शाम होते ही सलीम नंदिनी और स्टेला बरगद के पेड़ के नीचे पहुँच गए। उन्हें राजू का इंतजार था। जो आज उन्हें अपना सपना सुनाने वाला था।
राजू ने आते ही कहा - ‘दोस्तोे, इस बार मेरी आँख लगी तो मैंने खुद को वीरान टापू पर पाया। चारांे ओर उभरी हुई पहाड़ियाँ.. सामने से आता सागर की लहरों का हल्का-हल्का शोर... अभी मैं सोच रहा था यह कौन सी जगह है, मैं यहाँ से बाहर कैसे जाऊँगा?
तभी सामने सागर की रेत से ऊँचे - ऊँचे बुलबुले उठने लगे। देखा कीचड़ से एक आकृति निकलकर बाहर आ रही है।
‘वह एक टेबिल लैंप की तरह थी। उसका चेहरा कीचड़ में पूरी तरह सना हुआ था। एकाएक उसके रोम -रोम से पानी के फुहारे से छूटने लगे जिसमें उसका पूरा शरीर धुल गया। वह एक विचित्र प्राणी था जैसा मैंने पहले नहीं देखा था।’
अचानक उसकी आवाज सुनाई दी - ‘कैसे हो राजू’?’
‘मैंने उससे डरते - डरते पूछा, ‘आप कौन हैं ?’ ‘आपको मेरा नाम कैसे पता?’
उसने जबाब दिया -‘राजू मुझे अपना दोस्त समझो।’
मैंने कहा -‘ऐसी अजीबोगरीब शक्ल का प्राणी मैंने पहले नहीं देखा।’
उसने मुस्कराते हुए कहा -‘राजू तुम्हारी पृथ्वी पर ऐसे अनेक जीव मौजूद हैं, जिन्हें किसी भी मनुष्य ने नहीं देखा। मैं तो ठहरा दूसरी आकाशगंगा का प्राणी...
‘दूूसरी आकाशगंगा’... मैने पलकें झपकाईं।
उसने कहा - ‘राजू तुम्हें पता है हमारा ब्रह्मांड कितना बड़ा है इसका कोई ओर - छोर नहीं। इसका कोई अंत न पाकर इसका नाम ही अनंत रख दिया गया है।
उसने आगे कहा -‘तुम्हारी पृथ्वी जिस तारे के चक्कर लगाती है, वह सूर्य तो बहुत छोटा तारा है तुम्हारी आकाशगंगा का।
ऐसी लाखों करोड़ों में से एक आकाशगंगा से मैं आया हूँ।
ओह ! मगर तुमने इतनी दूरी को कैसे पार किया - मैंने प्रश्न किया।
वह बोला- ‘राजू, हमारा विज्ञान तुम्हारी धरती से कहीं आगे है। इसलिए यह कोई समस्या नहीं।
‘कैसे ? -मैंने पूछा।
उसने कहा - ‘ऐसे समझो, धरती का जल, बर्फ पानी और भाप यानी ठोस द्रव व गैस के रूप में तापमान के हिसाब से बदल जाता है। तुम्हें पता है हमारा शरीर किन पाँच तत्वों से मिलकर बना है ?’
‘पानी ,मिट्ठी, अग्नि, वायु और आकाश’- मैंने जल्दी से जबाब दिया।
उसने बताया - ‘बिलकुल ठीक, हमारे ग्रह पर भी ऐसा ही है। हमने विज्ञान की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की कि हम खुद को इन पाँच में से किसी भी तत्व में बदल सकते हैं।‘
‘ऐसा क्या ? - मैं हैरान रह गया।
वह आगे बोला -‘अभी मैं खुद को हवा में बदल कर तुम्हारे आसपास मौजूद रहूँगा या सागर की इन लहरों में मिल कर बहने लगूँगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।’
यह कहते कहते वह एकदम से गायब हो गया। जरा सी देर में वह फिर दिखाई देने लगा। मैं हैरान था।
मैंने पूछा लेकिन तुम जीने के लिए प्राणशक्ति कहाँ से लेते हो ?
उसने मुस्कराते हुए जबाब दिया -यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा तुमने... हम अपनी प्राणशक्ति उन पाँच तत्वों में से किसी एक तत्व से ले सकते हैं।
‘जैसे’ ? - मैंने हैरान होते हुए पूछा।
उसने बताया -‘तुम हवा से साँस लेते हो, जबकि मैं हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि और आकाश यानि शून्य निर्वात से भी जीवनी शक्ति ग्रहण कर सकता हूँ।’
‘ओह, मुझे याद आया। मैंने एक फिल्म में दूसरे ग्रह के प्राणी को धूप यानि अग्नि से जीवनी शक्ति पाते देखा था।’ - मैंने कहा।
उसने मुझे आगे बताया -‘ये जो बाल देख रहे हो न मेरे ...
‘मैंने उसके बालों की ओर ध्यान से देखा तो मुझे वे बाल कुछ-कुछ उस बाली जैसे दिखे जिसे हम लोग एक दूसरे की पीठ पर फेंककर चिपका देते हैं। ऐसे पतले-पतले सैकड़ों बाल उसके सिर पर थे।’
हाँ - मैंने कहा।
वह बोला-‘दरअसल यह बाल नहीं हैं।’
‘हंय...तो फिर’? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘ये प्राणशक्ति से भरे सिलैंडर हैं। जिनमें एक-एक में सैकडों साल का ईंधन भरा हुआ है।’ - उसने बताया।
‘सैकड़ों साल... आपकी उम्र क्या है’ ? मैंने हैरान होकर पूछा।
उसने ठंड़ी सांस भरते हुए कहा -‘चलो मैं शुरू से ही तुम्हें बताता हूँ। राजू, हजारों साल पहले हमारा ग्रह भी तुम्हारी पृथ्वी की तरह विविध वनस्पतियों, जीव जंतुओं से भरपूर था।’
उसने बताया -‘हमारे यहाँ अनेक दुधारू पशु थे। वैज्ञानिकों ने देखा ये चारा खाते है फिर उसके पेट में कुछ ऐसी रासायनिक क्रियाएं होतीं हैं जिनसे वह चारा दूध में बदल जाता है। उन्होंने सोचा क्यों न हम एक ऐसी मशीन बनाएं जिसमें उनके पेट जैसा वातावरण हो। वे उसमें चारा डालें और दूध बना लें। उन्होंने बना ली।
फिर सोचा आखिर चारे पर भी निर्भर क्यों रहा जाए। चारा भी तो हवा में मौजूद तत्वों से पोषकता ग्रहण करता है। क्यों न हम हवा से सीधे ऐसे पोषक तत्वों को ले लें, जो हवा से चारे ,चारे से गाय और गाय के दूध के जरिए हमें मिलते हैं।’
मेरा मुँह खुला रह गया।
यही नहीं उन्होंने मछलियों से मिलने वाले प्रोटीन को भी सीधे लेना शुरू दिया। जो वे समुद्री वनस्पतियों को खाकर पातीं थीं। वनस्पतियाँ सागर के पानी से और सागर का पानी वातावरण से...
मगर इससे प्रकृति का चक्र धीरे - धीरे बिगड़ता चला गया। और लंबे समय में ये जीव जंतु वनस्पतियाँ कम होते गए, और ...
और क्या हुआ ? मैंने पूछा।
...और एक दिन यह जीवन चक्र खत्म हो गया। अब हमारा ग्रह सूना है। हमारी उम्र हजारों साल है। कभी पुराना समय याद आता है तो मैं तुम्हारी इस धरती पर आ जाता हूँ।
यानी अब से पहले भी आते रहे हो यहाँ ? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
हाँ, अक्सर ... कई बार आता रहता हूँ। - उसने कहा
मैंने पूछा - अच्छा, वो यू एफ ओ यानी उड़नतश्तरियों के जरिए...
नहीं, नहीं, मैंने कहा न अभी तुमसे जब तक हम न चाहें कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। - उसने बताया।
मगर मैंने तो जान लिया है तुम्हारे बारे में ...- मैंने जब ऐसा बोला तो वह मुस्कराया।
‘राजू,मत भूलो तुम यह सब सपने में देख रहे हो। -उसने कहा।
‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो ?’ मैंने जब यह प्रश्न किया तो वह हँसने लगा।
बोला - ‘सपने की इस बात पर भला कौन विश्वास करेगा। शायद तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हें मैंने ही सपने में बुलाया है।’
-आप मेरी भाषा में कैसे बोलते हो ?
‘ये बुलबुले देख रहे हो। इनसे होकर किसी भी भाषा की तरंगें मेरे पास आएंगी, मेंरी भाषा में बदल जाएंगी।
हाँ, कमल, मैं भी उसकी इस बात पर जोर से चैंक पड़ा जिससे मेरी आँख खुल गई।
‘ओह’ - सभी बोल पडे।
‘अब तुम्हें अपने सपने में वह कब बुलाएगा ?’ - अचानक नंदिनी ने राजू से पूछा।
‘क्यों ? ’ - कमल ने नंदिनी से पूछा और सब उसकी ओर देखने लगे।
- ‘मुझे तो उपहार में उसके वे बुलबुले चाहिए जिनसे अपने देश की सैकड़ांे बोलियों और भाषाओं में बिखरे बाल साहित्य को हिंदी में सुन सकूँ।-स्टेला ने कहा।
अपने देश ही क्यों दुनिया के सारे देशों के बाल साहित्य को क्यों नहीं ? - राजू बोला।
‘बाल साहित्य ही क्यों, जितनी अलिखित विरासत है वह सारी की सारी संग्रहीत होनी चाहिए।’- स्टेला ने जल्दी से कहा।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो,जब हमें आइडिया मिल ही गया है तो क्यों न हम खुद इस तरह का यंत्र बनाने का प्रयास करें।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो, वैसे हमारे ब्रहमाण्ड में ऐसे ग्रह जरूर हो सकते हैं जिनमें विज्ञान हमसे आगे हो।
‘कुछ भी कहो, ये सपना था बहुत मजेदार’ - नंदिनी ने कहा तो सबने सहमति में सिर हिलाया
इस तरह वे सभी राजू के सपने में दूसरे ग्रह से आए मेहमान के बारे में बातें करते हुए घर की ओर चल दिए।
राजू ने आते ही कहा - ‘दोस्तोे, इस बार मेरी आँख लगी तो मैंने खुद को वीरान टापू पर पाया। चारांे ओर उभरी हुई पहाड़ियाँ.. सामने से आता सागर की लहरों का हल्का-हल्का शोर... अभी मैं सोच रहा था यह कौन सी जगह है, मैं यहाँ से बाहर कैसे जाऊँगा?
तभी सामने सागर की रेत से ऊँचे - ऊँचे बुलबुले उठने लगे। देखा कीचड़ से एक आकृति निकलकर बाहर आ रही है।
‘वह एक टेबिल लैंप की तरह थी। उसका चेहरा कीचड़ में पूरी तरह सना हुआ था। एकाएक उसके रोम -रोम से पानी के फुहारे से छूटने लगे जिसमें उसका पूरा शरीर धुल गया। वह एक विचित्र प्राणी था जैसा मैंने पहले नहीं देखा था।’
अचानक उसकी आवाज सुनाई दी - ‘कैसे हो राजू’?’
‘मैंने उससे डरते - डरते पूछा, ‘आप कौन हैं ?’ ‘आपको मेरा नाम कैसे पता?’
उसने जबाब दिया -‘राजू मुझे अपना दोस्त समझो।’
मैंने कहा -‘ऐसी अजीबोगरीब शक्ल का प्राणी मैंने पहले नहीं देखा।’
उसने मुस्कराते हुए कहा -‘राजू तुम्हारी पृथ्वी पर ऐसे अनेक जीव मौजूद हैं, जिन्हें किसी भी मनुष्य ने नहीं देखा। मैं तो ठहरा दूसरी आकाशगंगा का प्राणी...
‘दूूसरी आकाशगंगा’... मैने पलकें झपकाईं।
उसने कहा - ‘राजू तुम्हें पता है हमारा ब्रह्मांड कितना बड़ा है इसका कोई ओर - छोर नहीं। इसका कोई अंत न पाकर इसका नाम ही अनंत रख दिया गया है।
उसने आगे कहा -‘तुम्हारी पृथ्वी जिस तारे के चक्कर लगाती है, वह सूर्य तो बहुत छोटा तारा है तुम्हारी आकाशगंगा का।
ऐसी लाखों करोड़ों में से एक आकाशगंगा से मैं आया हूँ।
ओह ! मगर तुमने इतनी दूरी को कैसे पार किया - मैंने प्रश्न किया।
वह बोला- ‘राजू, हमारा विज्ञान तुम्हारी धरती से कहीं आगे है। इसलिए यह कोई समस्या नहीं।
‘कैसे ? -मैंने पूछा।
उसने कहा - ‘ऐसे समझो, धरती का जल, बर्फ पानी और भाप यानी ठोस द्रव व गैस के रूप में तापमान के हिसाब से बदल जाता है। तुम्हें पता है हमारा शरीर किन पाँच तत्वों से मिलकर बना है ?’
‘पानी ,मिट्ठी, अग्नि, वायु और आकाश’- मैंने जल्दी से जबाब दिया।
उसने बताया - ‘बिलकुल ठीक, हमारे ग्रह पर भी ऐसा ही है। हमने विज्ञान की मदद से ऐसी तकनीक विकसित की कि हम खुद को इन पाँच में से किसी भी तत्व में बदल सकते हैं।‘
‘ऐसा क्या ? - मैं हैरान रह गया।
वह आगे बोला -‘अभी मैं खुद को हवा में बदल कर तुम्हारे आसपास मौजूद रहूँगा या सागर की इन लहरों में मिल कर बहने लगूँगा और तुम्हें पता भी नहीं चलेगा।’
यह कहते कहते वह एकदम से गायब हो गया। जरा सी देर में वह फिर दिखाई देने लगा। मैं हैरान था।
मैंने पूछा लेकिन तुम जीने के लिए प्राणशक्ति कहाँ से लेते हो ?
उसने मुस्कराते हुए जबाब दिया -यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा तुमने... हम अपनी प्राणशक्ति उन पाँच तत्वों में से किसी एक तत्व से ले सकते हैं।
‘जैसे’ ? - मैंने हैरान होते हुए पूछा।
उसने बताया -‘तुम हवा से साँस लेते हो, जबकि मैं हवा, पानी, मिट्टी, अग्नि और आकाश यानि शून्य निर्वात से भी जीवनी शक्ति ग्रहण कर सकता हूँ।’
‘ओह, मुझे याद आया। मैंने एक फिल्म में दूसरे ग्रह के प्राणी को धूप यानि अग्नि से जीवनी शक्ति पाते देखा था।’ - मैंने कहा।
उसने मुझे आगे बताया -‘ये जो बाल देख रहे हो न मेरे ...
‘मैंने उसके बालों की ओर ध्यान से देखा तो मुझे वे बाल कुछ-कुछ उस बाली जैसे दिखे जिसे हम लोग एक दूसरे की पीठ पर फेंककर चिपका देते हैं। ऐसे पतले-पतले सैकड़ों बाल उसके सिर पर थे।’
हाँ - मैंने कहा।
वह बोला-‘दरअसल यह बाल नहीं हैं।’
‘हंय...तो फिर’? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
‘ये प्राणशक्ति से भरे सिलैंडर हैं। जिनमें एक-एक में सैकडों साल का ईंधन भरा हुआ है।’ - उसने बताया।
‘सैकड़ों साल... आपकी उम्र क्या है’ ? मैंने हैरान होकर पूछा।
उसने ठंड़ी सांस भरते हुए कहा -‘चलो मैं शुरू से ही तुम्हें बताता हूँ। राजू, हजारों साल पहले हमारा ग्रह भी तुम्हारी पृथ्वी की तरह विविध वनस्पतियों, जीव जंतुओं से भरपूर था।’
उसने बताया -‘हमारे यहाँ अनेक दुधारू पशु थे। वैज्ञानिकों ने देखा ये चारा खाते है फिर उसके पेट में कुछ ऐसी रासायनिक क्रियाएं होतीं हैं जिनसे वह चारा दूध में बदल जाता है। उन्होंने सोचा क्यों न हम एक ऐसी मशीन बनाएं जिसमें उनके पेट जैसा वातावरण हो। वे उसमें चारा डालें और दूध बना लें। उन्होंने बना ली।
फिर सोचा आखिर चारे पर भी निर्भर क्यों रहा जाए। चारा भी तो हवा में मौजूद तत्वों से पोषकता ग्रहण करता है। क्यों न हम हवा से सीधे ऐसे पोषक तत्वों को ले लें, जो हवा से चारे ,चारे से गाय और गाय के दूध के जरिए हमें मिलते हैं।’
मेरा मुँह खुला रह गया।
यही नहीं उन्होंने मछलियों से मिलने वाले प्रोटीन को भी सीधे लेना शुरू दिया। जो वे समुद्री वनस्पतियों को खाकर पातीं थीं। वनस्पतियाँ सागर के पानी से और सागर का पानी वातावरण से...
मगर इससे प्रकृति का चक्र धीरे - धीरे बिगड़ता चला गया। और लंबे समय में ये जीव जंतु वनस्पतियाँ कम होते गए, और ...
और क्या हुआ ? मैंने पूछा।
...और एक दिन यह जीवन चक्र खत्म हो गया। अब हमारा ग्रह सूना है। हमारी उम्र हजारों साल है। कभी पुराना समय याद आता है तो मैं तुम्हारी इस धरती पर आ जाता हूँ।
यानी अब से पहले भी आते रहे हो यहाँ ? - मैंने आश्चर्य से पूछा।
हाँ, अक्सर ... कई बार आता रहता हूँ। - उसने कहा
मैंने पूछा - अच्छा, वो यू एफ ओ यानी उड़नतश्तरियों के जरिए...
नहीं, नहीं, मैंने कहा न अभी तुमसे जब तक हम न चाहें कोई हमारे बारे में नहीं जान सकता। - उसने बताया।
मगर मैंने तो जान लिया है तुम्हारे बारे में ...- मैंने जब ऐसा बोला तो वह मुस्कराया।
‘राजू,मत भूलो तुम यह सब सपने में देख रहे हो। -उसने कहा।
‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो ?’ मैंने जब यह प्रश्न किया तो वह हँसने लगा।
बोला - ‘सपने की इस बात पर भला कौन विश्वास करेगा। शायद तुम्हें यह भी नहीं पता कि तुम्हें मैंने ही सपने में बुलाया है।’
-आप मेरी भाषा में कैसे बोलते हो ?
‘ये बुलबुले देख रहे हो। इनसे होकर किसी भी भाषा की तरंगें मेरे पास आएंगी, मेंरी भाषा में बदल जाएंगी।
हाँ, कमल, मैं भी उसकी इस बात पर जोर से चैंक पड़ा जिससे मेरी आँख खुल गई।
‘ओह’ - सभी बोल पडे।
‘अब तुम्हें अपने सपने में वह कब बुलाएगा ?’ - अचानक नंदिनी ने राजू से पूछा।
‘क्यों ? ’ - कमल ने नंदिनी से पूछा और सब उसकी ओर देखने लगे।
- ‘मुझे तो उपहार में उसके वे बुलबुले चाहिए जिनसे अपने देश की सैकड़ांे बोलियों और भाषाओं में बिखरे बाल साहित्य को हिंदी में सुन सकूँ।-स्टेला ने कहा।
अपने देश ही क्यों दुनिया के सारे देशों के बाल साहित्य को क्यों नहीं ? - राजू बोला।
‘बाल साहित्य ही क्यों, जितनी अलिखित विरासत है वह सारी की सारी संग्रहीत होनी चाहिए।’- स्टेला ने जल्दी से कहा।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो,जब हमें आइडिया मिल ही गया है तो क्यों न हम खुद इस तरह का यंत्र बनाने का प्रयास करें।
सलीम ने कहा - ‘दोस्तो, वैसे हमारे ब्रहमाण्ड में ऐसे ग्रह जरूर हो सकते हैं जिनमें विज्ञान हमसे आगे हो।
‘कुछ भी कहो, ये सपना था बहुत मजेदार’ - नंदिनी ने कहा तो सबने सहमति में सिर हिलाया
इस तरह वे सभी राजू के सपने में दूसरे ग्रह से आए मेहमान के बारे में बातें करते हुए घर की ओर चल दिए।
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