Monday, 22 May 2017

एक बार एक राजा ने विद्वान ज्योतिषियों की सभा बुलाकर प्रश्न किया कि "मेरी जन्म पत्रिका के अनुसार मेरा राजा बनने का योग था मैं राजा बना , किन्तु उसी घड़ी मुहूर्त में अनेक जातकों ने जन्म लिया होगा जो राजा नहीं बन सके क्यों ? इसका क्या कारण है ?
राजा के इस प्रश्न से सब निरुत्तर होगये क्या जबाब दें कि एक ही घड़ी मुहूर्त में जन्म लेने पर भी सबके भाग्य अलग अलग क्यों हैं?
सभी विद्वजन इस प्रश्न का उत्तर सोच ही रहे थे में कि एक वृद्ध खड़े हुये और बोले, "महाराज की जय हो ! आपके प्रश्न का उत्तर भला कौन दे सकता है , आप यहाँ से कुछ दूर घने जंगल में जाएँ तो वहां पर आपको एक महात्मा मिलेंगे उनसे आपको उत्तर मिल सकता है।"
राजा की जिज्ञासा बढ़ी।
घोर जंगल में जाकर देखा कि एक महात्मा आग के ढेर के पास बैठ कर अंगार (गरमा गरम कोयला ) खाने में व्यस्त हैं।
सहमे हुए राजा ने महात्मा से जैसे ही प्रश्न पूछा महात्मा ने क्रोधित होकर कहा-"तेरे प्रश्न का उत्तर देने के लिए मेरे पास समय नहीं है मैं भूख से पीड़ित हूँ ।तेरे प्रश्न का उत्तर यहां से कुछ आगे पहाड़ियों के बीच एक और महात्मा हैं,वे दे सकते हैं।"
राजा की जिज्ञासा और बढ़ गयी, पुनः अंधकार और पहाड़ी मार्ग पार कर बड़ी कठिनाइयों से राजा दूसरे महात्मा के पास पहुंचा किन्तु यह क्या?
महात्मा को देखकर राजा हक्का बक्का रह गया, दृश्य ही कुछ ऐसा था, महात्मा अपना ही माँस चिमटे से नोच नोच कर खा रहे थे।
राजा को देखते ही महात्मा ने भी डांटते हुए कहा " मैं भूख से बेचैन हूँ मेरे पास इतना समय नहीं है , आगे जाओ पहाड़ियों के उस पार एक आदिवासी गाँव में एक बालक जन्म लेने वाला है ,जो कुछ ही देर तक जिन्दा रहेगा सूर्योदय से पूर्व वहाँ पहुँचो वह बालक तेरे प्रश्न का उत्तर का दे सकता है।"
सुन कर राजा बड़ा बेचैन हुआ बड़ी अजब पहेली बन गया मेरा प्रश्न, उत्सुकता प्रबल थी। कुछ भी हो यहाँ तक पहुँच चुका हूँ वहाँ भी जाकर देखता हूँ क्या होता है?
राजा पुनः कठिन मार्ग पार कर किसी तरह प्रातः होने तक उस गाँव में पहुंचा, गाँव में पता किया और उस दंपति के घर पहुंचकर सारी बात कही और शीघ्रता से बच्चा लाने को कहा जैसे ही बच्चा हुआ दम्पत्ति ने नाल सहित बालक राजा के सम्मुख उपस्थित किया राजा को देखते ही बालक ने हँसते हुए कहा,
"राजन् ! मेरे पास भी समय नहीं है ,किन्तु अपना उत्तर सुनो लो तुम,मैं और दोनों महात्मा सात जन्म पहले चारों भाई व राजकुमार थे। एक बार शिकार खेलते खेलते हम जंगल में *भटक गए। तीन दिन तक भूखे प्यासे भटकते रहे ।
अचानक हम चारों भाइयों को आटे की एक पोटली मिली जैसे तैसे हमने चार बाटी सेकीं और अपनी अपनी बाटी लेकर खाने बैठे ही थे कि भूख प्यास से तड़पते हुए एक महात्मा आ गये । अंगार खाने वाले भइया से उन्होंने कहा -
बेटा मैं दस दिन से भूखा हूँ अपनी बाटी में से मुझे भी कुछ दे दो, मुझ पर दया करो जिससे मेरा भी जीवन बच जाय, इस घोर जंगल से पार निकलने की मुझमें भी कुछ सामर्थ्य आ जायेगी " इतना सुनते ही भइया गुस्से से भड़क उठे और बोले "तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या आग खाऊंगा ? चलो भागो यहां से।
वे महात्मा जी फिर मांस खाने वाले भइया के निकट आये उनसे भी अपनी बात कही किन्तु उन भइया ने भी महात्मा से गुस्से में आकर कहा कि "बड़ी मुश्किल से प्राप्त ये बाटी तुम्हें दे दूंगा तो मैं क्या अपना मांस नोचकर खाऊंगा ?"
भूख से लाचार वे महात्मा मेरे पास भी आये , मुझे भी बाटी मांगी... तथा दया करने को कहा किन्तु मैंने भी भूख में धैर्य खोकर कह दिया कि " चलो आगे बढ़ो मैं क्या भूखा मरुँ ...?"
बालक बोला "अंतिम आशा लिये वो महात्मा हे राजन !आपके पास आये, आपसे भी दया की याचना की।
सुनते ही आपने उनकी दशा पर दया करते हुये ख़ुशी से अपनी बाटी में से आधी बाटी आदर सहित उन महात्मा को दे दी।
बाटी पाकर महात्मा बड़े खुश हुए और जाते हुए बोले "तुम्हारा भविष्य तुम्हारे कर्म और व्यवहार से फलेगा।
बालक ने कहा "इस प्रकार हे राजन ! उस घटना के आधार पर हम अपना भोग, भोग रहे हैं ,धरती पर एक समय में अनेक फूल खिलते हैं, किन्तु सबके फल रूप, गुण, आकार-प्रकार, स्वाद में भिन्न होते हैं। इतना कहकर वह बालक मर गया।
राजा अपने महल में पहुंचा और सोचने लगा......
एक ही मुहूर्त में अनेक जातक जन्मते हैं किन्तु इसी तरह सब अपना किया, दिया, लिया ही पाते हैं।
लो यहाँ पे आ गए हम,
यूँ ही साथ-साथ चलते,
हो न ग़म किसी को हमसे,
यही देखते-सँभलते,

गुजरे बरस पचीसों,
इस राह में हमारी,
मिलती रही है छाया,
यूँ ही छाँव में तुम्हारी,
लेकर आशीष पिता का,
जीवन पथ पर बढ़ जाएं,
सागर में गहरे तैरें,
गिरि के शिखरों चढ़ जाए,
माँ का तो प्यार हमेशा,
बिन माँगे मिलता रहता,
दिल पर रख हाथ बताओ,
क्या कोई गलत मैं कहता,
सबकी जेबों में रहते हो,
हो आखिर तुम किसके पैसे,
आम संतरे टॉफी खाते
वो, होते हैं जिसके पैसे,

बोले दादाजी गौरव से,
जेब से मेरी खिसके पैसे,
गौरव हँस कहता दादा से,
पास में जिसके उसके पैसे,
दादाजी ने फिर समझाया,
गौरव बेटा ऐसा कैसे,
चीज के बदले चीज मिले
या मेहनत की है कीमत पैसे,
पैसों से खट्टा मीठा लो,
फिर वो चाहो चक्खो जैसे,
पहले मीठी सी पप्पी दो,
फिर जेबों में रक्खो पैसे,
बूढ़ा पिता अपने IAS बेटे के चेंबर में जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया !
और प्यार से अपने पुत्र से पूछा...
"इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"?

पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी "!
पिता को इस जवाब की आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया !
उनकी आँखे छलछला आई ! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे !
उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???
पुत्र ने इस बार कहा- "पिताजी आप हैैं, इस दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान "!
पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए ।
उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ???
पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते हुएकहा-"पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,
बोलिए पिताजी" !
पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लग लिया !
बड़े दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
कितना मेरे मन को भाए,
छुट्टी वाले दिन,

रोज-रोज जल्दी उठने की,
भागमभाग नहीं,
अब तो जब हम उठ जाएंगे,
होगी सुबह तभी,
पापा मम्मी भी अब ज्यादा,
जोर नहीं देंगे,
'छुट्टी है सोने दो' आपस में,
मिल कह लेंगे,
बस्ता कापी पेंसिल से अब,
कुट्टी वाले दिन,
बहुत दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
जाएंगे हम सब मिलकर,
दादी नानी के गाँव,
जहाँ नदी का शीतल जल,
पेड़ों की ठंड़ी छाँव,
तोड़ डाल से आम और जामुन,
हम खाएंगे,
दोस्त गाय बकरी के संग,
खेतों में जाएंगे,
भूलेंगे सर की मैडम की,
घुट्टी वाले दिन,
बहुत दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
काश कहीं से मिल जाए,
हमको ऐसी पावर,
बुर्ज खलीफा पर घूूमें,
टहलें एफिल टावर,
सागर के नीचे की दुनियां,
देखें जी भर के,
नभ के तारे सभी खंगालें,
एक-एक कर के,
किस्से और कहानी झूठा-
झुट्ठी वाले दिन,
बहुत दिनों के बाद हैं आए,
छुट्टी वाले दिन,
ओशो से किसी ने पूछा -‎
"राजनीतिक लुच्चे-लफंगों से देश को छुटकारा कब मिलेगा?"
ओशो ने कहा - "बहुत कठिन है। क्योंकि प्रश्न राजनेताओं से छुटकारे का नही है, प्रश्न तो तुम्हारे अज्ञान के मिटने का है ? तुम जब तक अज्ञानी हो, कोई न कोई तुम्हारा शोषण करता ही रहेगा, कोई न कोई तुम्हे चूसेगा ही !-
‎पंडित चूसेंगे , पुरोहित चूसेंगे , मुल्ला-मौलवी चूसेंगे , राजनेता चूसेंगे तुम जब तक जाग्रत नही हो, तब तक लुटोगे ही ? फिर किसने लूटा, क्या फर्क पड़ता है ? किस झण्डे की आड़ में लुटे, क्या फर्क पड़ता है ?
‎समाजवादियों से लुटे कि साम्यवादियों से, क्या फर्क पड़ता है ? तुम तो लूटोगे ही ! लूटेरों के नाम बदलते रहेंगे और तुम लुटते रहोगे !
'इसलिए ये मत पूछो कि राजनैतिक लुच्चे-लफंगों से देश का छुटकारा कब होगा? यह प्रश्न ही अर्थहीन है ? ये पूछो कि मै कब इतना जाग सकूँगा कि झूठ को झूठ की तरह पहचान सकूँ ? और जब तक सारी मनुष्य- जाति झूठ को झूठ की भाँति नहींं पहचानती, तब तक छुटकारे का कोई उपाय नहीं है।‎
राह में तुम मत सोना
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माँ ने सब्जी लेने चुन्नू को,
भेजा बाजार,
लगे राह में खेल खेलने,
बन्द हुआ बाजार,
खाली हाथ लौटकर आए,
डाँट पड़ी डटकर,
चुन्नू गुस्से में बोले-अब,
नहीं घुसेंगे घर,
माँ ने हँसकर कहा-
बिना सब्जी के खाना खाना,
आज नहीं ला पाए तो फिर,
कल सुबह ले आना,
मेहनत का फल अच्छा,
लापरवाही ठीक न होती,
जीत पे हँसती ये आँखें,
और असफलता पर रोती,
जीवन में पल-पल पर ऐसी,
मुश्किल घड़ियाँ आतीं,
पर वे आसमान पर छाई,
बदली सी हट जातीं,
सीखो सबक हर एक गलती से,
ऐसे कभी न रोना,
आँखों में मंज़िल को रख लो,
राह में अब मत सोना,