वे अपने जमाने की मशहूर हीरोइन थे
उन दिनों मेरी शाम अक्सर दिल्ली के मंडी हाउस एरिये में गुजरती थीं। एक दिन हुआ यूँ जब मैं संगीत नाटक अकादमी के पुस्तकालय से बाहर निकल रहा था तभी मेरी नज़र उसके सामने गैलरी के उस पार के कमरे के बाहर लगी नेम प्लेट पर पडी लिखा था -‘भारत रत्न भार्गव’
नाम कुछ अलग भी था और परिचित भी। क्योंकि एक भारतरत्न भार्गव का नाम मैं बी.बी.सी. के समाचार सुनते समय पहले के सुनने वालों के पत्रों के जरिए और समाचार प्रस्तुत करने के द्वारा सुन चुका था। सोचा कहीं ये वही तो नहीं। मन में उठी जिज्ञासा को मैं रोक नहीं पाया और पूछकर कमरे के अंदर चला गया। उन्होंने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली। इससे पहले वे कुछ पूछते मैंने उनसे कहा- ‘आपकी नेम प्लेट पढ़कर अंदर आ गया, क्या आप कभी बी बी सी में रहे हैं?’
उन्होंने तसल्ली से बैठने का इशारा करते हुए पूछा-‘आप कैसे जानते हैं?’
मैंने कहा-मैं बी बी सी का नियमित और सक्रिय óोता रहा हूँ।’ सक्रिय शब्द पर वे थोडा चैंके तो मैंने बताया कि मैं कभी कभी पत्र भी लिखता था जो कार्यक्रम में पढे जाते थे। मुझे खूब याद हैं थ्यानमिन चैक घटना पर लिखकर भेजी गई मेरी कविता हो या बी बी सी हिंदी सेवा के पचास साल पूरे होने पर लिखे पत्र और कविता बडी रूचि और विस्तार के साथ कार्यक्रम में पढे गए थे। ‘अर्धशती की होकर लगती षोड़शवर्षी बीबी सी’ सुनकर तो वे खूब हंसे।
फिर तो उधर से गुजरते हुए उनके पास मैं अक्सर बैठ जाया करता। वे सहज थे लेकिन उनके व्यक्तित्व में एक अलग किस्म का अभिजात्यता थी। उनकी बातचीत में बेतकल्लुफी तो रहती मगर उसमें कुछ अदृश्य दूरी भी रहती जिसे मैं अनुभव करता था वह उम्र के तआल्लुक भी थी और ज्ञान और अनुभव को लेकर भी। जिसको लेकर उनमें और मुझ नौसिखिए में कई गुना अंतर था। फिर भी ये उनका बडप्पन ही था जो उनसे कला साहित्य संस्कृति और व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी दुनियां जहान की बातें होती।
उन दिनों गोपालप्रसाद व्यास के प्रयासों का नतीजा ‘हिंदी भवन’ आई टी ओ के निकट बन चुका था और उसमें बालस्वरूप राही जी आ चुके थे। चूँकि ‘हिंदी भवन’ के निर्माण के दौरान ही उसकी भविष्य की गतिविधियों को लेकर मेरा एक लेख राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र में राही जी के वहां आने से पूर्व ही प्रकाशित हो चुका था। सो अक्सर वहां भी मेरी राही जी के पास उठक बैठक थी। अक्सर जब चर्चा छिड़ती तो बात की बात में व्यक्तिगत पुराने संस्मरण निकलकर बाहर आ जाते। राही जी इस बात का ध्यान रखते और कह भी देते - ‘देखो यह बात मैं यह बात बता तो रहा हूँ मगर कहीं तुम इसे छाप न देना। दोनों व्यक्तित्व एक दूसरे के मित्र थे।
ऐसे ही एक दिन बातों बातों में भार्गव जी ने बताया कि अगले महीने मास्टर फिदा हुसैन नरसी दिल्ली आ रहे हंै। उनसे मिलना जीवित इतिहास से मिलना होगा। क्या तुम्हें पता है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों की शुरुआत से पहले पारसी थियेटर का चलन था और उस समय में फिदा हुसैन अपने जमाने की मशहूर हीरोइन हुआ करते थे?
कर सको तो उनका इण्टरव्यू कर लो। मैंने उनकी इस बात को चुनौती की तरह लिया।
मुझे बेहद जिज्ञासा और उत्सुकता थी। मैंने उनसे मिलने की तैयारी शुरू कर दी। संगीत नाटक अकादमी के पुस्तकालय में उनसे जुड़े तथ्य एकत्रित किए और प्रश्न बनाए और बड़ी बेसब्री से उनके दिल्ली आने का इंतजार करने लगा। एक दिन आया जब वे दिल्ली आ गए। मैं उनका पता पूछता हुआ राष्ट्रªीय नाट्य विद्यालय के हाॅस्टल में जा पहुँचा।
लंबा कद चेहरे पर अनुभव के निशान लिए सफेद कुरते पायजामे में एक बुजुर्गवार सज्जन मुझे बैठे नज़्ार आए। थोड़ी ही देर की औपचारिक बातचीत में उन्होंने मुझे अपना मुरीद बना लिया। कितनी जल्दी मैं उनसे सहज हो गया था। वे मुस्लिम थे और नाटकों में उन्होंने ज्यादातर धार्मिक हिन्दू किरदार निभाए। उनके गुरू प्रसिद्ध पंडित राधेश्याम कथावाचक थे। मैंने जब उनसे उस समय किसी विवादित बयान पर अपना विचार देने को कहा तो उन्होंने इशारे से कोई बयान या वक्तव्य देने से बचना चाहा। उनके कुछ बोलने से कोई नया विवाद पैदा हो ऐसी उनकी न रुचि थी और न प्रवृत्ति,वे तो अपने काम के सहारे जाने जाए इस विचार के थे। क्यों न होता एक पूरी जिंदगी का अनुभव उनके पास था। विश्व के सबसे बड़े हमारे इस सिनेमा उद्योग की नींव में थीं पारसी थियेटर कंपनियां। एक समय था जब इन थियेटर कंपनियों ने पेशावर से मुंबई तक, क्वेटा बलूचिस्तान से लेकर कलकत्ते तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक धूम मचाई थी। जिनकी सुदृढ़ बुनियाद पर ही आज का हिन्दी सिनेमा खड़ा है। यह वह समय था जब पुरुष ही महिला पात्रों का अभिनय किया करते थे। वे अपनी कंपनी के अपने जमाने की मशहूर हीरोइन थे। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों को नाटक की शैली पारसी थियेटर की बारीकियां सिखाने आए थे।
जैसे कोई बच्चा अपने दादाजी के पास बैठ कर मनोरंजक कहानी सुनता है। मेरे प्रश्नों के जबाब में कुछ ऐसे ही उनके मुँह से अनुभव के तपे हुए शब्द निकलते रहे ओर मैं उन्हें अपनी नोटबुक पर लिखता रहा। तीन दिन मैंने उनसे बातचीत की। मेरा उनसे पहला प्रश्न था -
कुछ अपने बारे में बताएं ? अभिनय की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ ?
मेरा जन्म उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के काजीटोला मुहल्ले में 12 मार्च 1899 में हुआ था। आठ वर्ष की अवस्था में ही गलें में सुर पैदा हुआ। सुन सुनकर गुनगुनाने लगा। कुदरी देन से मेरी आवाज़ मीठी व मधुर थी। गाने का शौक परवान चढ़ रहा था। उन्हीं दिनों मैंने कठपुतली का तमाशा देखा जिससे मेरी रंगमंच की ओर रुचि बढ़ गई। मैं उर्स के मौके पर मजारों पर होने वाली कव्वालियों में शामिल होने लगा। घर पर कट्टर मुसलमानी माहौल था। वे सभी मेरे ऐसे शौक को हराम समझते थे। मेरी खूब पिटाई हुई मगर इससे मेरा शौक कम होने के बजाय बढ़ता चला गया। मुरादाबाद की ही रायल ड्रामेटिकल क्लब में भरती होकर मैंने तीन नाटकों में स्त्री पात्र के रोल किए। फिर घर पर हुई पिटाई और लगातार चलते विरोध के कारण मैं घर से भाग कर दिल्ली आ गया और न्यू अल्फेड कंपनी में शामिल हो गया, जिसके निर्देशक सोहराब जी ओग्रा थे। फिर तो सारे देश में घूम-घूम कर सामाजिक राष्ट्रीय नाटक किए।
क्या कारण है कि पारसी थियेटर के देखने वालों को आज भी उसकी याद ताजा है। जबकि आज की फिल्मों और नाटकों में वह बात नहीं है?
उस समय देवकी बोस, नितिन बोस, व्ही शांताराम, ए. आर. कारदार, सोहराब मोदी जैसे निर्देशक थे। और पात्र भी अपनी पूरी जान लड़ा देते थे।
आपके अपने समय के कलाकारों ओर आज जिन छात्रों को प्रशिक्षित कर रहे हैं इनमें क्या फर्क देखते हैं?
‘फर्क’ मुस्कराते हुए कहने लगे - ये शौकिया मामला है। ये अभिनय निर्देशन के क्षेत्र में शौक में भर्ती हुए हैं जबकि हमस ब रोजी रोटी के लिए इससे जुड़े थे। दूसरा विकल्प नहीं था इसलिए जी जान लगा देते थे।
आपके नाम के आगे ये ‘नरसी’ की उपाधि कैसे लगी ?
‘भगत नरसी मेहता’ सन 1942 से 1945 तक दिल्ली में लगभग तीन सौ नाइट ड्रामा हुए। जिसका उदघाटन कलाकारों के कद्रदान सर श्रीराम ने किया। 1945 में करपात्री जी ने एक महान यज्ञ का आयोजन दिल्ली में किया, जिसमें चारो धामों के शंकराचार्य पधारे। उसी में मेरे धर्मपिता गुरू पंडित राधेश्याम कथावाचक रामायणी बरेली वाले भी पधारे। वे वानप्रस्थ ले चुके थे।उन्होंने अपने गुरू मदनमोहन मालवीय से वानप्रस्थ लिया था। घर छोड़ दिया था और पुरी के शंकराचार्य के साथ रहते थे। मेरा नाटक खूब जोर शोर से चल रहा था। पुरानी दिल्ली के रामलीला मैदान के निकट बड़े-बड़े मुगलिया अंदाज़ के तंबू लगे थे। मैंने गुरूजी से प्रार्थना की कि भक्ति रस का नाटक है आप आएं,शंकराचार्यजी को भी लाएं। वे मुझे लेकर उनके पास गए और बोले-‘यह मेरा शिष्य है, धर्मपुत्र है मुसलमान है। ‘नरसी मेहता’ नाटक देखने के लिए बुलाने आया है। ’सारी बातें जानकर वे बहुत खुश हुए। बोले-‘अवश्य आएंगे।’
वे आए तो उनके साथ में स्वामी श्रद्धानन्द के पुत्र ‘अर्जुन’अखबार के संपादक इंद्र वाचस्पति भी थे। पांच घंटे के नाटक के पहले इंटरवल में जब शंकराचार्यजी को अभिनंदन के लिए मंच पर बुलाया गया तो उन्होंने नाटक में मेरे अभिनय को देखकर तारीफ के जो शब्द कहे वो मुझे आज भी याद हैं -‘भई फिदा हुसैन, हम फकीरों के पास देने को कुछ नहीं होता, तुम्हारा अभिनय बहुत सुंदर है। मैं खुश हूँ जिन भक्त नरसी का पार्ट तुमने खेला है। मैं तुम्हें वही उपाधि देता हूँ।’
मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। भला उस समय कौन राजा महाराजा था जो सम्मान आदर में उनका मुकाबला करता। हिंदुस्तान के सबसे बड़े आदमी ने जब मुझे सम्मान दिया, मैंने उसे सिर माथे लगाया। तबस मेेरे नाम के आगे ‘नरसी’ लिखा जाने लगा।
जीवन के कोई और यादगार क्षण बताएं ?
1921 में अहमदाबाद में हमारी कंपनी का पंत्रित राधेश्याम कथावाचक का लिखा नाटक परम भक्त प्रहलाद मंचित हुआ। गांधी जी के सचिव महादेव देसाई से मालिकों के अच्छे संबंध थे। कंपनी के मालिकों की प्रार्थना पर गांधीजी ने बीस मिनट का समय दिया। उन दिनों गांधीजी का सत्याग्रह चालू था। बमुश्किल एक गाना मेरे द्वारा गाया गया था जो इस प्रकार था -
व्रत भंग करेंगे नहीं दुर्वाक्य बोलकर,
सह लेंगे जु़ल्म प्रेम से छाती को खोलकर,
आगे ही बढ़ेगे, नहीं पीछे को हटेंगे,
ज़ालिम जब हम पर आएगा,तलवार खोलकर,
दूसरी घटना 1923 की है। 1916 में पंडि़त मदन मोहन मालवीय जी ने ‘वीर अभिमन्यु’नाटक का उदघाटन किया, जो दरियागेज के जगत सिनेमा हाॅल में खेला गया था। यह न्यू अल्फेड कंपनी का अपना थियेटर हाॅल था जो उसके पास बीस वर्षों तक रहा। उस समय इसका नाम ‘संगम’ था। 1923 में मालवीय जी दोबारा ‘वीर अभिमन्यु’ देखने के लिए पधारे। नाटक में मेरा पात्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा का था। अभिमन्यु की मृत्यु के बाद इंटरवल होने पर पंडि़त राधेश्याम कथावाचक मालवीय जी को लेकर आए। सभी कलाकारों ने उन्हें प्रणाम किया। मैं भी जब चरण स्पर्श कर जब चलने लगा तो मालवीय जी बोले - ‘राधेश्याम, इस लड़के का पार्ट मुझे अच्छा लगा। इसकी बुलंद आवाज़ और हिंदी के सही स्पष्ट उच्चारण से मैं प्रभावित हूँ।’
पंडि़त ने मुझे बुलाया और कहा -‘इसकी एक और विशेषता से आप परिचित नहीं हैं। यह मेरा शिष्य ही नहीं धर्मपुत्र भी है और यह मुसलमान है।’
यह सुनकर मालवीय जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने फिर और भी कई बातें मुझसे पूछीं। मुझे एक नया नाम प्रेमशंकर दिया। 1947 के बाद की अनेक कंपनियों के हैंडबिल में मेरा नाम ‘प्रेमशंकर ‘नरसी’ ही छपा है। जो कि अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं।
आपके समय में ही एच.एम.वी. रिकार्ड कंपनी आई। आज तो इतनी तब्दीली आ चुकी है। कुछ उस समय की यादगार बातें बताइए ?
हाँ, एच.एम.वी. के रिकार्ड पर जो सबसे पहला गाना गाया गया था वह सोहराबजी ढ़ंूढ़ी ने गाया था जिसके बोल थे -
मुन्नी मेंढ़की री, तू तो पानी में की रानी,
कौए तेरे भाई भतीजे,चील तेरी देवरानी,
बगुला तेरा सगा देवर,मुर्गी तेरी नानी,
मुन्नी मेंढ़की री...
यह गाना उस समय भारत वर्मा, श्रीलंका में बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह स्थान वायसराय के अधिकार क्षेत्र में थे और यहां जाने के लिए पासपोर्ट बनवाने की जरूरत नहीं थी। इसके बाद तो जानकीबाई छप्पनछुरी इलाहाबाद वाली,जोहराबाई अंबालेवाली, बहुत सारे लोगों के गाने रिकार्ड करवाए गए। जोहरा के एक गाने के तो तीन लाख रिकार्ड बिके। जोकि उस जमाने में रिकार्ड था। गाना इस प्रकार था - ‘छोटे से बलमा मोरे आंगना में गिल्ली खेलें....इससे कंपनी मालामाल हो गई। उसने जोहराबाई अंबालेवाली को एक पोर्टेबल मशीन और सोने का मैडल मिला। एक सोने का मैडल मुझे भी मिला था। 1932 में दाग की एक ग़ज़ल मैंने रिकार्ड कराई। बोल थे -
ये सुन-सुन के मरना पड़ा हर किसी को,
नहीं मरते देखा किसी पर किसी को,
इस ग़ज़ल में मेरे रुक रुक कर गाए अंदाज़ की नकल बाद में कव्वालियों में होने लगी। ये गाने सिंध पंजाब में बहुत सुने जाते थे और बेहद मकबूल हुए।
राधेश्याम रामायण के ‘केवट संवाद’ वाला प्रसंग - तुम केवल हो भवसागर के फिर क्या लेना और क्या देना...
यह पूरे छंद एक ही रिकार्ड की दोनों साइड़ों में एच.एम.वी. में मैंने ही भरा। सन 1936 में मेरा रिकार्ड भारतवर्ष में ही नहीं वर्मा ,श्रीलंका, मारीशस,नेपाल आदि कई देशों में खूब चला और खूब बिका। सन 1940 में ग़ज़ल की रिर्कािडग के समय जो पेमेंट अस्सी रुपया तय था वही मिला लेकिन 1942 में रामायण के केवट संवाद के समय तक गायक लेखक संगीतकार तीनों की रायल्टी मुकर्रर यानी तय हो चुकी थी। इसकी रायल्टी उस समय गायक के पांच रुपए लेखक और संगीतकार के ढ़ाई ढ़ाई रुपए थे। मुझे इस रिकार्ड की रायल्टी के आठ हजार रुपए मिले। उन दिनों एक समय रिकाडों की बिक्री के आधार पर मेरा नाम के.सी. डे के बाद दूसरे नंबर पर आ गया ा के.सी.डे प्रसिद्ध गायक मन्ना डे सगे चाचा थे। मुझे अपने गानों के म्यूजिक साज को खुद चयन करने का अधिकार मिल गया था।
पारसी थियेटर के कलाकारों के पं्रति दर्शकों का क्या रवैया होता था ?
जनता नाटकों की शौकीन थी परतु कलाकारों को अच्छी नज़र से नहीं देखती थी।
उस समय के नाटकों के देखने वालों और आज के दर्शकों में क्या फर्क महसूस करते हैं?
स्मय के साथ साथ माहौल बदल रहे हैं बदलते रहेंगे। नई नई चीजें भी आती रहेंगी। दर्शकों की रुचि जिस ओर होगी। वह उन्नति करेगी। जो चीजें समय के साथ नहीं चलतीं उन्हें नष्ट हो जाना पड़ता है।
उन दिनों मेरी शाम अक्सर दिल्ली के मंडी हाउस एरिये में गुजरती थीं। एक दिन हुआ यूँ जब मैं संगीत नाटक अकादमी के पुस्तकालय से बाहर निकल रहा था तभी मेरी नज़र उसके सामने गैलरी के उस पार के कमरे के बाहर लगी नेम प्लेट पर पडी लिखा था -‘भारत रत्न भार्गव’
नाम कुछ अलग भी था और परिचित भी। क्योंकि एक भारतरत्न भार्गव का नाम मैं बी.बी.सी. के समाचार सुनते समय पहले के सुनने वालों के पत्रों के जरिए और समाचार प्रस्तुत करने के द्वारा सुन चुका था। सोचा कहीं ये वही तो नहीं। मन में उठी जिज्ञासा को मैं रोक नहीं पाया और पूछकर कमरे के अंदर चला गया। उन्होंने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली। इससे पहले वे कुछ पूछते मैंने उनसे कहा- ‘आपकी नेम प्लेट पढ़कर अंदर आ गया, क्या आप कभी बी बी सी में रहे हैं?’
उन्होंने तसल्ली से बैठने का इशारा करते हुए पूछा-‘आप कैसे जानते हैं?’
मैंने कहा-मैं बी बी सी का नियमित और सक्रिय óोता रहा हूँ।’ सक्रिय शब्द पर वे थोडा चैंके तो मैंने बताया कि मैं कभी कभी पत्र भी लिखता था जो कार्यक्रम में पढे जाते थे। मुझे खूब याद हैं थ्यानमिन चैक घटना पर लिखकर भेजी गई मेरी कविता हो या बी बी सी हिंदी सेवा के पचास साल पूरे होने पर लिखे पत्र और कविता बडी रूचि और विस्तार के साथ कार्यक्रम में पढे गए थे। ‘अर्धशती की होकर लगती षोड़शवर्षी बीबी सी’ सुनकर तो वे खूब हंसे।
फिर तो उधर से गुजरते हुए उनके पास मैं अक्सर बैठ जाया करता। वे सहज थे लेकिन उनके व्यक्तित्व में एक अलग किस्म का अभिजात्यता थी। उनकी बातचीत में बेतकल्लुफी तो रहती मगर उसमें कुछ अदृश्य दूरी भी रहती जिसे मैं अनुभव करता था वह उम्र के तआल्लुक भी थी और ज्ञान और अनुभव को लेकर भी। जिसको लेकर उनमें और मुझ नौसिखिए में कई गुना अंतर था। फिर भी ये उनका बडप्पन ही था जो उनसे कला साहित्य संस्कृति और व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी दुनियां जहान की बातें होती।
उन दिनों गोपालप्रसाद व्यास के प्रयासों का नतीजा ‘हिंदी भवन’ आई टी ओ के निकट बन चुका था और उसमें बालस्वरूप राही जी आ चुके थे। चूँकि ‘हिंदी भवन’ के निर्माण के दौरान ही उसकी भविष्य की गतिविधियों को लेकर मेरा एक लेख राष्ट्रीय सहारा समाचार पत्र में राही जी के वहां आने से पूर्व ही प्रकाशित हो चुका था। सो अक्सर वहां भी मेरी राही जी के पास उठक बैठक थी। अक्सर जब चर्चा छिड़ती तो बात की बात में व्यक्तिगत पुराने संस्मरण निकलकर बाहर आ जाते। राही जी इस बात का ध्यान रखते और कह भी देते - ‘देखो यह बात मैं यह बात बता तो रहा हूँ मगर कहीं तुम इसे छाप न देना। दोनों व्यक्तित्व एक दूसरे के मित्र थे।
ऐसे ही एक दिन बातों बातों में भार्गव जी ने बताया कि अगले महीने मास्टर फिदा हुसैन नरसी दिल्ली आ रहे हंै। उनसे मिलना जीवित इतिहास से मिलना होगा। क्या तुम्हें पता है कि हिन्दुस्तान में फिल्मों की शुरुआत से पहले पारसी थियेटर का चलन था और उस समय में फिदा हुसैन अपने जमाने की मशहूर हीरोइन हुआ करते थे?
कर सको तो उनका इण्टरव्यू कर लो। मैंने उनकी इस बात को चुनौती की तरह लिया।
मुझे बेहद जिज्ञासा और उत्सुकता थी। मैंने उनसे मिलने की तैयारी शुरू कर दी। संगीत नाटक अकादमी के पुस्तकालय में उनसे जुड़े तथ्य एकत्रित किए और प्रश्न बनाए और बड़ी बेसब्री से उनके दिल्ली आने का इंतजार करने लगा। एक दिन आया जब वे दिल्ली आ गए। मैं उनका पता पूछता हुआ राष्ट्रªीय नाट्य विद्यालय के हाॅस्टल में जा पहुँचा।
लंबा कद चेहरे पर अनुभव के निशान लिए सफेद कुरते पायजामे में एक बुजुर्गवार सज्जन मुझे बैठे नज़्ार आए। थोड़ी ही देर की औपचारिक बातचीत में उन्होंने मुझे अपना मुरीद बना लिया। कितनी जल्दी मैं उनसे सहज हो गया था। वे मुस्लिम थे और नाटकों में उन्होंने ज्यादातर धार्मिक हिन्दू किरदार निभाए। उनके गुरू प्रसिद्ध पंडित राधेश्याम कथावाचक थे। मैंने जब उनसे उस समय किसी विवादित बयान पर अपना विचार देने को कहा तो उन्होंने इशारे से कोई बयान या वक्तव्य देने से बचना चाहा। उनके कुछ बोलने से कोई नया विवाद पैदा हो ऐसी उनकी न रुचि थी और न प्रवृत्ति,वे तो अपने काम के सहारे जाने जाए इस विचार के थे। क्यों न होता एक पूरी जिंदगी का अनुभव उनके पास था। विश्व के सबसे बड़े हमारे इस सिनेमा उद्योग की नींव में थीं पारसी थियेटर कंपनियां। एक समय था जब इन थियेटर कंपनियों ने पेशावर से मुंबई तक, क्वेटा बलूचिस्तान से लेकर कलकत्ते तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक धूम मचाई थी। जिनकी सुदृढ़ बुनियाद पर ही आज का हिन्दी सिनेमा खड़ा है। यह वह समय था जब पुरुष ही महिला पात्रों का अभिनय किया करते थे। वे अपनी कंपनी के अपने जमाने की मशहूर हीरोइन थे। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों को नाटक की शैली पारसी थियेटर की बारीकियां सिखाने आए थे।
जैसे कोई बच्चा अपने दादाजी के पास बैठ कर मनोरंजक कहानी सुनता है। मेरे प्रश्नों के जबाब में कुछ ऐसे ही उनके मुँह से अनुभव के तपे हुए शब्द निकलते रहे ओर मैं उन्हें अपनी नोटबुक पर लिखता रहा। तीन दिन मैंने उनसे बातचीत की। मेरा उनसे पहला प्रश्न था -
कुछ अपने बारे में बताएं ? अभिनय की तरफ आपका रुझान कैसे हुआ ?
मेरा जन्म उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के काजीटोला मुहल्ले में 12 मार्च 1899 में हुआ था। आठ वर्ष की अवस्था में ही गलें में सुर पैदा हुआ। सुन सुनकर गुनगुनाने लगा। कुदरी देन से मेरी आवाज़ मीठी व मधुर थी। गाने का शौक परवान चढ़ रहा था। उन्हीं दिनों मैंने कठपुतली का तमाशा देखा जिससे मेरी रंगमंच की ओर रुचि बढ़ गई। मैं उर्स के मौके पर मजारों पर होने वाली कव्वालियों में शामिल होने लगा। घर पर कट्टर मुसलमानी माहौल था। वे सभी मेरे ऐसे शौक को हराम समझते थे। मेरी खूब पिटाई हुई मगर इससे मेरा शौक कम होने के बजाय बढ़ता चला गया। मुरादाबाद की ही रायल ड्रामेटिकल क्लब में भरती होकर मैंने तीन नाटकों में स्त्री पात्र के रोल किए। फिर घर पर हुई पिटाई और लगातार चलते विरोध के कारण मैं घर से भाग कर दिल्ली आ गया और न्यू अल्फेड कंपनी में शामिल हो गया, जिसके निर्देशक सोहराब जी ओग्रा थे। फिर तो सारे देश में घूम-घूम कर सामाजिक राष्ट्रीय नाटक किए।
क्या कारण है कि पारसी थियेटर के देखने वालों को आज भी उसकी याद ताजा है। जबकि आज की फिल्मों और नाटकों में वह बात नहीं है?
उस समय देवकी बोस, नितिन बोस, व्ही शांताराम, ए. आर. कारदार, सोहराब मोदी जैसे निर्देशक थे। और पात्र भी अपनी पूरी जान लड़ा देते थे।
आपके अपने समय के कलाकारों ओर आज जिन छात्रों को प्रशिक्षित कर रहे हैं इनमें क्या फर्क देखते हैं?
‘फर्क’ मुस्कराते हुए कहने लगे - ये शौकिया मामला है। ये अभिनय निर्देशन के क्षेत्र में शौक में भर्ती हुए हैं जबकि हमस ब रोजी रोटी के लिए इससे जुड़े थे। दूसरा विकल्प नहीं था इसलिए जी जान लगा देते थे।
आपके नाम के आगे ये ‘नरसी’ की उपाधि कैसे लगी ?
‘भगत नरसी मेहता’ सन 1942 से 1945 तक दिल्ली में लगभग तीन सौ नाइट ड्रामा हुए। जिसका उदघाटन कलाकारों के कद्रदान सर श्रीराम ने किया। 1945 में करपात्री जी ने एक महान यज्ञ का आयोजन दिल्ली में किया, जिसमें चारो धामों के शंकराचार्य पधारे। उसी में मेरे धर्मपिता गुरू पंडित राधेश्याम कथावाचक रामायणी बरेली वाले भी पधारे। वे वानप्रस्थ ले चुके थे।उन्होंने अपने गुरू मदनमोहन मालवीय से वानप्रस्थ लिया था। घर छोड़ दिया था और पुरी के शंकराचार्य के साथ रहते थे। मेरा नाटक खूब जोर शोर से चल रहा था। पुरानी दिल्ली के रामलीला मैदान के निकट बड़े-बड़े मुगलिया अंदाज़ के तंबू लगे थे। मैंने गुरूजी से प्रार्थना की कि भक्ति रस का नाटक है आप आएं,शंकराचार्यजी को भी लाएं। वे मुझे लेकर उनके पास गए और बोले-‘यह मेरा शिष्य है, धर्मपुत्र है मुसलमान है। ‘नरसी मेहता’ नाटक देखने के लिए बुलाने आया है। ’सारी बातें जानकर वे बहुत खुश हुए। बोले-‘अवश्य आएंगे।’
वे आए तो उनके साथ में स्वामी श्रद्धानन्द के पुत्र ‘अर्जुन’अखबार के संपादक इंद्र वाचस्पति भी थे। पांच घंटे के नाटक के पहले इंटरवल में जब शंकराचार्यजी को अभिनंदन के लिए मंच पर बुलाया गया तो उन्होंने नाटक में मेरे अभिनय को देखकर तारीफ के जो शब्द कहे वो मुझे आज भी याद हैं -‘भई फिदा हुसैन, हम फकीरों के पास देने को कुछ नहीं होता, तुम्हारा अभिनय बहुत सुंदर है। मैं खुश हूँ जिन भक्त नरसी का पार्ट तुमने खेला है। मैं तुम्हें वही उपाधि देता हूँ।’
मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। भला उस समय कौन राजा महाराजा था जो सम्मान आदर में उनका मुकाबला करता। हिंदुस्तान के सबसे बड़े आदमी ने जब मुझे सम्मान दिया, मैंने उसे सिर माथे लगाया। तबस मेेरे नाम के आगे ‘नरसी’ लिखा जाने लगा।
जीवन के कोई और यादगार क्षण बताएं ?
1921 में अहमदाबाद में हमारी कंपनी का पंत्रित राधेश्याम कथावाचक का लिखा नाटक परम भक्त प्रहलाद मंचित हुआ। गांधी जी के सचिव महादेव देसाई से मालिकों के अच्छे संबंध थे। कंपनी के मालिकों की प्रार्थना पर गांधीजी ने बीस मिनट का समय दिया। उन दिनों गांधीजी का सत्याग्रह चालू था। बमुश्किल एक गाना मेरे द्वारा गाया गया था जो इस प्रकार था -
व्रत भंग करेंगे नहीं दुर्वाक्य बोलकर,
सह लेंगे जु़ल्म प्रेम से छाती को खोलकर,
आगे ही बढ़ेगे, नहीं पीछे को हटेंगे,
ज़ालिम जब हम पर आएगा,तलवार खोलकर,
दूसरी घटना 1923 की है। 1916 में पंडि़त मदन मोहन मालवीय जी ने ‘वीर अभिमन्यु’नाटक का उदघाटन किया, जो दरियागेज के जगत सिनेमा हाॅल में खेला गया था। यह न्यू अल्फेड कंपनी का अपना थियेटर हाॅल था जो उसके पास बीस वर्षों तक रहा। उस समय इसका नाम ‘संगम’ था। 1923 में मालवीय जी दोबारा ‘वीर अभिमन्यु’ देखने के लिए पधारे। नाटक में मेरा पात्र अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा का था। अभिमन्यु की मृत्यु के बाद इंटरवल होने पर पंडि़त राधेश्याम कथावाचक मालवीय जी को लेकर आए। सभी कलाकारों ने उन्हें प्रणाम किया। मैं भी जब चरण स्पर्श कर जब चलने लगा तो मालवीय जी बोले - ‘राधेश्याम, इस लड़के का पार्ट मुझे अच्छा लगा। इसकी बुलंद आवाज़ और हिंदी के सही स्पष्ट उच्चारण से मैं प्रभावित हूँ।’
पंडि़त ने मुझे बुलाया और कहा -‘इसकी एक और विशेषता से आप परिचित नहीं हैं। यह मेरा शिष्य ही नहीं धर्मपुत्र भी है और यह मुसलमान है।’
यह सुनकर मालवीय जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने फिर और भी कई बातें मुझसे पूछीं। मुझे एक नया नाम प्रेमशंकर दिया। 1947 के बाद की अनेक कंपनियों के हैंडबिल में मेरा नाम ‘प्रेमशंकर ‘नरसी’ ही छपा है। जो कि अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं।
आपके समय में ही एच.एम.वी. रिकार्ड कंपनी आई। आज तो इतनी तब्दीली आ चुकी है। कुछ उस समय की यादगार बातें बताइए ?
हाँ, एच.एम.वी. के रिकार्ड पर जो सबसे पहला गाना गाया गया था वह सोहराबजी ढ़ंूढ़ी ने गाया था जिसके बोल थे -
मुन्नी मेंढ़की री, तू तो पानी में की रानी,
कौए तेरे भाई भतीजे,चील तेरी देवरानी,
बगुला तेरा सगा देवर,मुर्गी तेरी नानी,
मुन्नी मेंढ़की री...
यह गाना उस समय भारत वर्मा, श्रीलंका में बेहद लोकप्रिय हुआ था। यह स्थान वायसराय के अधिकार क्षेत्र में थे और यहां जाने के लिए पासपोर्ट बनवाने की जरूरत नहीं थी। इसके बाद तो जानकीबाई छप्पनछुरी इलाहाबाद वाली,जोहराबाई अंबालेवाली, बहुत सारे लोगों के गाने रिकार्ड करवाए गए। जोहरा के एक गाने के तो तीन लाख रिकार्ड बिके। जोकि उस जमाने में रिकार्ड था। गाना इस प्रकार था - ‘छोटे से बलमा मोरे आंगना में गिल्ली खेलें....इससे कंपनी मालामाल हो गई। उसने जोहराबाई अंबालेवाली को एक पोर्टेबल मशीन और सोने का मैडल मिला। एक सोने का मैडल मुझे भी मिला था। 1932 में दाग की एक ग़ज़ल मैंने रिकार्ड कराई। बोल थे -
ये सुन-सुन के मरना पड़ा हर किसी को,
नहीं मरते देखा किसी पर किसी को,
इस ग़ज़ल में मेरे रुक रुक कर गाए अंदाज़ की नकल बाद में कव्वालियों में होने लगी। ये गाने सिंध पंजाब में बहुत सुने जाते थे और बेहद मकबूल हुए।
राधेश्याम रामायण के ‘केवट संवाद’ वाला प्रसंग - तुम केवल हो भवसागर के फिर क्या लेना और क्या देना...
यह पूरे छंद एक ही रिकार्ड की दोनों साइड़ों में एच.एम.वी. में मैंने ही भरा। सन 1936 में मेरा रिकार्ड भारतवर्ष में ही नहीं वर्मा ,श्रीलंका, मारीशस,नेपाल आदि कई देशों में खूब चला और खूब बिका। सन 1940 में ग़ज़ल की रिर्कािडग के समय जो पेमेंट अस्सी रुपया तय था वही मिला लेकिन 1942 में रामायण के केवट संवाद के समय तक गायक लेखक संगीतकार तीनों की रायल्टी मुकर्रर यानी तय हो चुकी थी। इसकी रायल्टी उस समय गायक के पांच रुपए लेखक और संगीतकार के ढ़ाई ढ़ाई रुपए थे। मुझे इस रिकार्ड की रायल्टी के आठ हजार रुपए मिले। उन दिनों एक समय रिकाडों की बिक्री के आधार पर मेरा नाम के.सी. डे के बाद दूसरे नंबर पर आ गया ा के.सी.डे प्रसिद्ध गायक मन्ना डे सगे चाचा थे। मुझे अपने गानों के म्यूजिक साज को खुद चयन करने का अधिकार मिल गया था।
पारसी थियेटर के कलाकारों के पं्रति दर्शकों का क्या रवैया होता था ?
जनता नाटकों की शौकीन थी परतु कलाकारों को अच्छी नज़र से नहीं देखती थी।
उस समय के नाटकों के देखने वालों और आज के दर्शकों में क्या फर्क महसूस करते हैं?
स्मय के साथ साथ माहौल बदल रहे हैं बदलते रहेंगे। नई नई चीजें भी आती रहेंगी। दर्शकों की रुचि जिस ओर होगी। वह उन्नति करेगी। जो चीजें समय के साथ नहीं चलतीं उन्हें नष्ट हो जाना पड़ता है।
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