जैसी तुम कहते थे साथी ,वो आजादी कहाँ मिली
जन गण के मन की अभिलाषा,जाकर आखिर कहाँ फली,
आज द्रोपदी नग्न हो रहीं , भीड़ भरे चौराहों पर,
तोड़ें जंघा दुर्योधन की ,कहाँ भीम से महा बली,
बीते दशक मगर अबतक,जंजीर होंठ पर भाषा की,
राष्ट्र अभी तक मूक, राष्ट्र को अपनी वाणी कहाँ मिली
मेहनत अगर बराबर तो,मेहनत का दाम बराबर हो,
अधिकारों का यह बँटवारा,जहाँ मिले वह कौन गली,
रावन तो मारा हमने पर,लौट के घर में हार गए,
एक बार दुखिहारी सीता,फिर अपनों से गयी छली,
उन राहों का देख हश्र,हम उनपर ही बढ़ते जाते,
अहम प्रश्न है,आज ये सोचें,क्या शिक्षा का अर्थ यही,
जन गण के मन की अभिलाषा,जाकर आखिर कहाँ फली,
आज द्रोपदी नग्न हो रहीं , भीड़ भरे चौराहों पर,
तोड़ें जंघा दुर्योधन की ,कहाँ भीम से महा बली,
बीते दशक मगर अबतक,जंजीर होंठ पर भाषा की,
राष्ट्र अभी तक मूक, राष्ट्र को अपनी वाणी कहाँ मिली
मेहनत अगर बराबर तो,मेहनत का दाम बराबर हो,
अधिकारों का यह बँटवारा,जहाँ मिले वह कौन गली,
रावन तो मारा हमने पर,लौट के घर में हार गए,
एक बार दुखिहारी सीता,फिर अपनों से गयी छली,
उन राहों का देख हश्र,हम उनपर ही बढ़ते जाते,
अहम प्रश्न है,आज ये सोचें,क्या शिक्षा का अर्थ यही,
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