Thursday, 25 June 2015

सन १९५७ में रिलीज़ हुई थी मुंबई के मिनर्वा थिएटर में गुरुदत्त की 'प्यासा'। 
व्यवस्था और सत्ता, समाज के अलमदारों और ठेकेदारों, नेताओं और अफ़सरशाही पर ज़बरदस्त सीधा प्रहार और तंज़ कसती थी ये फ़िल्म। 
इसमें साहिर का एक गाना था - जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
जब ये गाना स्क्रीन पर प्ले हुआ तो सारे दर्शक उठ कर खड़े हो गए। उन्होंने खूब तालियां बजाईं और जम कर 'वन्समोर' के नारे लगाये।
सिनेमा हाल के प्रबंधक परेशान कि क्या करें। आख़िरकार दर्शकों के बेतरह शोर-गुल और मांग के दबाव में उन्हें यह गाना दुबारा प्ले करना पड़ा। इतने पर भी दर्शकों का दिल नहीं भरा। तीसरी बार प्ले करना पड़ा।
याद नहीं पड़ता कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में ऐसी घटना पहले और बाद में कभी हुई हो।
'प्यासा' की गिनती सदी की पांच श्रेष्ठ फिल्मों में होती है। सुना है इस गाने को सुन कर शीर्ष नेताओं में बहुत खलबली मची थी। इसे प्रतिबंधित किये जाने की मांग भी हुई। लेकिन अंततः सच्चाई को स्वीकार कर लिया गया।
पेश है गाना -
ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हए कारवां ज़िंदगी के
कहां हैं, कहां हैं मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पर तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये उजले दरीचों में पायल की छन छन
थकी-हारी सांसों पे तबले की धन धन
ये बेरहम कमरों में खांसी की ठन ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ये फूलों के गज़रे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख़ फ़िकरे
ये ढलके बदन, ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
यहां पीर भी आ चुके, जवां भी
तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियां भी
ये बीवी भी है, और बहन भी है, मां भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
मदद चाहती है, ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयंबर की उम्मत, जुलय खां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.…
ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे, ये गलियां, ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहां हैं.… 


कैसे पाऊँगा भला मैं अब इनको भूल,
मुझे टेरते से लगे, कौसानी के फूल,


तुम्हारे शहर का मौसम हुआ गुलाबी सा,
कौन आया है पहाड़ों की हवाएं छू कर,


जो न हो पाई अभी तक,वो करामात हुई,
आप आए हमारे शहर में बरसात हुई,


तन और मन की थकन को,
तुरत गए हम भूल,
जब आँखों सामने ,
आये सुंदर फूल,

"कुदरत ने हमको दिया, फूलों का उपहार,
उनके जैसा मन लिए, कर लें हम स्वीकार"


ऊँघे मलती आँख को,चुनरी हरी संभाल,
धीरे -- धीरे जागती, सुबहे -- नैनीताल,


मैं बर्फीले देश का वासी,
पेंग्विन मेरा नाम,

मछली कीडे खाना ठहरा,
मुझ पक्षी का काम,

पंख है लेकिन उड ना पाऊँ,
तैरूँ मैं भरपूर,

अगर कभी मिलना मुझसे तो,
करना प्यार जरूर,

हैं शरीर पर बाल हमारे,
काले और सफेद ,

नर हूँ या मादा हूँ तुम ना,
कर पाओगे भेद,

जब भी दौड लगाता,आती,
चेहरों पर मुस्कान,

आना मेरे देश घूमने ,
देता हूँ पैगाम,

पाकर भी कुछ खोया खोया लगता हूँ,
जागा हूँ पर सोया सोया लगता हूँ,

कौन समंदर आ बैठा इन आँखों में,
अब रोया तब रोया रोया लगता हूँ,

पूरा होगा कब अब ये तो रब जाने,
पलकों पर इक ख्वाब संजोया लगता हूँ,

दृश्यमान हरसू वह कितने रूपों में,
माला में ज्यों फूल पिरोया लगता हूँ,

सोच रहा कब, कैसे,कहूँ ,कहाँ हूँ मैं,
हूँ मैं अब या नहीं हूँ ,गोया लगता हूँ,


थोडा - थोडा करें अगर,
स्वर्ग आएगा इस भू पर,

भले देर से करे असर,
स्वर्ग आएगा इस भू पर,

घूम जाएगी जहाँ नजर,
स्वर्ग आएगा इस भू पर,

रखें उठा ना कोई कसर,
स्वर्ग आएगा इस भू पर,

दुनिया होगी जगर मगर,
स्वर्ग आएगा इस भू पर,

भूलेंगे ना जीवन भर,
स्वर्ग आएगा इस भू पर,

रंग कहाँ से लाती इतने,
सुंदर पंखों वाली,

सब दिन रहो फुदकती,
फिरती इस डाली उस डाली,

कभी हमें ले चलो घुमाने,
अपने गाँव शहर में,

कहाँ बैठ गाने गाती,
गर्मी की दो पहर में,

बारिश में भीगती, न मिलती,
दूर -दूर तक छाँव,

सर्दी में बिन स्वेटर कैसे रहती,
भला बताओ,

समय बिताती हो तुम कैसे,
जब होती हो खाली,

रंग कहाँ से लाती इतने,
सुंदर पंखों वाली,


कहाँ हमारा जोश रुक रहा
 हम दरिया तूफानी,

हटें न पूरा किए बिना हम
मन में जो भी ठानी,

करतब ऐसे अपने,
तुमको सुन होगी हैरानी,

आओ देखो जरा
हम नन्हे हिन्दुस्तानी,

अल्मोडे की बाल मिठाई,
बोलो किसने किसनेे खाई,

पहले बर्फी सी बनबाई,
फिर नन्हीं गोली चिपकाई,

इसे बनाते हैं हलवाई,
या घर में बनती है भाई,

पापाजी ने जब मँगवाई,
लगे झगडने दोनों भाई,

मुझको पहले मुझको पहले,
पापा ने एक - एक पकडाई,

बंद किया आपस में लडना,
हँस कर खाते दोनों भाई,

खुश होकर आपस में कहते,
हमने खाई तुमने खाई,

अल्मोडे की बाल मिठाई,
आए मुझसे मिलने मित्रों,
दूर देश के वासी,

चेहरे पर मुस्कान देखकर,
भागी दूर उदासी,

कितनी दिन और रातें बीतीं,
हम बिछडे हैं कब से,

छुप कर बैठ नहीं सकते हम,
हमें मिलाओ सबसे,

हम भी क्या कम हैं कह बैठे,
बढिए, आगे आएं,

नए बहुत हैं दोस्त आज,
उनसे तुमको मिलवाएं,
साहस कर आगे तो आओ,
कदमों में आएगी मंजिल,

मिल जाएगा हर मनचाहा,
चाहोगे होगा सब हासिल,

खो सकता है कूल किनारा,
बने रहे ग़र यूँ ही गाफिल,

जीतेगा हर बाजी अपनी,
हिम्मत का सरताज मेरा दिल,
हम चिडियों सी चहक - चहक,
घर चिचियाहट से भर दें,

हँस - हँस कर ग़म की सारी,
स्थिति परिवर्तित कर दें,

इस रोती -धोती दुनियाँ को,
हँसने का अवसर दें,

अमृत दें, हमको बदले में,
चाहे लोग जहर दें,

Tuesday, 2 June 2015



यह है हन्सी गाय हमारी,
भोली भाली प्यारी प्यारी,
गौरी माँ की प्यारी बेटी,
सारी ममता उदर समेटी,
घर आई जिस रोज हमारे,
फूल खिल गए घर के सारे,
नंदू उदित सुनयना नंदी,
नाम रखा सबने मिल हन्सी,
छुटकी इसकी बेटी आई,
वह भी सबके मन को भाई,
उसके हाव भाव सब प्यारे,
दूध पी रहे मिल हम सारे,
और कभी मिलकर जो भागे,
रहती हरदम सबसे आगे,
दूध दही मक्खन घी मट्ठा,
सादा फीका मीठा खट्टा,
कमी रही अब नहीं किसी की,
खुश लेकर कई चीज पडोसी,
रोज खिलाते दाना चारा,
और नहलाते, नियम हमारा,
खुश होकर वह दूध पिलाती,
जैसे खुश हो दाना खाती,
सेवा की महिमा है न्यारी,
यह है हन्सी गाय हमारी,