औरत ने जनम दिया मर्दों को...
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साहिर लुधियानवी एक ऐसे शायर रहे हैं जिनकी शायरी का केंद्र बिन्दु नारी रही। नारी जीवन के विविध रूपों का जैसा वर्णन उन्होंने किया वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।
नारी के बेटी, बहन, माँ दोस्त और प्रेयसी रूपों का जैसा उल्लेख उनके रचना संसार में देखने को मिलता है वह ह्रदयस्पर्शी है।
वे आजीवन अविवाहित रहे पर भला उनकी इन रचनाओं को पढ़ सुन कर कौन ऐसा कह सकता है-
@ मेरे घर आई एक नन्हीं परी...
@ बाबुल की दुआएं लेती जा...
@ मेरे भइया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन...
@ मेरे भइया को संदेशा पहुँचाना...
@ चंदा रे मेरे भइया से कहना...
@ चलो इक बार फिर से अजनबी...
@ तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने...
उनका जन्म 8 मार्च 1921 में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था. 8 मार्च को अब दुनिया 'महिला दिवस' के रूप में मनाती है. औरत के अधिकारों के पक्ष में साहिर ने अपनी कलम खूब चलाई.
@ लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं...
@ इतनी नाज़ुक न बनो...
@ ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के...
उनकी नज़्म 'औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया..' की प्रासंगिकता आज बढ़ गई है. साहिर अगर आज जिंदा होते, तो 98 वर्ष के होते, उन्हें याद करते हुए पढ़िए और सुनिए उनकी मशहूर नज़्म...
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में,
बिकती है कहीं बाजारों में
नंगी नचवाई जाती है,
ऐय्याशों के दरबारों में
ये वो बेइज्जत चीज है जो,
बंट जाती है इज्जतदारों में
मर्दों के लिये हर जुल्म रवां,
औरत के लिये रोना भी खता
मर्दों के लिये लाखों सेजें,
औरत के लिये बस एक चिता
मर्दों के लिये हर ऐश का हक,
औरत के लिये जीना भी सजा
जिन होठों ने इनको प्यार किया,
उन होठों का व्यापार किया
जिस कोख में इनका जिस्म ढला,
उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोपल बन कर,
उस तन को जलील-ओ-खार किया
मर्दों ने बनायी जो रस्में,
उनको हक का फरमान कहा
औरत के जिन्दा जल जाने को,
कुर्बानी और बलिदान कहा
किस्मत के बदले रोटी दी,
उसको भी एहसान कहा
संसार की हर एक बेशर्मी,
गुर्बत की गोद में पलती है
चकलों में ही आ के रुकती है,
फाकों में जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर,
औरत के पाप में ढलती है
औरत संसार की किस्मत है,
फिर भी तकदीर की हेटी है
अवतार पैगंबर जनती है,
फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बदकिस्मत मां है जो,
बेटों की सेज पे लेटी है,
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया...