Tuesday, 4 August 2015


जब से देखा मैंने तुमको,
दिल मेरा गाने लगा,

जिंदगी बेलुत्फ थी पर,
अब मज़ा आने लगा,


दिल में तुम धड़कन में तुम,
सांसों में भी हो तुम बसे,


अब तलक नफरत थी,अब
इस दिल पे प्यार आने लगा,

कभी कभी हमें उनका खयाल आता है,
कभी कभी हमें अपनी खबर नहीं होती,

उदास दिल है कि उनकी नजर नहीं होती,
बग़ैर शम्स के ताब -ए - कमर नहीं होती,

कुछ ऐसे लोग भी दुनियाँ में हमने देखे हैं,
समा भी जाते हैं हमको खबर नहीं होती
मेरे माशूक के दायीं तरफ,
रुखसार पर तिल है,
बड़ी मुद्दत से उसमें ही,
मेरा अटका हुआ दिल है,

Monday, 3 August 2015

संकट में सूझबूझ

स्कूल से आते ही जील को पापा का इंतजार था। वह दो बार मम्मी से पूछ चुकी थी।
 ‘मम्मी, पापा कब आएंगे।
‘शाम को, तुम्हें तो पता है, जैसे रोज आते हैं। क्या बात है आज कुछ खास है क्या?- मम्मी ने पूछा।
जील ने नहीं बताया। वह इसे रहस्य रखना चाहती थी।
बोली - कुछ नहीं, बस ऐसे ही। मैने सोचा कहीं आज शायद देर से न आएं, कहीं उन्हें जाना न हो,
उसकी मम्मी को जील की आदत का पता था। वे समझ गईं -‘ये लड़की अब पापा को ही सारी बात बताएगी और किसी को नहीं।’ वह मुस्कराते हुए घर के काम में लग गईं।
जील के पापा जब शाम को घर आए तो वह लपक कर पापा के पास पहुँची, और उनके आगे एक कागज बढ़ा दिया।
क्या है ये ?- पापा ने एक उचटती सी निगाह कागज पर डाली और मुस्कराते हुए पूछा।
‘पापा, हम न स्कूल की तरफ से दोस्तों के साथ कारवाँ रिसार्ट जा रहे है पिकनिक पर’ - जील ने जल्दी से अपनी बात कही।
कहाँ, शिवराजपुर, तो फिर... - पापा ने जानबूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
‘पापा, ! आपको इस कागज पर साइन करने हैं कि आपको मुझे पिकनिक पर भेजने में कोई आपत्ति नहीं है।’ - जील थोड़ा झुंझलाती हुई बोली।
‘अच्छा, तो ऐसा बोलो न, लेकिन सोच लो अगर आपत्ति हुई तो’- उसके पापा ने अपनी जेब से कलम निकालते हुए कहा।
क्यों पापा ? - जील ने सवाल किया।
‘बेटी, मेरे ये साइन करना इस बात की गवाही है कि मेरी बच्ची कोई शरारत नहीं करेगी, सबका कहना मानेगी। अनुशासन में रहेगी। क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ ?’ - पापा ने कागज पर लिखते हुए पूछा।
पापा के गले में बाहें डालते हुए जील ने कहा - ‘पापा आपको मेरी कभी शिकायत नहीं मिलेगी बल्कि मैं कुछ ऐसा करूँगी जिससे आपको गर्व ही होगा।’
‘हमें तुमसे यही उम्मीद है’ - पापा ने जील के गाल थपथपाते हुए कहा।
धीरे - धीरे बीस फरवरी 2014 का वह दिन भी नजदीक आ गया जिस दिन जील को पिकनिक पर जाना था। पूरे दिन का कार्यक्रम था। सुबह से ही सब उत्साहित थे। उस दिन जील अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ जल्दी उठी। फोन पर एक दूसरे से अपडेटस लेते हुए वे सब नियत समय पर अपने स्कूल में पहुँच गए। स्कूल से कुल चार बसें जा रहीं थी। बस में बैठकर वे सब शीघ्र ही पावागढ के पास जांबुआ गाँव के पास बने कारवाँ रिसार्ट पहुँच गए।
रिजार्ट में बच्चों के मनोरंजन के लिए खूब साधन थे। सो बच्चों को वहाँ खूब मजा आया। करीब चार बजे बार - बार कहने पर वे घर वापसी को राजी हुए। जल्दी - जल्दी तीन बसों के बच्चे सवार हो गए। चैथी बस के बच्चे अभी नहीं आए थे। जब उसके बच्चे आए तब तक आगे की तीनों बसें जा चुकीं थीं। साथ पहुँचने की जल्दी में ड्राइवर ने बस की गति बढ़ा दी। तेज गति में उछलती कूदती बस में बच्चों को खूब आनंद आ रहा था।
तभी सामने जा रहे एक वाहन से आगे निकलने के क्रम में ड्राइवर ने तेजी से अपनी बस की गति बढ़ाई। बस बड़ी तेजी से उसे पार करती हुई उससे आगे निकली। पता नहीं क्या हुआ? बस अचानक साँप की तरह लहराई। बस के एक साथ कई झटके खाने से बच्चों को बड़ा मजा आया और खुशी का एक चिल्लाहट भरा जोर का शोर उभरा। मगर बस की इस चाल से समझदार जील को पता चल गया कि ड्राइवर बस से अपना नियंत्रण खो बैठा है।
उसने तुरंत अपने दोनों हाथों को अपने सिर के पीछे लगाया और अपना सिर अपने दोनों पाँवों के बीच डाल लिया। बस सिर्फ एक ही तरफ के पहियों पर थी। वह कुछ ही क्षणों में पलट गई और काफी दूर तक घिसटती चली गई। उसकी खिड़कियों के शीशे टूटे और बिखर कर बच्चों के शरीर में घुस गए। कुछ क्षण पहले का उनका उल्लास रुदन में परिवर्तित हो गया। ऐसे ही किसी बच्चे का हाथ कटा और लहरा कर जील के सामने आ गिरा। चारों तरफ चीख पुकार मच गई।
कुछ पल तो किसी को कुछ समझ नहीं आया। धीरे -धीरे जील उठी। अपनी सतर्कता के कारण उसे खरोंच भी न आई थी। उसने देखा कि सभी घायल पड़े हैं। उसने जल्दी - जल्दी दो तीन बच्चों को बस से बाहर निकाला और उनकी टीम बनाकर अपना बचाव अभियान शुरू कर दिया। जिन बच्चों की हालत ज्यादा खराब थी वे कोमा में न चले जाएं इसलिए उसने उनके गालों को थपथपाना शुरू कर दिया। ऐसा ही उसने अन्य बच्चों से करने के लिए कहा।
उसने जल्दी ही एक राहगीर को रोक कर 100 नम्बर पर पुलिस और 108 नम्बर पर एम्बूलेंस को फोन कर दिया। जिससे पंद्रह से बीस मिनट के अंदर पुलिस और एम्बूलेंस आ गई और घायलों को नजदीक के रेफरल हाॅस्पिटल में भर्ती कर दिया गया। समय पर सहायता मिल जाने के कारण कोई जन हानि नहीं हुई। इसका श्रेय जील की सूझबूझ ही जाता है।
परंतु जील इसका श्रेय रामकृष्ण मिशन आश्रम के बड़ौदा सेंटर को देती है। जहाँ वह ध्यान और पूजा के लिए जाती है। इससे मजबूत हुई आत्मिक शक्तियों के कारण यह संभव हो सका कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी संयम रख कर वह अपने साथियों की मदद कर सकी उनकी जान बचा सकी।
जील कहती है मैं मानती हूँ कि मैं अपने भाग्य के कारण नहीं बची बल्कि जो घायल हुए थे उनको बचा सकूँ इसलिए उनके भाग्य से बची।
जील को उसके इस साहस पूर्ण कार्य के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा सम्मानित किया गया।
नन्हे दोस्तो,

मन से हो मजबूत, लड़ो तुम संकट को टारो,
कैसी भी बाधा आए तुम हिम्मत मत हारो,
फर्क नहीं पड़ता इससे ज्यादा हो या कम का,
किरन एक ही सीना देती चीर अकेले तम का,


े


     

Tuesday, 7 July 2015



वक्त थोड़ा है काम ज्यादा है,
टालने का नहीं इरादा है,

मूँदकर आँख तुम चले आओ,
दिल न तोड़ेगे,अपना वादा है,

दुश्मनी ही सही से निभ जाए,
दोस्ती मरने पे आमादा है,


पुर असरार सुंदर ग़ज़ल की तरह,
तुमको पाया है पूजा के फल की तरह,
यूँ मिले दिल को हर एक खुशी मिल गई
जीस्त के उलझे प्रश्नों के हल की तरह,
मन की धरती तरसती हुई सीप थी,
तुम मिले स्वाति की बूँद जल की तरह,
ज्ञान एक आवरण चढ़ा देता है,
इन आँखों पर,
तय होता है मार्ग प्रेम का,
सरल भावना की पाँखों पर,