ईश्वरी कवि
(संवत -अज्ञात)
(संवत -अज्ञात)
सूनो घर पायो दौरि आई लहकान लगी,
पायो लै भाजि गई फेरि न दिखाती हो,
औती घरु फांदि तुम डराती हौ नेक नहिं,
खावौ फैलावौ भड़फोरु कर जाती हो,
पायो लै भाजि गई फेरि न दिखाती हो,
औती घरु फांदि तुम डराती हौ नेक नहिं,
खावौ फैलावौ भड़फोरु कर जाती हो,
कहत कवि गोपी बिन छेड़े न छेड़ी कोई,
लट्ठ लै खीसैं काढ़ि बहुत ही खिसियाती हो,
ऐसो घर ध्यान कवि कहत राय ईश्वरी,
एक दाँय काट चुकी फेरि गुर्राती हो,
ऐसो घर ध्यान कवि कहत राय ईश्वरी,
एक दाँय काट चुकी फेरि गुर्राती हो,
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