हकीकत बनाम फिल्म
'संडास का नाश' बनाम टायलेट एक प्रेमकथा
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'संडास का नाश' बनाम टायलेट एक प्रेमकथा
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यह आज से लगभग सोलह साल पहले की घटना है जब गर्मी की छुट्टियों में मैं
अपने गृहनगर फर्रुखाबाद छिबरामऊ गया था।हर बार ये छुट्टियाँ मेरे लिए विशेष
होती थीं। कभी उत्साही युवा साथियों का दल कैमरा और कार लिए आस पास के
जिलों में कारगिल में शहीद हुए सैनिकों के घरों में जा जाकर वीडियो फिल्म
बनाने के लिए तैयार होते। तो कभी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नई दिल्ली के
प्रशिक्षण दल के द्वारा लगाई कार्यशाला से प्रेमचन्द की 'ईदगाह' और
भारतेन्दु हरिश्चंद्र का 'अंधेर नगरी' की तैयारी और उसका प्रदर्शन...
मगर इस बार एक नया युवा दल अपने हाथ में एक नई संस्था की मशाल थामें था और उसके साथ ही लिए हुए था अनूठा अभियान...
संस्था का नाम था 'अननोन वालंटियर्स एक्शन' यानि 'युवा' ...
और उनके अभियान का नाम था 'संडास का नाश' ...
कन्नौज जिले के छिबरामऊ कस्बे के सारे संडास यानि शुष्क शौचालयों के विरुद्ध युद्ध...
तब न कहीं दूर-दूर आज की तरह 'स्वच्छता अभियान' का नाम था और न 'टायलेट एक प्रेमकथा' जैसी किसी मूवी का शोर...
एक जुनून के तहत युवाओं का यह दल जुटा हुआ था सिर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा के खिलाफ कमर कसे।
जो लोग इस सुविधा का परंपरागत ढंग से लाभ उठा रहे थे। वे तिलमिलाए हुए थे। शोषक और शोषित दोनों इनके खिलाफ थे। उनकी जमी जमायी रोजी जो छिन रही थी।
अजीब सी परिस्थितियाँ थी। ऐसे में सारे जमाने से दुश्मनी लेकर धारा के विरुद्ध युद्ध करते हुए इन्होंने अपने जिले के जिलाधिकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली, राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली तक बार बार लगातार संघर्ष करते हुए शहर से इस अमानवीय प्रथा का नाश किया।
अंततः नगरपालिका प्रशासन को घुटने टेकते हुए संडासों को तोड़कर मल श्रमिकों का पुनर्वास करना पड़ा था।
लाख मुसीबतों के बावजूद ऐसा करके इस उत्साही युवाओं के दल ने आने वाले युवाओं के लिए एक चुनौती प्रस्तुत की कि "बिना किसी संसाधन के अगर मन में बदलाव की लगन है तो वह जरूर होकर रहता है।"
इस यथार्थ जीवन की सत्य घटना में फिल्म जैसी रोमान्स की घटनाएं भले ही मुखर न हों पर रोमान्च की घटनाओं की कमी नहीं थीं।
जिस तरह से आक्रोशित मल श्रमिकों द्वारा आंदोलनकारियों के घरों में मल फेंकने की धमकियां दीं गईं। सारे नगर में तनाव और उत्तेजना का वह माहौल किसी बड़े फिल्मी रोमांच से कम नहीं था। जबकि बिडम्बना ये थी यह लड़ाई उनकी दशा को सुधारने के लिए ही थी।
मगर इस बार एक नया युवा दल अपने हाथ में एक नई संस्था की मशाल थामें था और उसके साथ ही लिए हुए था अनूठा अभियान...
संस्था का नाम था 'अननोन वालंटियर्स एक्शन' यानि 'युवा' ...
और उनके अभियान का नाम था 'संडास का नाश' ...
कन्नौज जिले के छिबरामऊ कस्बे के सारे संडास यानि शुष्क शौचालयों के विरुद्ध युद्ध...
तब न कहीं दूर-दूर आज की तरह 'स्वच्छता अभियान' का नाम था और न 'टायलेट एक प्रेमकथा' जैसी किसी मूवी का शोर...
एक जुनून के तहत युवाओं का यह दल जुटा हुआ था सिर पर मैला ढ़ोने की अमानवीय प्रथा के खिलाफ कमर कसे।
जो लोग इस सुविधा का परंपरागत ढंग से लाभ उठा रहे थे। वे तिलमिलाए हुए थे। शोषक और शोषित दोनों इनके खिलाफ थे। उनकी जमी जमायी रोजी जो छिन रही थी।
अजीब सी परिस्थितियाँ थी। ऐसे में सारे जमाने से दुश्मनी लेकर धारा के विरुद्ध युद्ध करते हुए इन्होंने अपने जिले के जिलाधिकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग नई दिल्ली, राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली तक बार बार लगातार संघर्ष करते हुए शहर से इस अमानवीय प्रथा का नाश किया।
अंततः नगरपालिका प्रशासन को घुटने टेकते हुए संडासों को तोड़कर मल श्रमिकों का पुनर्वास करना पड़ा था।
लाख मुसीबतों के बावजूद ऐसा करके इस उत्साही युवाओं के दल ने आने वाले युवाओं के लिए एक चुनौती प्रस्तुत की कि "बिना किसी संसाधन के अगर मन में बदलाव की लगन है तो वह जरूर होकर रहता है।"
इस यथार्थ जीवन की सत्य घटना में फिल्म जैसी रोमान्स की घटनाएं भले ही मुखर न हों पर रोमान्च की घटनाओं की कमी नहीं थीं।
जिस तरह से आक्रोशित मल श्रमिकों द्वारा आंदोलनकारियों के घरों में मल फेंकने की धमकियां दीं गईं। सारे नगर में तनाव और उत्तेजना का वह माहौल किसी बड़े फिल्मी रोमांच से कम नहीं था। जबकि बिडम्बना ये थी यह लड़ाई उनकी दशा को सुधारने के लिए ही थी।
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