Tuesday, 4 August 2015


होती जातीं हैं सतत, हमसे ऐसी भूल,
मन दर्पन धुँधला हुआ,हमें झाड़नी धूल,
दुनियाँ से होकर अलग, करना काम विशेष,
आएं वापस लौटकर, जग हो अपना देश,
बदल जाए इस जगत से, अपना यह व्यवहार,
करना है कुछ दिन हमें, खुद से साक्षात्कार,
दौड़ भाग संसार की, चली रहे अविराम,
पर मैं इससे ले रहा, कुछ दिन का विश्राम,
कल बेहतर हो इसलिए, मित्र विदा दो आज,
समझो सर्विस के लिए, जाता हूँ गैराज,

मेरा हर दर्द अपना आप,
दरमा होता जाता है,
चमक में आँसुओं की,
इक हँसी मालूम होती है,
मिटाया था तेरी खातिर,
निशाने अक्शे हस्ती तक,
तेरी हस्ती मगर हस्ती,
मेरी मालूम होती है,
कभी कभी खुदी का,
नाम तक बाकी नहीं रहता,
कभी लेकिन खुदी ही,
बेखुदी मालूम होती है,
चिरागे रह बनेंगे एक दिन,
नक्शे कदम मेरे,
अभी रफ्तार मेरी,
गुमरही मालूम होती है,

जमाने की हर एक शय अब,
नई मालूम होती है,
निशात अंगेज हरसू जिंदगी,
मालूम होती है,
तेरे जल्वों का परतों,
जर्रे -जर्रे में नुमाया है,
मेरी आँखों में तेरी,
रौशनी मालूम होती है,
तेरा जल्वा मेरी आँखों में,
कुछ ऐसा समाया है,
कि हर शक्ले हँसीं,
सूरत तेरी मालूम होती है,
यहाँ तक हो गई है,
तेरे जल्बों से सनाशाई,
कि त़ारीक़ी भी अब तो,
रोशनी मालूम होती है,

झुकाई कदमों में जबसे तेरे खुदी मैंने,
तो पाई जिंदगी में इक नई खुशी मैंने,
न लुत्फ जुर्रते इंकार में रहा बाक़ी,
तो फिर से सीखे हैं आदाबे बंदगी मैंने,
ग़मे जहाँ का असर दिल पे अब नहीं होता,
बदल दिया है अब एहसासे जिंदगी मैंने,
दिखाई दे रहे थे चारो तरफ मुझे अगयार,
रखी थी मुफ्त में ले सबसे दुश्मनी मैंने,
तेरी नजर से जो देखा तो सब हुए अपने,
जहाँ में चारो तरफ पाई दोस्ती मैने,
हँसी खुशी में ग़मे इश्क को नहीं भूला,
गमे जहाँ को सहा है हँसी खुशी मैंने,
ये पा के वादा कि अपनाओगे मुझे आखिर,
तुम्हारे दर्द में होने न दी कमी मैंने,
न उनकी रीत नई है न अपनी प्रीत नई,
न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई,
संकलित

"चश्मेसाक़ी की तरज़मानी से,
जिंदगी भर गई मआनी से,
जहल में बस रहा है जोमे सऊर,
अलअमाँ ऐसी नुक्तादानी से,
सब फ़सूने - जमाल कायम है,
इश्क की अपनी पासवानी से,
चाँद तारों ने नूर पाया है,
इक तबस्सुम की जोसफानी से,
जल्वऐ दोस्त रंगे हुश्ने यकीं,
हिज्र पैदा है बदगुमानी से,
हमने पायी मसरर्ते अबदी,
अपने ही सोजे जाविदानी से,
हासिले जिंदगी है वो आँसू,
जो गिरे फर्दे शादमानी से,
पायी मर्गे खुदी से सच्ची खुशी,
नग्मे उठते हैं,नौहाखानी से,
मुझको करना है राज़ की ग़र बात,
काम लेता हूँ बेजुबानी से,

"नूर का अपने खुद अमीन है तू,
जानता हूँ बहुत हसीन है तू,
है ये लेकिन कसूर क्या मेरा,
जो नही मुझको ताबे-नज्जारा,
शौके दीदार तेजतर कर दे,
शोला सामा मेरी नजर कर दे,
फिर तू आ बेनकाब होकर आ,
नूरे सद आफताब होकर आ,
जोश हुश्नो शबाब होकर आ,
शोरिशो इज़तराब होकर आ,
मेरे रग-रग में मस्तियाँ बन कर,
मेरे दिल में शराब होकर आ,
एक नजर में खराब हो जाऊँ,
तू खुद ऐसे खराब होकर आ,
मुझमें अपना जबाब पैदा कर,
फिर तू मेरा जबाब होकर आ,