Friday, 8 March 2019

मन की आँखों वाले

मन की आँखों वाले
-------------------------
आओ खेलें खेल निराले,
दूर हटाएं मन के जाले,
पीड़ा महसूसें हम उनकी,
जो हैं मन की आँखों वाले,
किसी वजह से हाथ न जिनके,
पैर नहीं या आँख न जिनके,
उन पर हँसें नहीं, ये सोचें,
अगर कहीं हम ऐसे होते,
कोई हँसता कैसा लगता,
मन में जलता तीर सा लगता,
उसकी पीड़ा को अपना लें,
आओ खेलें खेल निराले,

औरत ने जनम दिया मर्दों को...



औरत ने जनम दिया मर्दों को...
***********************
साहिर लुधियानवी एक ऐसे शायर रहे हैं जिनकी शायरी का केंद्र बिन्दु नारी रही। नारी जीवन के विविध रूपों का जैसा वर्णन उन्होंने किया वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। 
नारी के बेटी, बहन, माँ दोस्त और प्रेयसी रूपों का जैसा उल्लेख उनके रचना संसार में देखने को मिलता है वह ह्रदयस्पर्शी है। 
वे आजीवन अविवाहित रहे पर भला उनकी इन रचनाओं को पढ़ सुन कर कौन ऐसा कह सकता है-
@ मेरे घर आई एक नन्हीं परी...
@ बाबुल की दुआएं लेती जा...
@ मेरे भइया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन...
@ मेरे भइया को संदेशा पहुँचाना...
@ चंदा रे मेरे भइया से कहना...
@ चलो इक बार फिर से अजनबी...
@ तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने...
उनका जन्म 8 मार्च 1921 में लुधियाना के एक जागीरदार घराने में हुआ था. 8 मार्च को अब दुनिया 'महिला दिवस' के रूप में मनाती है. औरत के अधिकारों के पक्ष में साहिर ने अपनी कलम खूब चलाई. 
@ लोग औरत को फ़कत जिस्म समझ लेते हैं...
@ इतनी नाज़ुक न बनो...
@ ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के...
उनकी नज़्म 'औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया..' की प्रासंगिकता आज बढ़ गई है. साहिर अगर आज जिंदा होते, तो 98 वर्ष के होते, उन्हें याद करते हुए पढ़िए और सुनिए उनकी मशहूर नज़्म...
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में, 
बिकती है कहीं बाजारों में
नंगी नचवाई जाती है, 
ऐय्याशों के दरबारों में
ये वो बेइज्जत चीज है जो, 
बंट जाती है इज्जतदारों में
मर्दों के लिये हर जुल्म रवां,
औरत के लिये रोना भी खता
मर्दों के लिये लाखों सेजें, 
औरत के लिये बस एक चिता
मर्दों के लिये हर ऐश का हक,
औरत के लिये जीना भी सजा
जिन होठों ने इनको प्यार किया,
उन होठों का व्यापार किया
जिस कोख में इनका जिस्म ढला, 
उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोपल बन कर,
उस तन को जलील-ओ-खार किया
मर्दों ने बनायी जो रस्में, 
उनको हक का फरमान कहा
औरत के जिन्दा जल जाने को,
कुर्बानी और बलिदान कहा
किस्मत के बदले रोटी दी, 
उसको भी एहसान कहा
संसार की हर एक बेशर्मी, 
गुर्बत की गोद में पलती है
चकलों में ही आ के रुकती है,
फाकों में जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर,
औरत के पाप में ढलती है
औरत संसार की किस्मत है, 
फिर भी तकदीर की हेटी है
अवतार पैगंबर जनती है, 
फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बदकिस्मत मां है जो, 
बेटों की सेज पे लेटी है,
औरत ने जनम दिया मर्दों को,
मर्दों ने उसे बाजार दिया
जब जी चाहा कुचला मसला,
जब जी चाहा दुत्कार दिया...

अपनी बोली में --

अपनी बोली में
------------------
सबको चहिए ठकुरसुहाती,
बनैं वे चाहे, ससुर के नाती,
निपट अंधेर, ना राह सुझाती,
भटकत फिरैं ना संग संगाती,
आवाज़ै तो बहुतै आती,
मगर न एकौ मन बहलाती,
अंधिन कौ तौ तब पतियाती,
भेटैं कौरि जुड़ावैं छाती,
सत्तर पूत बहत्तर नाती,
वाऊ के घर दिया न बाती,
दिन भर रैय्यत आती जाती,
कोई उन्हैं पहुँचावै पाती,

आज आया यहाँ है, वो कल जाएगा,

सामने का नज़ारा, 
बदल जाएगा,
जो उगा सुबह सूरज, 
वो ढल जाएगा,
तुम ये चाहो न चाहो,
मगर सच है ये,
आज आया यहाँ है,
वो कल जाएगा,

Saturday, 9 February 2019

बैठ गरुण के पंखों पर

बैठ गरुण के पंखों पर हम,
आसमान से कर लें बातें,
चंदा के घर नाचें गाएँ,
हो जब पूरनमासी रातें,
मोद मनाएं मंगल पर और,
शनि के वलय संग हम घूमें,
वृहस्पति पर क्रिकेट खेलें,
और मित्रों संग प्लूटो पर झूमें,
संग मछलियों के तैरेंगे,
सागर के तल में हम जाकर,
परियों की जादू वाली जो,
छड़ी हमें कोई दे दे,लाकर

Saturday, 23 December 2017

हम दीवाने जरा अलग

मनचाहा मिल सका नहीं ग़र,
सबके बहाने अलग-अलग थे,

उम्र - उम्र की बातें होती,
सबके खजाने अलग-अलग थे,

तुमने प्यार के पैसे माँगे,
मैंने दिल से बदला दिल को,

तुम तो निकले बड़े सयाने,
हम दीवाने जरा अलग थे,

हम कितने लायक हैं

आज घूमने गए सभी हम
छोड़ के अपनी बस्ती,
पैसे खर्चो नहीं मिलेगी
मिली ये खुशियाँ सस्ती,
छोड़ किताबों की बंदिश से,
देखी बाहर दुनिया,
आई जो फुर्ती चुस्ती तो,
बस में कर ली मस्ती,
इस मस्ती में झूम रहे,
हम कितने लायक हैं

जीवन में एक मित्र बनाएं

सोते हैं तो अब जग जाएं,
धरती को कपड़े पहनाएं,
आओ आगे बढ़कर आएं,
जीवन में एक मित्र बनाएं,
प्रतिपल मदद हमारी करते,
गर्मी में आतप को हरते,
फूल औ फल पत्तियाँ दवाएं,
देते शीतल मंद हवाएं,
पानी देकर बड़ा बनाएं,
जीवन में एक मित्र बनाएं
बेचैन बहुत फिरना घबराए हुए रहना
इक आग सी जज़्बों की दहकाए हुए रहना
छलकाए हुए चलना ख़ुशबू लब-ए-लालीं की
इक बाग़ सा साथ अपने महकाए हुए रहना
उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आए
पर्दे में चले जाना शरमाए हुए रहना
इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से
इक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना
आदत ही बना ली है तुम ने तो 'मुनीर' अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
मुनीर नियाज़ी
पल-पल बदलें,कल अलग
और आज अलग,
हर साजिंदा लिए हुए है,
साज अलग,
क्यों ना बदलें हम ऐसे में,
रंग अपने,
होती अलग जगह,
होते अंदाज़ अलग,
झुंड में हैं ये बच्चे,
अथवा फूलों का गुलदस्ता,
साथ में हों जब इनके
तो लगता हमको अच्छा,
इस जहान में हैं जितने,
वे सब दुखदर्द भुलाकर,
बच्चों के संग में ये मन भी
हो जाता है बच्चा,
आओ आज करे सब मिलकर,
चिड़ियाघर की सैर,
देखें समझें पशु पक्षी को,
हल्ला किए वगैर,
एक सींग का गैंडा देखो,
जिसकी मोटी खाल,
पानी के राजा लेटे हैं,
मगरमच्छ घड़ियाल,
सुंदर मोर देखते जाओ,
तोता हरियल वाला,
भाग न पिंजरे से जाए,
सो लगा हुआ है ताला,
हाथी शेर जिराफ लकड़बग्घे,
कंगारू भालू,
प्यारा पांडा चढ़ा पेड़ पर,
खाता देखो आलू,
देख न पाओ एक बार में,
फिर आ जाना खैर,
आओ आज करे सब मिलकर,
चिड़ियाघर की सैर,
कचहरी तो बेवा का तन देखती है,
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
- कैलाश गौतम
भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे-तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही जिन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दारोगा चरण चूमतें है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फंसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुंह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों ने घेरा सुझाया-बुझाया
वकीलों ने हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी ||
कागज के थैले अपनाओ,
पर्यावरण को स्वच्छ बनाओ,
अगर गंदगी हो तो उसको,
कूड़ेदानों में पहुँचाओ,
देश हमारा है घर जैसा,
इसको साफ रखो रखवाओ,
हम जैसे करते हैं देखो,
तुम भी निकलो आगे आओ,
एक से एक जुडे़ं तो मिलकर,
दरिया बन एक लहर उठाओ,
देश हमारा सबसे न्यारा,
बढ़ो, इसे आगे बढ़वाओ,
कोई बोले कोमल हमको,
कोई कहे कठोर,
हिम्मत नहीं बपौती कोई,
इस पर सबका जोर,
बनें साहसी वीर बहादुर,
हो जाएं सिरमौर,
करें इरादा बनें,
रहें हम आखिर क्यों कमजोर,

Saturday, 14 October 2017

भाव भरा हो,
नित नूतन स्वर,
लाएँ अर्थ
शब्द में भरकर,

कविता है
तो बोलेगी ही,
लोगों की
जुबान पर चढ़कर,
गुड्डी है तो
डोलेगी ही,
नीले आसमान
में बढ़कर,
चाँद हो सामने,
तारों की जरूरत क्या है,
तुम नज़र में हो,
नज़ारों की जरूरत क्या है,
यूँ तो दुनिया में,
बहुत से हैे मेरी राम सलाम,
दोस्त तुम सा हो,
हजारों की जरूरत क्या है,
फिर कहाँ मंज़िलों से दूरी है,
काम कुछ हो,ज़ुनू जरूरी है,
कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना,
पुरानी है हवेली पर चमक,
इसकी अनूठी है,
नगीना है ये गौरव देश का,
जैसे अगूंठी है,