर में है ही क्या? अगर नेकचंद को निकाल दे ंतो, उन्होंने सचमुच बडा काम किया है। कितने सारे लोग तो चंडीगढ़ राक गार्डन देखने आते हैं। यह उनका बहुत बड़ा योगदान है। उनमें ‘गजब का सेंस आफ ह्यूमर’ है। इस बड़े को करने में बड़ी बाधाएं आईं लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की और मुस्कराकर हर स्थिति को स्वीकार किया।’
सचमुच ही जैसे चंड़ीगढ़ रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही ‘जय जवान’ ‘जय किसान’ के नारे को याद दिलाती मूर्ति आकृतियाँ आपका स्वागत करतीं हैं ठीक उसी तरह राक गार्डन के मुख्य द्वार के पास कैफेटेरिया के निकट अपने आॅफिस में नेकचंद। जब तक वे जीवित रहे कोई भी सरल सहज व्यक्तित्व के धनी इस कलाकार से मिलकर अपनापन महसूस कर सकता था।
पिछले दिनों 91 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हो गया। आज वे भौतिक रूप से हमारे बीच बेशक न हों मगर उनके विचार और उनका बनाया ‘राक गार्डन’ अगली पीढ़ी को हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।

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