Wednesday, 24 July 2013


कोई हमको जगाओ नहीं, 
सोते से उठावो नहीं,
सुबह की नींद प्यारी लगे,

सुबह उठे से धन मिलता है,
धन मिलता,जीवन खिलता है,
ये सब कुछ है मुझको पता,
तू हाथ अपना पीछे हटा,
सुबा की नींद प्यारी लगै....

...समय वक्तव्य देने का नहीं भाई,
मुझे हर शब्द से गोली बनानी है,
परिश्रम से उगा कर खेत में सोना,
सिपाही के लिए बन्दूक लानी है,
मुझे फुरसत नहीं है मैं,
फसल को लहलहाकर देश की जय बोलता हूँ,....

पहन कपड़े विचारक के मधुर उपदेश देने की,
मुझे फुरसत नहीं,
मैं,
गली को जगमगा कर,
देश की जय बोलता हूँ,

-- रामावतार त्यागी
हमको गुजरी हुई सदियाँ तो न पहचानेंगी,
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए,
हमसे पूछो ग़ज़़ल क्या है,ग़ज़ल का फ़न क्या,
चन्द लफ़़्ज़ों में कोई आग छुपा ली जाए,

-- जाँनिसार अख्तर
ओ प्यारे दिलवर,चल आसमाँ पर,
हम इक बनाएंगे आशियाना,
न बिजलियों का,हो डर जहाँ पर,
न देख पाए हमें जमाना,

है प्यार जिस दिल में,उसका दुश्मन,
है ये जमाना, यक़ीन कर लो,
नहीं ये मुमकिन जमाना बदले,
यही मुनासिब,जमीन बदलो,

सुकरात ईसा जरथुष्ट गाँधी,
की एक जैसी, ही है कहानी,
वफा के बदले में बेवफाई,
है रीत सदियों, की ये पुरानी,

चल उस जहाँ में,कि जिसमें हरसू,
मोहब्बतों का, है बोलबाला,
नहीं है नफरत की रस्म कोई,
न कत्लो-खूँ का रिवाज़ काला,

पनाह पाए जहाँ मोहब्बत,
औ नफरतों का,उठे जनाज़ा,
भटक चुका है, बहुत ये दिल अब,
कसम है तुझको, करीब आ जा,

कहाँ पे हो खो गए, कहो क्या,
पसंद आया, मेरा कहा ना,
ओ प्यारे दिलवर,चल आसमाँ पर,
हम इक बनाएंगे आशियाना...
चाहा था बरस जाए जरा झूम के पानी,
सैलाब वो आया कि जिन्दगी बिखर गई,
प्रलय में खो गए अपने कहाँ,कोई बताए,
नहीं उठ पा रहे हैं सांत्वना को हाथ,- हाय,
न बस चल पा रहा है मौत के आगे किसी का,
हुआ गुम शब्द वो,धीरज बंधाए जो दुखी का,
कि मानव आज दुख में है, तड़पता है,
सिसक सुनकर चलें,आगे बढ़ें,
कि मिलकर पोंछ लें आँसू,उन्हें धीरज बँधाएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
रात के राही थक मत जाना,सुबह की मंज़िल दूर नहीं,

धरती के फैले आँगन में,पल दो पल है रात का डेरा,
ज़ुल्म का सीना चीर के देखो,झाँक रहा है नया सवेरा,
ढलता दिन मजबूर सही,चढ़ता सूरज मजबूर नही,

सदियों तक चुप रहने वाले अब अपना हक लेके रहेंगे,
जो करना है खुल के करेंगे, जो कहना है साफ कहेंगे,
जीते जी घुट-घुट कर मरना,इस युग का दस्तूर नहीं

टूटेंगी बोझिल ज़ंजीरें, जागेंगी सोई तक़दीरें
लूट पे कब तक पहरा देंगी,जंग लगी खूनी शमशीरें,
रह नहीं सकता इस दुनिया में जो सबको मंजूर नहीं,
(साहिर)