Saturday, 2 September 2017

बस में बैठे चले घूमने,
मस्ती में भाई,
पीछे वालो भी बैठो,
करना मत लड़ाई,
कभी-कभी ऐसे भी मौके ,
मिल जाते हमको,
तीखी फीकी खट्टी मीठी,
अपनी पढ़ाई,
महक मिट्टी की जिस दम,
ज़ेहन को पागल बनाती है,
नहीं रुक सकता बेटा,
माँ उसे मन से बुलाती है,
एक गांव में एक महिला का पति शहर में नौकरी करता था|
काफी दिनों तक जब वो नहीं आया तो महिला ने सोचा कि एक चिट्ठी लिखनी चाहिए, लेकिन उस महिला को यह पता नहीं था कि पूर्ण विराम कहां लगाते हैं और उसने जहां मन आया पूर्ण विराम लगा दिए|
उसने चिट्ठी कुछ इस प्रकार लिखी...

मेरे प्यारे जीवनसाथी..
मेरा प्रणाम आपके चरणों में| आप ने अभी तक चिट्ठी नहीं लिखी मेरी सहेली को| नौकरी मिल गई है हमारी बकरी ने| बछड़ा दिया है दादाजी ने| शराब शुरू कर दी है मैंने| तुमको बहुत ख़त लिखे पर तुम नहीं आए कुत्ते के बच्चे| भेड़िया खा गया दो महीने का राशन| छुट्टी पर आते वक्त लेते आना एक खूबसूरत औरत| मेरी सहेली बन गई है| और इस वक़्त टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी| बेच दी गई है तुम्हारी मां| तुमको बहुत याद करती है एक पड़ोसन| हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन| सिरदर्द से लेटी है तुम्हारी पत्नी|
कुदरत का अनमोल इशारा,
भाषा रूप विविध पहनावा,
कितना सुंदर कितना प्यारा,
रंग-रंगीला देश हमारा,
मेरी चिड़िया तेरी चिड़िया,
किसकी चिड़िया सबसे बढ़िया,
रंगबिरंगी चलती-फिरती,
जिधर घुमा दें,उधर ही मुड़ती,
मगर नहीं उड़ पाती हैं ये,
और नहीं कुछ खाती है ये,
काश जान इनमें आ जाए,
संग उड़ा हमको ले जाए,
हम बच्चे पड़कुड़ियों जैसे,
हँसें फुदकते चिड़ियों जैसे,
मामाजी के राकेट पर
हम चाँद की सैर को जाएंगे,
वहाँ के बच्चों से मिलजुलकर,
दूध मलाई खाएंगे,
दीदी साथ न जाएगी तो
कौन तुम्हें नहलाएगा,
कौन करेगा कंघी पट्टी
कपड़े कौन पहनाएगा,
हवा करेगी कंघी पट्टी
और बादल नहलाएंगे,
परियां कपड़े पहनाएंगी,
तारे मुँह धुलवाएंगे,
मामाजी के राकेट पर
हम चाँद की सैर को जाएंगे,
साहिर
फिल्म-दीदी (वर्ष-1959)
लोक रंग
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सीधा सादा बंदा, सीधा सादा है परिवार,
रंगरंगीला देश, देश के रंगीले त्योहार,
महके मिट्टी सोंधी खुश्बू खींचे अपनी जान,
देखो जरा बताना कैसा पहना ये परिधान?

(सिक्किम में)
झर झर झरते झरने,
सर सर चलती पवन सुहानी,
दिल न रहे वश में जो,
तो फिर इसमें क्या हैरानी,
सजग प्रतिपल जुटे तैयार,
अपनी मुहिम पर सारे,
यही बस होड़ है प्रतिपक्ष के,
कितने गए मारे,
न अंतिम पल तलक हमको,
जरा विश्राम लेना है,
चपलता से विरोधी को,
हमें अब मात देना है,
हकीकत बनाम फिल्म
'संडास का नाश' बनाम टायलेट एक प्रेमकथा
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यह आज से लगभग सोलह साल पहले की घटना है जब गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने गृहनगर फर्रुखाबाद छिबरामऊ गया था।हर बार ये छुट्टियाँ मेरे लिए विशेष होती थीं। कभी उत्साही युवा साथियों का दल कैमरा और कार लिए आस पास के जिलों में कारगिल में शहीद हुए सैनिकों के घरों में जा जाकर वीडियो फिल्म बनाने के लिए तैयार होते। तो कभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के प्रशिक्षण दल के द्वारा लगाई कार्यशाला से प्रेमचन्द की 'ईदगाह' और भारतेन्दु हरिश्चंद्र का 'अंधेर नगरी' की तैयारी और उसका प्रदर्शन...
मगर इस बार एक नया युवा दल अपने हाथ में एक नई संस्था की मशाल थामें था और उसके साथ ही लिए हुए था अनूठा अभियान...
संस्था का नाम था 'अननोन वालंटियर्स एक्शन' यानि 'युवा' ...
और उनके अभियान का नाम था 'संडास का नाश' ...
कन्नौज जिले के छिबरामऊ कस्बे के सारे संडास यानि शुष्क शौचालयों के विरुद्ध युद्ध...
तब न कहीं दूर-दूर आज की तरह 'स्वच्छता अभियान' का नाम था और न 'टायलेट एक प्रेमकथा' जैसी किसी मूवी का शोर...
एक जुनून के तहत युवाओं का यह दल जुटा हुआ था सिर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा के खिलाफ कमर कसे।
जो लोग इस सुविधा का परंपरागत ढंग से लाभ उठा रहे थे। वे तिलमिलाए हुए थे। शोषक और शोषित दोनों इनके खिलाफ थे। उनकी जमी जमायी रोजी जो छिन रही थी।
अजीब सी परिस्थितियाँ थी। ऐसे में सारे जमाने से दुश्मनी लेकर धारा के विरुद्ध युद्ध करते हुए इन्होंने अपने जिले के जिलाधिकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली, राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली तक बार बार लगातार संघर्ष करते हुए शहर से इस अमानवीय प्रथा का नाश किया।
अंततः नगरपालिका प्रशासन को घुटने टेकते हुए संडासों को तोड़कर मल श्रमिकों का पुनर्वास करना पड़ा था।
लाख मुसीबतों के बावजूद ऐसा करके इस उत्साही युवाओं के दल ने आने वाले युवाओं के लिए एक चुनौती प्रस्तुत की कि "बिना किसी संसाधन के अगर मन में बदलाव की लगन है तो वह जरूर होकर रहता है।"
इस यथार्थ जीवन की सत्य घटना में फिल्म जैसी रोमान्स की घटनाएं भले ही मुखर न हों पर रोमान्च की घटनाओं की कमी नहीं थीं।
जिस तरह से आक्रोशित मल श्रमिकों द्वारा आंदोलनकारियों के घरों में मल फेंकने की धमकियां दीं गईं। सारे नगर में तनाव और उत्तेजना का वह माहौल किसी बड़े फिल्मी रोमांच से कम नहीं था। जबकि बिडम्बना ये थी यह लड़ाई उनकी दशा को सुधारने के लिए ही थी।
कुछ को गीता अच्छी लगती,
कुछ को लगे कुरान,
मैंने माथे पर लिख डाला,
प्यारा हिन्दुस्तान,

हिन्दू प्यारा लगे, किसी को
प्यारा है इस्लाम,
मेरे लिए सभी कुछ मेरा,
प्यारा हिन्दुस्तान,
हम झंड़े के तीन रंग हैं,
देखो हमको ध्यान से,
बच्चे नहीं वरन हम चेहरे,
कल के हिंदुस्तान के,
प्रकृति विचित्र बनाई
तेरे क्या कहने,
कहाँ तक करें बड़ाई,
तेरे क्या कहने,
कैसे-कैसे जीव
बनाए दुनियाँ में,
सोच न पाएं भाई,
तेरे क्या कहने,
खब्‍बू दिवस यानी लेफ्ट हेंडर्स डे
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13 अगस्‍त, यह दिन दुनिया भर में खब्‍बू दिवस यानी लैफ्ट हैंडर्स डे के रूप में मनाया जाता है।
(पंजाबी में बायें हाथ को खब्‍बा और दायें हाथ को सज्‍जा हाथ कहते हैं)। दुनिया में पूरी जनसंख्‍या के 13 से 14 प्रतिशत लोग खब्‍बू हैं।
महात्‍मा गांधी, सिकंदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्‍मार्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्‍टन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्‍स, क्‍वीन विक्‍टोरिया, क्रिस्‍टोफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्‍वेस्‍टर स्‍टेलोन, बीथोवन, एच जी वेल्‍स और अपने देश के पिता पुत्र बच्‍चन, बराक ओबामा रजनीकान्त शुक्ल सब खब्‍बू।
है ना मजेदार
खब्‍बू बेशक हर क्षेत्र कला, खेल, लेखन और संगीत में उत्‍कृष्‍ट होते हैं लेकिन वे आम तौर पर हॉकी खिलाड़ी नहीं होते।
जो हम से ना हो पाया,
वो तुम करके दिखलाओगी,
सिंधु साइना हो कोई भी,
उभर के ऊपर आओगी,
मुझे याद रखो या भूलो,
पर खुद पर इतराओगी,
मेरे इस मेडल से ज्यादा,
ऊँचे मेडल लाओगी,
पुलेला गोपीचंद
एक आदमी जो इलेक्शन मे किस्मत आजमा रहा था उसे सिर्फ तीन वोट मिले।
तो वो सरकार से जेड प्लस की सुरक्षा मांगने गया ,
जिले के डी एम साहब ने समझाते हुए कहा "आप को सिर्फ तीन वोट मिले हैं , फिर आप को जेड प्लस कैसे दी जा सकती है ?? "
वह आदमी बोला "जिस शहर मे इतने सारे लोग मेरे खिलाफ हों , तो मुझे मरवाओगे क्या ?? मुझे तो सुरक्षा मिलनी ही चाहिए।"
ये निर्मल निश्छल हँसी,
खिलते जैसे फूल,
ज्यों ज्यों बढ़ती उमर है,
हम जाते हैं भूल,
मेहनत और लगन का चमके,
जिन पैरों में जूता,
रोक सकेगा कौन उसे फिर,
किसमें इतना बूता,

1. धान-पान अरु केरा, तीनों पानी के चेरा

2. तरकारी है तरकारी या में पानी की अधिकारी

काला फूल न पाया पानी धान मरा अधबीच जवानी

3. करिया बादर जी डरवावे, भूरा बादर पानी लावे

माघ-पूस पुरवैया चले तो छिछली गड़हिया नाव चलावे
अदबी नामों की दिलचस्प
हकीकत ?
----------------------------------------जानें इन मशहूर शायरों के असली नाम...
मिर्ज़ा ग़ालिब = मिर्ज़ा असदुल्ला खां, असद, मिर्ज़ा नौशा
मख़्मूर सईदी = सुल्तान मुहम्मद खां
फ़िराक़ गोरखपुरी = रघुपति सहाय मिश्र
कमर जलालाबादी = औम प्रकाश भण्डारी
निदा फाजली = मुक्तदा हसन
साहिर लुधियानवी = अब्दुल हई
शहरयार = प्रो. अखलाक मोहम्मद खां
गुलज़ार = सम्पूर्ण सिंह कालरा
कतील शिफाई = औरंगज़ेब खान
मजरूह सुल्तानपुरी = असरार उल हसन खान
जिगर मुरादाबादी = अली सिकन्दर
दाग देहलवी = नवाब मिर्ज़ा खां
अदम गोंडवी = रामनाथ सिंह
ज़ौक = मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक
जोश मलीहाबादी = शब्बीर हसन खां
फानी बदायूंनी = शौकत अली खां
होश तिर्मज़ी = सैयद सिब्ते हसन
नीरज = गोपालदास नीरज
शकील बदायूंनी = शकील अहमद कादरी
इब्ने इंशा = शेर माहम्मद खां
रिफअत सरोश = सैयद शौकत अली
कैसर उल जाफरी = जुबैर अहमद
मुनीर नियाज़ी = मोहम्मद मुनीर खां
बशर नवाज़ = बशारत नवाज़ खां
शैदा बघौनवी = शहाबुद्दीन अहमद
तुफैल चतुर्वेदी = विजय कृष्ण चतुर्वेदी
मैकश अजमेरी = मोहम्मद युनूस
शीन काफ निज़ाम = शिव किशन बिस्सा
रियाज़ गाजियाबादी = मेहर इलाही खां
मयंक अकबराबादी = के. के. सिंह
साहिर होशियारपुरी = रामप्रकाश
अहमद फराज़ = सैयद अहमद शाह
मीना कुमारी = माहज़बीं अली बख़्श
नज़्मा = शमशाद नज़्मा
जलील मानकपुरी = जलील हसन
नज़ीर अकबराबादी = सैयद वली मोहम्मद
हफीज जालंधरी = अब्दुल असर हफीज
शेरी भोपाली = मुहम्मद असगर खान
गुलशन बावरा = गुलशन कुमार मेहता
खातिर गज़नवी = मिर्ज़ा इब्राहिम बेग
दुबे जी के पड़ोस में सत्यनारायण कथा की आरती हो रही थी,
आरती की थाली दुबे जी के सामने आने पर,
दुबे जी नेअपनी जेब में से छाँटकर कटा-फटा दस रूपये का नोट कोई देखे नहीं, ऐसे डाला ।
वहाँ पर अत्यधिक ठसाठस भीड़ थी ।
दुबे जी के कंधे पर ठीक पीछे वाली आंटी ने थपकी मार कर दुबे जी की ओर ₹2000 का नोट बढ़ाया ।
दुबे जी ने उनसे नोट ले कर आरती की थाली में डाल दिया ।
दुबे जी को अपने ₹10 डालने पर थोड़ी लज्जा भी आई ।
बाहर निकलते समय दुबे जी ने उन आंटी को श्रद्धा पूर्वक नमस्कार किया,
तब आंटी ने दुबे जी को बताया कि ₹10 का नोट निकालते समय आपका ₹2000 का नोट जेब से गिरा था, वो ही आपको वापिस किया था ।