जो रो न सकें निज भाषा में,
उससे बेचारा और कौन?
मन में घुट कर रह जाए बोल,
जब मजबूरी में रहें मौन,
उससे बेचारा और कौन?
मन में घुट कर रह जाए बोल,
जब मजबूरी में रहें मौन,
जिसमें हम सोकर जाग रहे,
जिसमें हम रोकर हँसते है
उस मइया की भाषा ही में तो,
बस प्रान हमारे बसते हैं,
जिसमें हम रोकर हँसते है
उस मइया की भाषा ही में तो,
बस प्रान हमारे बसते हैं,
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