Tuesday, 30 September 2014

तोड़ कर घन हाथों से डोर,
चल पड़ी जब तू भू की ओर,
दृष्टि फैलाई चारों ओर,
नहीं था ओर न कोई छोर,

डोलती चली हवा के संग,
उड़ रही जैसे कोई पतंग,
मस्त हो मन नाचे इस ढ़ंग,
नाचता जैसे कोई मलंग,

न थी कुछ रस्ते की पहचान,
न था कुछ पाने का अरमान,
न था तुझको इन सबका ध्यान,
शून्य में विचर रहे थे प्रान,

साथ थी तुझ सी कई अनेक,
भरी थी पानी से हर एक,
खुशनुमा चेहरा मेरा देख,
हो के हैराँ यूँ बोली एक,

किसलिए खुश हो इतना आज,
पा लिया क्या जीवन का राज़,
घोल कानों में मधु आवाज़,
बना लो हमको भी हमराज़,

हँस के छेड़ी जो तूने तान,
सुन के मैं खुद अब तक हैरान,
कहा तेरा लूँ जो मैं मान,
'यही तो जीवन की पहचान',

(रजनीकान्त शुक्ल)
रचनाकाल --10-2-2006

1 comment:

कविता रावत said...
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