Thursday, 15 September 2016

प्रधानमंत्री को बचाया

दो अक्टूबर 1957 देश की राजधानी दिल्ली...
अक्टूबर के महीने में हर बार दिल्ली में बड़े धूमधाम से दशहरे का पर्व मनाया जाता है। सो इस बार भी रामलीला की मंडलियां जगह-जगह राम की कहानी मंचित कर रहीं थीं। मशहूर हस्तियों को अपनी नाटक मंडली में बुलाने की इनमें होड़ लगी रहती।
इस बार देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक नाटक मंडली ने आमंत्रित किया था। भारी भीड़ को देखते हुए स्काउट के स्वयंसेवक भी व्यवस्था बनाने के लिए कार्यक्रम स्थल पर मौजूद थे। उन्हीं में था वह बारह साल का नन्हा स्काउट बच्चा हरिश्चंद मेहरा...
सिर पर कैप, गले में स्कार्फ, कमर में चाकू, पाकेट में सीटी शरीर पर पूरी  
स्काउट की वर्दी... प्रधानमंत्री जी आ रहे हैं सो सभी विशेष चैकन्ने थे। उनके स्वागत की तैयारी में चारो तरफ खूब गहमागहमी थी।
अचानक मुख्य द्वार के पास शोर सुनाई दिया। पंड़ित जी आ गए... पंड़ित जी आ गए... लोग बड़े उत्साह से उन्हें लेकर मंच की ओर जाने लगे। मगर पंड़ित जी ने मना कर दिया। मंच पर उस समय रामलीला चल रही थी और प्रधानमंत्री जी कुछ देर बैठकर उसका आनन्द लेना चाहते थे।
उनकी ऐसी इच्छा देख आयोजकों ने उनसे ज्यादा नहीं कहा। यह तो और भी अच्छा था कि वे खुद ही वहां रूकना चाहते थे।
मंच पर उस समय युद्ध का दृश्य चल रहा था। जब देश के प्रधानमंत्री दर्शक दीर्घा में मौजूद हांे तो कलाकार भी अतिरिक्त उत्साह के साथ अपना प्रदर्शन दिखा रहे थे।
तभी अचानक किसी असावधानी से किनारे पर लगे टैंट में आग लग गई। सभी की नज़र सामने मंच पर थी सो पहले तो किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। मगर जब धुआं और लपटें तेज हुईं तो एकदम से भगदड़ मच गई।
हरिश्चंद ने तुरंत आगे बढ़कर प्रधानमंत्री जी को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया और फिर दौड़ता हुआ कनात के बांस पर चढ़ गया। अपने चाकू को निकाल कर उसने कनात के जलते हुए हिस्से को काटना शुरू कर दिया। लोगों के देखते-देखते धुएं और आग के बीच घिरे उस लड़के ने वह जलता हिस्सा काट कर अलग गिरा दिया। जिससे आग आगे नहीं बढ़ सकी।
अब तक अपनी जान बचाकर इधर-उधर भाग रहे लोग पलट कर आ गए। जल्दी ही आग पर काबू पा लिया गया। आग में घिर कर हरिश्चंद के हाथ  घायल हो चुके थे, और धुएं के कारण उसे बेहोशी भी आ गई। उसे तुरंत हास्पिटल ले जाया गया। जहां उसको प्राथमिक उपचार दिया गया।
दो दिन बाद उसके स्कूल में सूचना आई कि प्रधानमंत्री पंड़ित जवाहरलाल नेहरू उस बच्चे को सम्मानित करेंगे। जिसने उनकी आंखों के सामने बहादुरी दिखाते हुए न केवल उन्हें बचाया बल्कि अपनी जान की परवाह न करते हुए आग बुझाकर वहां उपस्थित लोगों की प्राणरक्षा भी की।
उस समय प्रधानमंत्री जी तीनमूर्ति भवन में रहते थे। वहीं एक सादे किंतु महत्वपूर्ण कार्यक्रम में प्रधानमंत्री जी ने हरिश्चंद मेहरा को सम्मानित करते हुए कहा कि मैं इस बालक की बहादुरी की घटना का चश्मदीद गवाह हूँ। देश के अन्य भागों में भी बच्चे ऐसे बहादुरी और साहस के कारनामें करते रहते होंगे, मगर वे सामने नहीं आ पाते। ऐसा होना चाहिए कि उनकी बहादुरी देश के सामने आए। लोग उन्हें जानें।
बस तभी से राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार की शुरुआत हो गई। सारे देश से अठारह साल से कम आयु के किसी बच्चे को जो अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों की जान बचाने के लिए असाधारण वीरता का प्रदर्शन करता है। उस घटना के प्रमाण भारतीय बाल कल्याण परिषद नईदिल्ली को उचित माध्यम से भेजे जाते हैं। एक उच्च स्तरीय कमेटी इसकी जांच कर उनके राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार की घोषणा करती है। गणतंत्र दिवस से पूर्व प्रधानमंत्री जी स्वयं उन्हें सम्मानित करते हैं। देश के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग इन बच्चों से मिलकर इन्हें प्रोत्साहित करते हैं। ये वीर बच्चे गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होते हैं।
मित्रो,
हम नन्हे-नन्हें बच्चे हैं, हम काम कर रहे बड़े-बड़े,
हिम्मत कर आगे कूद पड़े,जब देख रहे थे बड़े खड़े,

कब चाहा हमने पुरस्कार,जो मिला हमें तो अच्छा है,
लेकिन जो सच्ची खुशी मिली,वो पुरस्कार ही सच्चा है,

सब अपनी धुन के मतवाले, मंज़िल तो पाएंगे ही हम,
पर दिल का है अरमान यही,हिम्मत का ऊँचा हो परचम,

अनगढ़  पथरीले  हीरे  हैं, सब  दूर  करेंगे  बाधाएं,
कब रोक सके हैं हमें भला क्या बंधन हों क्या सीमाएं?

No comments: