प्रलय में खो गए अपने कहाँ,कोई बताए,
नहीं उठ पा रहे हैं सांत्वना को हाथ,- हाय,
न बस चल पा रहा है मौत के आगे किसी का,
हुआ गुम शब्द वो,धीरज बंधाए जो दुखी का,
कि मानव आज दुख में है, तड़पता है,
सिसक सुनकर चलें,आगे बढ़ें,
कि मिलकर पोंछ लें आँसू,उन्हें धीरज बँधाएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
नहीं उठ पा रहे हैं सांत्वना को हाथ,- हाय,
न बस चल पा रहा है मौत के आगे किसी का,
हुआ गुम शब्द वो,धीरज बंधाए जो दुखी का,
कि मानव आज दुख में है, तड़पता है,
सिसक सुनकर चलें,आगे बढ़ें,
कि मिलकर पोंछ लें आँसू,उन्हें धीरज बँधाएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
ये संकट की घड़ी है, आगे आएं,
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