उत्तराखंड राज्य के टिहरी गढ़वाल जिले की घनसाली तहसील का वह एक लगभग चालीस परिवारों का छोटा सा गांव है। जिसका नाम है बडियार, यह गांव मुख्य सडक से लगभग दो किलोमीटर अंदर की ओर है।
16 जुलाई 2014 की शाम का झुटपुटा फैल रहा था। पहाड़ों पर तो वैसे भी शाम कुछ तेजी से गहराने लगती है। इसलिए अंधेरा होने में देर न लगी। सात साढ़े सात का समय हो रहा था। गांव का ट्रांसफारमर फुँक चुका था। इसलिए गांव में अंधेरा तेजी से छा चुका था। इक्का दुक्का घरों से दिए की की टिमटिमाती रोशनी अंधेरे के साम्राज्य में सेंध लगाती हुई घरों की चहारदीवारी के अंदर ही दम तोड़ती नज़र आ रही थी। अर्जुन का घर गांव से कुछ बाहर की ओर हटकर था।
आज स्कूल से बारह बजे छुट्टी होने के बाद जब अर्जुन घर आया तो उसने खुद दाल भात और रोटी बनाई। वह अक्सर ऐसा करता था। उसे खाना बनाने का शौक जो था। खाना खाकर अब वह पढ़ने के लिए घर में अंदर बैठा अपनी स्कूल की किताबें पलट रहा था और मोबाइल से हल्की धुन में गाने भी सुन रहा था। आज वह और उसकी मम्मी घर में अकेले थे। अर्जुन अपने चार भाई बहनों में सबसे छोटा था। उसकी दीदी अपनी बड़ी बहन के यहां गई हुई थी।
उसके पिता तो बचपन में तभी गुजर गए थे जब वह तीन साल का था। अब तो उसे उनका चेहरा भी याद नहीं। मां ने जैसे तैसे करके तीन बच्चों को पाला। अब वे उसी स्कूल में भोजन माता के रूप में कार्यरत हैं जिसमें पंद्रह साल का अर्जुन कक्षा ग्यारह का छात्र है। मां की उम्मीद है कि जल्दी ही वह पढ-़लिख कर कहीं नौकरी करेगा मां का हाथ बंटाएगा।
तभी बाहर बरामदे से बगल के कमरे में बंधे जानवरों के रंभाने की आवाज आई। मां ने कहा - ‘पता है, भूख लगी है। आ रही हूँ, जरा ठहरो।’ अर्जुन मैं भैंस और बछड़े को चारा देकर आती हूँ।’ कहकर वे जानवरों को चारा डालने बाहर की ओर चल दी। जानवरों को चारा डालते ही उन्हें अंधेरे में आभाष हुआ जैसे कोई जानवर अपने दोनों पंजों पर खड़ा होकर उनकी ओर बढ़ रहा है। जैसे ही उन्हें उसके खतरनाक होने का अंदेशा हुआ। उनका गला रुंध गया। जबतक वे संभलें संभलें उसने उनपर बाईं ओर से हमला कर दिया। उनके मुंह से अनचाहे ही एक जोरदार चीख निकल गई।
अंदर अर्जुन अपनी किताबों में उलझा था। तभी अचानक शाम के सन्नाटे को चीरती हुई चीख की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह तुरंत बाहर की ओर भागा।
बाहर आकर उसने हल्के अंधेरे में देखा कि उसकी मां बेहोश पड़ी थी और एक बाघ उनकी ओर खतरनाक ढ़ंग से बढ़ रहा है। अर्जुन उस समय खाली हाथ था। उसने जोरदार आवाज लगाकर बाघ को ललकारा और तुरंत पीछे मुड़कर दरवाजे के साथ रखे दरांती और लाठी को उठाया। अब वह तेजी से बाघ की ओर बढ़ा। बाघ को अपने और शिकार के बीच में आया यह व्यवधान पसंद नहीं आया और वह अर्जुन की मां को छोड़कर अर्जुन की ओर ही बढ़ने लगा।
दरांती तो छोटी थी हां मगर वह डंडा लंबा था। सो अर्जुन ने आगे बढ़कर पूरी ताकत से उसे घुमाकर बाघ के सिर पर प्रहार किया। जोर से लगी चोट से बाघ लड़खड़ा गया और पलट गया। इसी बीच अर्जुन ने झट से अपनी मां को उठा कर दरवाजे के अंदर कर दिया और फिर से बाघ का सामना करने के लिए आ गया।
उसने देखा कि उससे चोट खाकर बाघ अब जानवरों के कमरे की ओर जाने लगा था। अब अर्जुन ने जोर से आवाज लगाते हुए बाघ पर हमला कर दिया। बाघ ने जब बाधा के रूप में अर्जुन को अपने सामने पाया तो वह अर्जुन पर ही टूट पड़ा। मगर अर्जुन पहले ही से इसके लिए तैयार था। उसने घुमाकर डंडे के तीन चार जोरदार प्रहार उस पर कर दिए। इस हमले से वह बौखला गया और उसने पलट कर अर्जुन पर हमला कर दिया। अर्जुन ने न केवल अपने को बचाया बल्कि उसे अपने डंडे का प्रसाद भी दे दिया। इस बीच वह उसे ललकारता भी जा रहा था। हालांकि इस झड़प में उसके हाथों पर बाघ के पंजों के कुछ निशान लग चुके थे मगर उसने इसकी परवाह नहीं की।
इतना शोरगुल सुनकर पड़ोस के घरों के लोगों ने भी आवाजें लगानी शुरू कर दीं। क्या हुआ... कौन है... कहते हुए लोग आ गए। जब उन्होंने अर्जुन की बाघ से भिडन्त देखी तो वे दंग रह गए। उन्होंने तुरंत शोर मचाते हुए पत्थर फेंकना शुरू कर दिया जिससे घबराकर वह बाघ जंगल की ओर भाग गया। उस रात ग्यारह बजे तक गांव के लोगों का जमावड़ा अर्जुन के घर के पास लगा रहा। लोगों ने टार्च की रोशनी डाल कर शोर मचाकर खेतों के नजदीक जाकर पक्का किया कि अब बाघ वहां नहीं है। वह वहां से भाग चुका था। गांव के लोगों ने अर्जुन की मां के हाथ में घाव पर देशी दवा लगाकर पट्टी बांध दी गई। वे अगले दिन उन्हें इलाज के लिए घनसाली पिलखी ले गए।
वन विभाग ने वन्य जीव द्वारा घायल किए जाने के कारण अर्जुन की मां विक्रमा देवी को अनुग्रह राशि के रूप में पंद्रह हजार रुपए की धनराशि दी। राज्य के मुख्यमंत्री ने अर्जुन को बाघ से अपनी मां की जान बचाने के लिए इक्यावन हजार रुपए देने की घोषणा की। जब राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार के लिए भेजे गए चार नामों में से अर्जुन का नाम संजय चोपड़ा पुरस्कार के लिए चुने जाने की सूचना मिली तो बडियार के लोग खुशी से झूम उठे।
अर्जुन को जब प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार देने के बलिए दिल्ली बुलाया गया तो वह अपनी मां और अपने स्कूल शिक्षक के साथ गया। यह उसकी पहली दिल्ली यात्रा थी। वहां देश के कोने कोने से उसी की तरह से बहादुर बच्चे आए थे। उनसे और देश के बड़ी बड़ी हस्तियों से मिलकर वह बेहद खुश था। अर्जुन सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहता है।
नन्हे दोस्तो,
मां पर आए संकट जो तो हाजिर अपनी जां है,
हों कुछ पल नाराज़ भले पर,मां तो आखिर मां है,
गलत इरादा कर कोई आए ये मजाल किसकी है,
एक पल में दे देंगे ये जां, देन भी तो उसकी है,
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16 जुलाई 2014 की शाम का झुटपुटा फैल रहा था। पहाड़ों पर तो वैसे भी शाम कुछ तेजी से गहराने लगती है। इसलिए अंधेरा होने में देर न लगी। सात साढ़े सात का समय हो रहा था। गांव का ट्रांसफारमर फुँक चुका था। इसलिए गांव में अंधेरा तेजी से छा चुका था। इक्का दुक्का घरों से दिए की की टिमटिमाती रोशनी अंधेरे के साम्राज्य में सेंध लगाती हुई घरों की चहारदीवारी के अंदर ही दम तोड़ती नज़र आ रही थी। अर्जुन का घर गांव से कुछ बाहर की ओर हटकर था।
आज स्कूल से बारह बजे छुट्टी होने के बाद जब अर्जुन घर आया तो उसने खुद दाल भात और रोटी बनाई। वह अक्सर ऐसा करता था। उसे खाना बनाने का शौक जो था। खाना खाकर अब वह पढ़ने के लिए घर में अंदर बैठा अपनी स्कूल की किताबें पलट रहा था और मोबाइल से हल्की धुन में गाने भी सुन रहा था। आज वह और उसकी मम्मी घर में अकेले थे। अर्जुन अपने चार भाई बहनों में सबसे छोटा था। उसकी दीदी अपनी बड़ी बहन के यहां गई हुई थी।
उसके पिता तो बचपन में तभी गुजर गए थे जब वह तीन साल का था। अब तो उसे उनका चेहरा भी याद नहीं। मां ने जैसे तैसे करके तीन बच्चों को पाला। अब वे उसी स्कूल में भोजन माता के रूप में कार्यरत हैं जिसमें पंद्रह साल का अर्जुन कक्षा ग्यारह का छात्र है। मां की उम्मीद है कि जल्दी ही वह पढ-़लिख कर कहीं नौकरी करेगा मां का हाथ बंटाएगा।
तभी बाहर बरामदे से बगल के कमरे में बंधे जानवरों के रंभाने की आवाज आई। मां ने कहा - ‘पता है, भूख लगी है। आ रही हूँ, जरा ठहरो।’ अर्जुन मैं भैंस और बछड़े को चारा देकर आती हूँ।’ कहकर वे जानवरों को चारा डालने बाहर की ओर चल दी। जानवरों को चारा डालते ही उन्हें अंधेरे में आभाष हुआ जैसे कोई जानवर अपने दोनों पंजों पर खड़ा होकर उनकी ओर बढ़ रहा है। जैसे ही उन्हें उसके खतरनाक होने का अंदेशा हुआ। उनका गला रुंध गया। जबतक वे संभलें संभलें उसने उनपर बाईं ओर से हमला कर दिया। उनके मुंह से अनचाहे ही एक जोरदार चीख निकल गई।
अंदर अर्जुन अपनी किताबों में उलझा था। तभी अचानक शाम के सन्नाटे को चीरती हुई चीख की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह तुरंत बाहर की ओर भागा।
बाहर आकर उसने हल्के अंधेरे में देखा कि उसकी मां बेहोश पड़ी थी और एक बाघ उनकी ओर खतरनाक ढ़ंग से बढ़ रहा है। अर्जुन उस समय खाली हाथ था। उसने जोरदार आवाज लगाकर बाघ को ललकारा और तुरंत पीछे मुड़कर दरवाजे के साथ रखे दरांती और लाठी को उठाया। अब वह तेजी से बाघ की ओर बढ़ा। बाघ को अपने और शिकार के बीच में आया यह व्यवधान पसंद नहीं आया और वह अर्जुन की मां को छोड़कर अर्जुन की ओर ही बढ़ने लगा।
दरांती तो छोटी थी हां मगर वह डंडा लंबा था। सो अर्जुन ने आगे बढ़कर पूरी ताकत से उसे घुमाकर बाघ के सिर पर प्रहार किया। जोर से लगी चोट से बाघ लड़खड़ा गया और पलट गया। इसी बीच अर्जुन ने झट से अपनी मां को उठा कर दरवाजे के अंदर कर दिया और फिर से बाघ का सामना करने के लिए आ गया।
उसने देखा कि उससे चोट खाकर बाघ अब जानवरों के कमरे की ओर जाने लगा था। अब अर्जुन ने जोर से आवाज लगाते हुए बाघ पर हमला कर दिया। बाघ ने जब बाधा के रूप में अर्जुन को अपने सामने पाया तो वह अर्जुन पर ही टूट पड़ा। मगर अर्जुन पहले ही से इसके लिए तैयार था। उसने घुमाकर डंडे के तीन चार जोरदार प्रहार उस पर कर दिए। इस हमले से वह बौखला गया और उसने पलट कर अर्जुन पर हमला कर दिया। अर्जुन ने न केवल अपने को बचाया बल्कि उसे अपने डंडे का प्रसाद भी दे दिया। इस बीच वह उसे ललकारता भी जा रहा था। हालांकि इस झड़प में उसके हाथों पर बाघ के पंजों के कुछ निशान लग चुके थे मगर उसने इसकी परवाह नहीं की।
इतना शोरगुल सुनकर पड़ोस के घरों के लोगों ने भी आवाजें लगानी शुरू कर दीं। क्या हुआ... कौन है... कहते हुए लोग आ गए। जब उन्होंने अर्जुन की बाघ से भिडन्त देखी तो वे दंग रह गए। उन्होंने तुरंत शोर मचाते हुए पत्थर फेंकना शुरू कर दिया जिससे घबराकर वह बाघ जंगल की ओर भाग गया। उस रात ग्यारह बजे तक गांव के लोगों का जमावड़ा अर्जुन के घर के पास लगा रहा। लोगों ने टार्च की रोशनी डाल कर शोर मचाकर खेतों के नजदीक जाकर पक्का किया कि अब बाघ वहां नहीं है। वह वहां से भाग चुका था। गांव के लोगों ने अर्जुन की मां के हाथ में घाव पर देशी दवा लगाकर पट्टी बांध दी गई। वे अगले दिन उन्हें इलाज के लिए घनसाली पिलखी ले गए।
वन विभाग ने वन्य जीव द्वारा घायल किए जाने के कारण अर्जुन की मां विक्रमा देवी को अनुग्रह राशि के रूप में पंद्रह हजार रुपए की धनराशि दी। राज्य के मुख्यमंत्री ने अर्जुन को बाघ से अपनी मां की जान बचाने के लिए इक्यावन हजार रुपए देने की घोषणा की। जब राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार के लिए भेजे गए चार नामों में से अर्जुन का नाम संजय चोपड़ा पुरस्कार के लिए चुने जाने की सूचना मिली तो बडियार के लोग खुशी से झूम उठे।
अर्जुन को जब प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार देने के बलिए दिल्ली बुलाया गया तो वह अपनी मां और अपने स्कूल शिक्षक के साथ गया। यह उसकी पहली दिल्ली यात्रा थी। वहां देश के कोने कोने से उसी की तरह से बहादुर बच्चे आए थे। उनसे और देश के बड़ी बड़ी हस्तियों से मिलकर वह बेहद खुश था। अर्जुन सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहता है।
नन्हे दोस्तो,
मां पर आए संकट जो तो हाजिर अपनी जां है,
हों कुछ पल नाराज़ भले पर,मां तो आखिर मां है,
गलत इरादा कर कोई आए ये मजाल किसकी है,
एक पल में दे देंगे ये जां, देन भी तो उसकी है,
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