Wednesday, 14 October 2015



बहुत वीराना है, फिर भी खड़ा हूँ,
कोई दीवाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
किसी का गीत हूँ न रुबाई, एक-
भूला फसाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कभी सरसब्ज़ छायादार था,आज-
लुटा खज़ाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
हवा थी तेज, पानी भी नहीं था,
गुजर जाना है, फिर भी खड़ा हूँ,
खेत हो या सोना हो,
प्यार या कि अंतर्मन,
ये तभी निखरते हैं,
जबकि पाएं,जल यारो,
होंठ सूखते से हैं,
दिल का साज़ मद्धम हैं,
हम भी लिख के देखेंगे,
इक नई ग़ज़ल यारो,
तुम ही तो सुझाते हो,
रास्ते नए हमको,
और तुम्हीं नहीं करते,
उनपे हो अमल यारो,
बन सकी इमारत ना,
नींव ही रख दें वरना,
उँगलियाँ उठाए ना,
कोई हमपे कल यारो,
जब भी उनको देखा है,
याद हमको आया है,
वो खिला खिला चेहरा,
जैसे हो कमल यारो,

Thursday, 8 October 2015

कैसा है भारतीय भाषाओं का बाल साहित्य
मित्रो,
हमारा देश आर्थिक भौगोलिक सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है। अगर आप गहराई में जाएंगे तो हैरान रह जाएंगे कि कैसे इतनी सारी विविधताओं के बावजूद कोई ऐसा अंतर्सूत्र है जो हमें एक डोर में बाँधे हुए है। भाषा और बोली की विविधता को लेकर तो एक लोकोक्ति ही हमारे यहाँ प्रचलन में रही है। ‘कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी’ यद्यपि यह चार कोस का आंकड़ा औसत में है। इससे पहले भी बदलाव का साक्षी मैं स्वयं हूँ।
इस विशाल देश में सैकड़ों बोलियाँ बिखरी हुईं हैं और उनमें बिखरा हुआ है अलिखित बाल साहित्य। सोचकर हैरत होती है कि सुदूर नागालैंड,मिजोरम ,मेघालय के कबीलों से लेकर ंिहंद महासागर में स्थित दमन, दीव तक कितना बड़ा फलक है हमारे बाल साहित्य का पर कभी इसको लेकर जानने परिचय पाने को लेकर हम सब कितने उदासीन हैं। ऐसा लगता है कि वे हमारी समृद्ध विरासत का हिस्सा न होकर किसी और देश में स्थित हैं। उदासीनता का आलम यह है कि आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद आज भी राष्ट्रीय स्तर पर कोई ‘समकालीन भारतीय बाल साहित्य’ जैसी बाल पत्रिका नहीं है जिसके माध्यम से हम इन सब बोलियों में बिखरे बाल साहित्य की तो बात ही छोड़ दें संविधान स्वीकृत भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य को भी किसी एक स्थान पर देख पढ़ सकें।
भारतीय साहित्य की राष्ट्रीय संस्था साहित्य अकादमी ने देश आजाद होने के 60 वर्षों बाद पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2010 से बाल साहित्य में पुरस्कार देने की शुरुआत की। ‘समकालीन भारतीय बाल साहित्य’ जैसी पत्रिका के लिए हमें अभी कितनी प्रतीक्षा करनी पडेगी कह नहीं सकते।
मित्रो, यहाँ हम इन भाषाओं के बाल साहित्य का लंबा चैड़ा इतिहास बताकर आपको दुखी नहीं करेंगे बल्कि इस भाषाओं में से कुछ भाषाओं में प्रकाशित अनेक पुस्तकों में से कुछ पुस्तकों की थीम और अन्य जानकारियाँ साझा करेंगे। जिसके माध्यम से हमें पता चल सके कि हमारे देश के इन भाषाओं के बच्चे आखिर पढ़ क्या रहे हैं।
हम शुरुआत अगर उत्तर पूर्व की भाषा असमी से करें तो हम पाते हैं कि यहाँ का बाल साहित्य काफी समृद्ध है।
यहाँ की लोककथाओं से परिचय कराती एक पुस्तक है,‘बुड़ही और साधू’ असमिया साहित्य के प्रसिद्ध लेखक लक्ष्मीनाथ बेजवरुआ ने लिखा है इसे। ये असम के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित वे कहानियाँ हैं जो वर्षों से दादी नानी सुनाया करती रहीं हैं। उनके उसी सुनाने वाले अंदाज़ में इन्हें उनसे सुनकर लिखा गया है।116 पेज की इस पुस्तक की कीमत है मात्र 25 रुपए 12से 14 बर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए लिखी गई इस किताब का चित्रांकन किया है अरुननाथ ने और प्रकाशित किया है ज्योति प्रकाशन गौहाटी ने। लोक कथाओं की ‘काकादेवता अरु नाटिलारा’ पुस्तक पेज 140 मूल्य 25 रुपए भी इन्हीं की है।
रंजू हजारिका ने समग्र भारतीय बाल साहित्य के खजाने से असम के बच्चों को परिचित कराया है।‘कथा सरित सागरर साधू’ व ‘वाटरिश सिंहासन’ जैसी पुस्तकें उन्होंने लिखीं। बुद्धिमान और शक्तिशाली सम्राट विक्रमादित्य से परिचय करातीं ये कहानियाँ इस प्रदेश के बच्चों को प्राचीन भारत के जीवन दर्शन से जोड़तीं हैं।
इसी तरह अरुंधती राजखोवा सैकिया द्वारा लिखी पुस्तक ‘गोपाल भांड’ राजा कृष्ण चंद्र के मशहूर दरबारी विदूषक थे। इनकी छोटी छोटी कहानियाँ हैं जो हास्य के माध्यम से सामाजिकता का संदेश देतीं हैं। 139 पेज की यह पुस्तक साठ रुपए की है और इसे बनी मंदिर गौहाटी ने छापा है।
वीरेंद्रनाथ सैकिया असमी साहित्य का एक जाना माना नाम हैं। ‘मोर शोइशव मोर कैशोर’ पुस्तक में वे अपने बचपन की घटनाओं का वर्णन करते हैं जिन स्थानों पर वे रहे जिन लोगों से मिले। वे अध्यापक और सांस्कृतिक घटनाएं जिनके वे साक्षी रहे, इस पुस्तक की विषय वस्तु हैं।
कहानियों की किताबों में ‘आइर मुखर साधू’ नवीन चैधरी की पुस्तक जिसमें असम के पश्चिमी कामरूप व दरंग इलाके में प्रचलित मनमोहक लोककथाओं का संग्रह है।
‘आहेजार इता साधू’ नावा कलिता और निवेदिता बोरा द्वारा संपादित 300 पेज की पुस्तक हैं जिसमें असम के परंपरागत जीवन से परिचय कराती कहानियों का संग्रह है। इसमें कुछ गंभीर ,कुछ हँसी मजाक की कुछ दिल को छू लेने वाली प्रेरणादायी कहानियाँ हैं।
‘अखनीर पृथ्वीत’ पुस्तक में चंदना कलिता ने किशोर मन की संवेदनाओं को छूती हुई अपने बचपन की कहानियों को लिखा हैं।
‘देश विदेशेर शिशु गल्प संग्रह’ पुस्तक लख्याहीरा दास द्वारा लिखित है। जिसमें नाइजीरिया, मंगोलिया, तिब्बत, ग्रीस और जर्मनी की लोककथाओं को असमी में संग्रहीत किया गया है। जो बच्चों को सोचने, हँसने, आश्चर्यचकित होने पर मजबूर कर देतीं हैं।ज्यादातर कहानियाँ सहज रूप से आपकी बुद्धि के छिपे हुए दरवाजों को खोल देतीं हैं।
‘परबतिया साधू’ रमादास द्वारा लिखी गईं ऐसी लोककथाओं का संग्रह है जो नागा, मणिपुरी, बोडो, करबी, लखेर, सेमा, खासी, जयंतिया, गारो और अंगमी कबीलों में प्रचलित हैं। इस पुस्तक में चित्रांकन पिंकू का है जो कहीं कहीं बेहद आकर्षक है। नयनतारा प्रकाशन गौहाटी ने इसे छापा है और कीमत है 25 रुपए।
‘पिंग किफ्रू’ अचिन मोमाइयो द्वारा किया गया ऐसी पाँच कहानियों का संग्रह है जो ग्रामीण क्षेत्रों में किस्सैतों द्वारा कही जातीं हैं। इसके पात्र व चरित्र असम के हर घर में जाने जाते हैं।
‘साहा अरु काचार दौर’ किरन टाॅलमी ने लिखी है।इसमें कछुए और खरगोश में फिर से एक बार दौड़ होती है। जंगल के सारे जानवर इस बार खरगोश को जिताने में लग जाते हें मगर कछुआ इससे परेशान नहीं होता और अपनी लगन से वह यह दौड़ एक बार फिर जीत जाता है।
‘शंखचोर’ एक बेसहारा बुढ़िया और नन्हीं बच्ची की कहानी है। इसमें असम के जन जातीय जीवन की झलक मिलती है। इसे दीना तामुली ने लिखा है।
‘तिखार अरु चटुबी’ दो अनाथ भाई बहन की संवेदनशील कहानी है जिसमें तिखार अपनी बड़ी बहन की सारी परेशानियों को अपने परिश्रम लगन के बल पर दूर करता है उसकी जरूरतों को पूरा करता है।
‘अविष्करोर साधना’ जयंती छुटिया की एक ऐसी पुस्तक है जिसमें पाँच नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के बारे में व उनके प्रयासों की जानकारी रोचक तरीके से दी गई है। यह पुस्तक विज्ञान की नई खोजों में बच्चों की रुचि को व उनके ज्ञान को बढ़ाती है।
इसी तरह ‘एटम बाम्बर कहानी’ नामक पुस्तक विमलनाथ द्वारा लिखित दिगंता मजूमदार के चित्रांकन से सजी 64 पेज की है। जिसमें मानवता के विकास की अब तक की महत्वपूर्ण खोज एटम बम, की संक्षिप्त जानकारी कहानी में पिरो कर दी है। राजनीतिक व वैज्ञानिक तल पर समझाने वाली यह पुस्तक असमिया साहित्य में अनूठी है।
‘कोने केतिया कोत केनेकोई की अबिष्कार कोरीचिल’ संतेनु कौसिक बरुआ द्वारा लिखित मंजीत राज खोवा के चित्रांकन से सजी इस पुस्तक में दैनिक जीवन में प्रयुक्त विज्ञान की वस्तुओं की खोज कैसे हुई इनकी रोचक जानकारी देती है। उस खोज के पीछे छिपे दर्द और खुशी को बयान करती यह पुस्तक असमिया बाल विज्ञान साहित्य की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।
‘स्ंाधान’ बंदिता फूकन द्वारा लिखित एक रोचक विज्ञान कथा है जिसमें नासा के एक खगोल वैज्ञानिक द्वारा पृथ्वी से सात प्रकाश वर्ष दूर एक ऐसे ग्रह की खोज कर ली जाती है जिसमें मानव अस्तित्व विद्यमान है। कुछ लोगों का समूह वहाँ मानव बस्ती बसाने की योजना बनाते हैं। पल पल रोमांचित करती यह कहानी बच्चों को अखिल ब्रहमांड में रुचि के लिए प्रेरित करती है।
‘शताधिक महान विज्ञानी’ पुस्तक में असम के विख्यात विज्ञान कथा लेखक दिनेशचंद्र गोस्वामी ने सरल सहज भाषा में मानवता के विकास में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सौ वैज्ञानिकों के जीवन परिचय व उनके महान कार्यों का वर्णन किया है।
इसी तरह इनकी एक पुस्तक ‘बिज्ञानानार बिनिंदिया जगत’ उनके विज्ञान के लोकप्रिय लेखों का संकलन है। जिसमें ब्रहमांड, पोषकता और बीमारियों तथा अन्य क्षेत्रों की छोटी - छोटी जानकारियाँ हैं जो बच्चों के लिए बेहद उपयोगी हैं।
‘पृथिवीर साधू’ हरिप्रिया वासकियल वोरगोहिन द्वारा लिखी ऐसी कहानियाँ हैं जिनमें उन कारणों की पड़ताल है जिनके कारण बच्चे समाज की मुख्यधारा से दूर हो जाते हंै। यह कहानी संग्रह सारी दुनिया के बच्चों को उस स्थिति में सही कदम उठाने के लिए प्रेरित करता है जब किशोरावस्था की इच्छाएं उनमें जन्म लेतीं हैं।
इसी तरह से ‘मिचात आस बनात बास’ अर्पन दत्ता की एक ऐसी पुस्तक है जो ऐसी समस्याओं के समाधान बताती है जिनसे असम के बच्चे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में दो चार होते हैं। यह कहानियाँ असम के एक लोकप्रिय समाचारपत्र में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं हैं।
इसी तरह बंदिता फूकन का बाल उपन्यास ‘अपत्य’ है जो पाक्षिक रूप में असम में धारावाहिक की तरह छपता रहा जिसमें एक किशोर के उस अंतद्र्वंद्व को दर्शाया गया है जो उसके नए पिता के साथ में रहने से पैदा होता है।
‘बनत रंगर मेला’ संतनो तोमुली की पुस्तक है जिसमें प्रकृति और मानव के आंतरिक संबंधों को दर्शाया गया है। सुबह जागने के साथ ही हमारा प्रकृति से साहचर्य शुरू हो जाता है। इसे सुंदर ढ़ंग से पुस्तक में समझाया गया है।
‘बंदर काकार सफर’ पुस्तक में लेखक जीवनदास, बुुजुर्ग बंदर के माध्यम से असम को प्रकृति से मिली अनमोल धरोहर के उजड़ने की कहानी और उससे जानवरों को होने वाली परेशानी को सुंदर कहानी की शक्ल में बताते हंै।
‘ईसू’ मणिकुंतला भट्टाचार्य का एक रोचक बाल उपन्यास है। इसका चित्रांकन अमृत भरद्वाज ने किया है। जिसमें ईशू नाम के एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसे अपने गाँव के आस पास घूमना, जानवरों के साथ खेलना और अनजानी जगहों पर जाना बहुत पसंद है। ऐसे में वह भूतों के चंगुल में फंस जाता है मगर वह घोर मुसीबत में भी झूठ नहीं बोलता। रहस्य रोमांच से भरी यह पुस्तक अंत तक पढ़ने वाले को बांधे रखती है।
‘इखान सरकस अहिसिल’ बंदिता फूकन का जंगल के जानवरों को लेकर बाल उपन्यास है जिसमें जीवन अपने हर रंग में मौजूद है।
‘पानबारी गउत इदिन’ खगेंद्रनाथ बोरा का बाल उपन्यास हे जिसमें एक दयालु अंकल बच्चों के एक दल के साथ जंगल में शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं। वहाँ वे मनुष्य और जानवरों के अंतद्र्वंद्व के साक्षी बनते हैं।
आर जी पब्लिकेशन गौहाटी द्वारा प्रकाशित जुगलोचन दास द्वारा लिखित पुस्तक ‘काजीरंघट अंकू डंकू‘ काजीरंगा अभ्यारण्य के एक लड़के डिंकू की कहानी है। यह पुस्तक हँसाती है, चकित करती है और पढ़ने को मजबूर करती है।
‘गणित अरु सभ्यता’ देश के विख्यात गणितज्ञ बिजय कृष्णदेव शर्मा द्वारा लिखी गई है। इसमें गणित के जन्म, इसके इतिहास मूल्यांकन और विकास की कहानी सरल सहज भाषा में बताई है। जो बच्चों को गणित में रुचि लेने के लिए प्रेरित करती है। चित्रांकन विपुलकुमार दास का है।
‘डिहिगे डिपांगे भूपेन मामा’ दीपिका चैधरी की पुस्तक है जिसका चित्रांकन दादुल चैलिहा ने किया है। यह पुस्तक भूपेन हाजारिका के बहुआयामी व्यक्तित्व से परिचय कराती है। वे कवि, संगीत निर्देशक, गायक, लेखक, फिल्मकार थे। उनका जीवन बच्चों के लिए प्रेरणा पुंज है।
‘किशोर एक्सराथी’ होमेन वोरगोहेन की पुस्तक है जो असम में पठन संस्कृति को बढ़ावा देने वाले आंदोलनकारी हैं। असमिया साहित्य को बच्चों तक पहुँचाने के लिए समय समय पर लिखे गए लेखों का संकलन है यह महत्वपूर्ण पुस्तक।
‘मुमैर पाडुली’ ओचिन मोमाइयो द्वारा लिखी गई है। वे असम के लोकप्रिय साहित्यकार हैं। इसमें उन्होंने बच्चों के लिए छोटे छोटे निबंध और पत्र लिखे हैं। जिसके माध्यम से वे उन्हें इतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति, पर्यावरण और हमारे समाज के गुमनाम नायकों के बारे मे जानकारी देते हैं।
नाटकों में ‘शिशु नाटक 7’ पुस्तक असम प्रिंटर्स गौहाटी द्वारा प्रकाशित है जिसमें आतंकवाद, जंगल उजड़ने, ग्लोबल वार्मिग, तथा अंतरिक्ष विज्ञान जैसे विषयों पर असमिया नाटक साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर नरेन पेटगिरि के नाटकों का संकलन है।
‘शिशु नाटक संभार’ हरिकेश गोस्वामी की संपादित पुस्तक है जिसमें असम के 29 महत्वपूर्ण नाटककारों के लोकप्रिय नाटकों का संकलन है।
‘रौ रौ धेमाली’ हीरेन भट्टाचार्य की कविताओं का संकलन है। हीरेन ने कुछ भूले हुए शब्द असमी भाषा से दिए हैं। चित्रांकन रोबिन बरुआ का है जो बहुत अच्छा है।
‘अकौधिमली’ हीरेन भट्टाचार्य द्वारा संपादित एक अन्य काव्य संकलन है जिसमें विश्व की इतिहास की मुख्य घटनाओं को अलग अलग कवियों द्वारा लिखा गया है। वेनू मिश्रा का इसमें सुंदर चित्रांकन है।
असमिया में स्त्रियों द्वारा लिखे बाल साहित्य का एक संग्रह ‘बिंग्शा सतीकार लेखीकार शिशु साहित्य संभार’ नाम से वनलता प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है।
इन सब के अतिरिक्त बड़ी संख्या में बाल साहित्य समग्र के रूप में भी प्रकाशित हुआ है। जिनमें मुख्य रूप से ‘डा भावेंद्र नाथ सैकियार शिशु साहित्य संग्रह’, ज्योतिप्रसाद रचनावली’, त्रिदेव मोहंता रचनावली’, नवकांत बरुआ शिशु साहित्य समग्र’, ‘पूरनचंद गोस्वामी शिशु लेखा मलांच’ साहित्याचार्य अतुलचंद्र हाजारिका शिशु साहित्य संभार’, जैसे अनेक संग्रह प्रकाशित हुए है।
इस तरह हम पाते हैं कि देश के पूर्वोत्तर राज्य की एक महत्वपूर्ण भाषा के बच्चे वह सभी कुछ पा रहे हैं जो आवश्यक है यहाँ परंपरागत रूप से कहानी कविता उपन्यास नाटक तो हैं ही। इनमें विषयों की विविधता भी है। गणित, विज्ञान, पर्यावरण, खगोल जैसे विषय भी है। जहाँ तक थीम की बात करें हमें इसमें भी विविधता नजर आती है।
तमाम दिन के सफर पर, निकल रहा सूरज,
लगन की आग है सीने में, जल रहा सूरज,
पहाड़ पेड़ को, दरिया को, पार कर लेगा,
खुला है आसमान और चल रहा सूरज,
तमाम शब यहाँ मनमानी की अँधेरों ने ,
निकलना ही था उसे औ' निकल रहा सूरज,
सफर तो सफर है गर्दोगुबार होगा ही,
नदी के जल में बदन अपना मल रहा सूरज,
समय बदलता है तो लोग बदल जाते हैं,
मगर है वैसा ही वो, जैसा कल रहा सूरज,
सफर ये कैसा है, जो खत्म ही नहीं होता,
भरी है आग वो,सदियों से जल रहा सूरज,
ज्योति कलश छलके
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ज्योति कलश छलके
हुये गुलाबी, लाल सुनहरे,
रंग दल बादल के
ज्योति कलश छलके
घर आँगन वन उपवन उपवन
करती ज्योति अमृत के सिंचन
मंगल घट ढलके,
ज्योति कलश छलके
पात पात बिरवा हरियाला
धरती का मुख हुआ उजाला
सच सपनें कल के,
ज्योति कलश छलके
उषा ने आँचल फैलाया
फैली सुख की शीतल छाया
नीचे आँचल के,
ज्योति कलश छलके
ज्योति यशोदा धरती गैय्या
नील गगन गोपाल कन्हैय्या
श्यामल छवि झलके,
ज्योति कलश छलके
आस का विश्वास का आया सवेरा,
जो करेगा दूर जीवन का अँधेरा,
इक नए उत्साह का सूरज उगा है,
चल पड़ेगा रथ बहुत दिन से रुका है,
क्षितिज के द्वारे से झुककर झाँकती किरनें,
रंग बिखराकर हमारा मन लगी हरने,
जाग जाएं जब तभी समझो सवेरा,
ग़म न कर ग़र राह में है तम घनेेरा,
चल रहा जीवन हमारा, चल रहे हम,
रुक गए ये कारवाँ सब, जाएगा थम,
मीलों चलना बाकी है,
आती अब तैराकी है,
नहीं देखना इधर उधर,
रखनी आँखें मंज़िल पर,
करने हैं बहुतेरे काम,
जय जवान जय किसान,
लक्ष्य सामने,चलना है,
दीपक जैसा बलना है,
आगे बढ़कर जब देखा,
अँधियारा तो छलना है,
नन्हे हों पर बने महान,
जय जवान जय किसान,
प्यारा लगता गीत वही,
मन चाहे मनमीत वही,
अगर सोच लो तो लगती,
शीत ऋतु में शीत नहीं,
मन आत्मा मन ही भगवान,
जय जवान जय किसान,
मन में सबके रावण राम,
जय जवान जय किसान,
(एक बच्चे की माँ से शिकायत)
क्या मैं तेरा बच्चा नईं...
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कहना तेरा मानूँ मैं,
अपना तुझको जानूँ मैं,
जो कहती वो करता हूँ,
कितना तुझसे डरता हूँ,
फिर भी मेरी परवा नईं,
क्या मैं तेरा बच्चा नईं,
जल्द सुबह  उठ जाता हूँ,
नियमित पढ़ने जाता हूँ,
जब कहती हो तब खेलूँ,
वरना मुन्नी को ले लूँ,
मुझे उठाकर खुद सो गईं,
क्या मैं तेरा बच्चा नईं,
नींद आ रही कुछ सो लूँ,
दोस्त गए, मै भी खेलूँ,
टी.वी. देखूँ ,मन करता,
लेकिन कहने से डरता,
जब पूछूँ तो कहतीं -'नईं',
क्या मैं तेरा बच्चा नईं...