Saturday, 23 December 2017

जीवन में एक मित्र बनाएं

सोते हैं तो अब जग जाएं,
धरती को कपड़े पहनाएं,
आओ आगे बढ़कर आएं,
जीवन में एक मित्र बनाएं,
प्रतिपल मदद हमारी करते,
गर्मी में आतप को हरते,
फूल औ फल पत्तियाँ दवाएं,
देते शीतल मंद हवाएं,
पानी देकर बड़ा बनाएं,
जीवन में एक मित्र बनाएं
बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना
इक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना
छलकाए हुए चलना ख़ुशबू लब-ए-लालीं की
इक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना
उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आए
पर्दे में चले जाना शरमाए हुए रहना
इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से
इक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना
आदत ही बना ली है तुम ने तो 'मुनीर' अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
मुनीर नियाज़ी
पल-पल बदलें,कल अलग
और आज अलग,
हर साजिंदा लिए हुए है,
साज अलग,
क्यों ना बदलें हम ऐसे में,
रंग अपने,
होती अलग जगह,
होते अंदाज़ अलग,
झुंड में हैं ये बच्चे,
अथवा फूलों का गुलदस्ता,
साथ में हों जब इनके
तो लगता हमको अच्छा,
इस जहान में हैं जितने,
वे सब दुखदर्द भुलाकर,
बच्चों के संग में ये मन भी
हो जाता है बच्चा,
आओ आज करे सब मिलकर,
चिड़ियाघर की सैर,
देखें समझें पशु पक्षी को,
हल्ला किए वगैर,
एक सींग का गैंडा देखो,
जिसकी मोटी खाल,
पानी के राजा लेटे हैं,
मगरमच्छ घड़ियाल,
सुंदर मोर देखते जाओ,
तोता हरियल वाला,
भाग न पिंजरे से जाए,
सो लगा हुआ है ताला,
हाथी शेर जिराफ लकड़बग्घे,
कंगारू भालू,
प्यारा पांडा चढ़ा पेड़ पर,
खाता देखो आलू,
देख न पाओ एक बार में,
फिर आ जाना खैर,
आओ आज करे सब मिलकर,
चिड़ियाघर की सैर,
कचहरी तो बेवा का तन देखती है,
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
- कैलाश गौतम
भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे-तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दारोगा चरण चूमतें है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुंह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों ने घेरा सुझाया-बुझाया
वकीलों ने हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||
कागज के थैले अपनाओ,
पर्यावरण को स्वच्छ बनाओ,
अगर गंदगी हो तो उसको,
कूड़ेदानों में पहुँचाओ,
देश हमारा है घर जैसा,
इसको साफ रखो रखवाओ,
हम जैसे करते हैं देखो,
तुम भी निकलो आगे आओ,
एक से एक जुडे़ं तो मिलकर,
दरिया बन एक लहर उठाओ,
देश हमारा सबसे न्यारा,
बढ़ो, इसे आगे बढ़वाओ,