Thursday, 8 October 2015

तमाम दिन के सफर पर, निकल रहा सूरज,
लगन की आग है सीने में, जल रहा सूरज,
पहाड़ पेड़ को, दरिया को, पार कर लेगा,
खुला है आसमान और चल रहा सूरज,
तमाम शब यहाँ मनमानी की अँधेरों ने ,
निकलना ही था उसे औ' निकल रहा सूरज,
सफर तो सफर है गर्दोगुबार होगा ही,
नदी के जल में बदन अपना मल रहा सूरज,
समय बदलता है तो लोग बदल जाते हैं,
मगर है वैसा ही वो, जैसा कल रहा सूरज,
सफर ये कैसा है, जो खत्म ही नहीं होता,
भरी है आग वो,सदियों से जल रहा सूरज,

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