Tuesday, 24 March 2015



राह रोक राधा कहती राजू से,
सुन ओ भइया,
नहीं दिखाई देती अपने आँगन,
अब गौरैया,

खिडकी रोशनदान बंद हैं ,
मिलता नहीं ठिकाना,
लाला की दूकान बंद है,
नहीं मिल रहा दाना,

जो तरंग मोबाइल वाली,
सबको राह दिखाए,
लेकिन बेचारी चिडिया को,
राहों से भटकाए,

इस तरंग से उसकी ,
प्रजनन क्षमता भी घट जाए,
बीज घास के रहे नहीं,
तो गौरैया क्या खाए,

ऊँची ऊँची बिल्डिंग में जब,
बस जाए आबादी,
घर में कैसे पहुँचे चिडिया,
शहर छोड कर भागी,

सुनो बहन हम सब मिलजुल कर,
यही कसम अब खाएं,
रूठी अतिथि देव गौरैया,
को मिल आज मनाएं,

Saturday, 21 March 2015

आसमान से आशीषों की बारिश बरसी,
नया साल है,

मन में उमंगों की नव बेलें सर सर सरसीं,
नया साल है,


कितनी सारी उम्मीदों को लेकर आया,
नया सवेरा,


भूलें सारे ग़म, खुशियों के दीप सजाएं,
नया साल है,
नए साल में बारिश आई,
सबने मिलजुल खुशी मनाई,

लेकिन एक मुसीबत आई,
जूली छ: बच्चों से ब्याई,

मौसम की क्या मार सहेगी,
ये कुतिया अब कहाँ रहेगी ?

इसको हम राहत दिलवाएं,
मिलकर इसका घर बनवाएं,

बैजनाथ खुरपी ले आया,
अभय तोड़कर डाली लाया,

मिलकर गड्ढा एक बनाया,
उसमें गद्दा एक बिछाया,

अंकल ने बोरी मँगवाईं,
आँटी रोटी लेकर आईं

छायादार बचे पानी से,
बच्चे हों जिसमें रानी से,

ऐसा ही घर प्यारा - प्यारा,
बने एकदम न्यारा - न्यारा,

मेहनत करने से सँवरेगी,
उसकी रात यहाँ गुजरेगी,
हम हैं वृक्षमित्र, इन वृक्षों के,
हम सब हैं साथी,
खेलेंगे कूदेंगे मिलकर,
इनके संग संगाती,

जब तक यहाँ रहेंगे,
प्यासे होंगे पानी देंगे,
धूप जलाएगी जब हमको,
तब ये छाया देंगे,

इक दूजे के लिए जिएं हम,
यही मित्रता होती,
मित्र दुखी हो हम मुँह फेरें,
तभी मित्रता रोती,

आज यहाँ हम मित्र बने हैं,
चित्र बना है साखी,
माटी जैसा साथ हमारा,
मित्र नहीं ज्यों पाखी,
नई उमंगें नई तरंगें ,
हाल नया है चाल नई,

नया वर्ष है नया हर्ष है ,
नया गीत सुर ताल नई,

नया जमाना नया तराना,
नया विजन है, सोच नई,

नया जोश है, नया होश है,
नव ऊर्जा, स्फूर्ति नई,

नई जवानी नई कहानी,
लिक्खेगी तकदीर नई,

हाथ बढ़ेगा, साथ मिलेगा,
बनेगी इक तस्वीर नई,

नया वेष हो, नया देश हो,
नवयुग की चेतना नई,

सभी सुखी हों,सभी निरोगी,
करते हैं प्रार्थना यही
एक नया उत्साह लिए हम,
आगे बढ़ते जाएं,
लगे रहेंगे लगातार,
मंज़िल को अपनी पाएं,
मन में नई उमंग,
बदन में गर्म रक्त लहराए,
हो हिम्मत तो बाधा कोई,
जरा सामने आए,

Friday, 20 March 2015

कल पुस्तक मेले में हम थे,
पुस्तक थीं और बच्चे थे,

दोस्त दोस्तों के संग संग थे,
वे क्षण कितने अच्छे थे,

वादा है यह अपना खुद से,
आगे भी हम संग रहें,

मजे करें, बातें आपस में,
मिलें जुलें ना बंद रहें,

पढने का आनंद भला,
ना पढने वाले क्या जाने,

जिनका दिल खुश हुआ,
वही मोल वो इनका पहचाने,
ये वतन तेरी मेरी नस्ल की जागीर नहीं,
सैकड़ों नस्लों की मेहनत ने संवारा है इसे,
..पटरियां रेल की, सडकों की बसें, फोन के तार,
तेरी और मेरी खताओं की सजा क्यों भुगतें,
उनपे क्यों जुल्म हो जिनकी कोई तकसीर नहीं,
ये वतन तेरी मेरी नस्ल की जागीर नहीं,
सैकडों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे,
साहिर
तकसीर - दोष