आज कल देखा गया है अपनी व्यस्तताओं के चलते पिता का उनके बच्चों चाहे वह लड़का हो या लड़की उससे अबोला सा रहता है। यह एक अलग तरह की चुनौती है।
प्रस्तुत है एक कविता
पापा पास बुलाओ ना,
रूठूँ, मुझे मनाओ ना,
रूठूँ, मुझे मनाओ ना,
कुछ माँगूँ तो मत बोलो,
मम्मी से ले आओ ना,
मम्मी से ले आओ ना,
याद करो अपना बचपन,
छोटे थे कैसा था मन,
छोटे थे कैसा था मन,
बात करो मेरे मन की,
कुछ घर की कुछ ट्यूशन की,
कुछ घर की कुछ ट्यूशन की,
अपने गले लगाओ ना,
अब इतना झुँझलाओ ना,
अब इतना झुँझलाओ ना,
अभी तो आए,जाओ ना,
पापा पास बुलाओ ना,
पापा पास बुलाओ ना,
No comments:
Post a Comment