Saturday, 14 October 2017

बहते हुए ये झरने,
मनमोहती हरियाली,
होली है ईद है ये,
ये दशहरा दीवाली,
खुश कर रहे ये मन को,
ग़म दूर भागते हैं,
पाते वे ऐसे लम्हे,
जिनके भाग्य जागते हैं,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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जिन्दगी भी बह रही है,
ज्यों बहे झरना,
मौत आई तो मरेंगे,
आज क्यों मरना,
जो मिले पल उसमें जी लें,
हो के खुश कर दें,
चाँद से अमृत निचोडे़ं,
हाथ पर धर लें,
मेरे सपने इस झरने से हरदम रहते बहते,
सुनता हूँ आवाज़ें उनकी वे मुझसे ये कहते,
चले चलो अविराम इसी से खुशियां होंगी हासिल,
सोचो मत बस चले चलो पैरों लिपटेगी मंज़िल,
कहते हैं इसे पैसा बच्चों
ये चीज़ बड़ी मामूली है
लेकिन इस पैसे के पीछे
सब दुनिया रस्ता भूली हैं

इंसान की बनायी चीज़ है ये
लेकिन इंसान पे भारी हैं
हलकी सी झलक इस पैसे की
धर्म और ईमान पे भारी है
ये झूठ कों सच कर देता है
और सच कों झूठ बनाता है
भगवान नहीं पर हर घर में
भगवान की पदवी पाता है
इस पैसे के बदले दुनिया में
इंसानों की मेहनत बिकती है
जिस्मों की हरारत बिकती है
रूहों ही शराफत बिकती है
सरदार खरीदें जाते हैं
दिलदार खरीदें जाते हैं
मिट्टी के सही पर इस से ही
अवतार खरीदें जाते हैं
इस पैसे की खातिर दुनिया में
आबाद वतन बंट जाते हैं
धरती टुकड़े हो जाती है
लाशों के कफ़न बंट जाते हैं
इज्ज़त भी इस से मिलती है
ताजीम भी इस से मिलती है
तहज़ीब भी इस से आती हैं
तालीम भी इस से मिलती हैं
हम आज तुम्हे इस पैसे का
सारा इतिहास बताते हैं
कितने युग अब तक गुजरें हैं
उन सब की झलक दिखलातें हैं
इक ऐसा वक्त भी था जग में
जब इस पैसे का नाम न था
चीज़ें चीज़ों से तुलती थीं
चीज़ों का कुछ भी दाम न था
चीज़ों से चीज़ बदलने का
यह ढंग बहुत बेकार सा था
लाना भी कठिन था चीज़ों का
ले जाना भी दुश्वार सा था
इंसान ने तब मिलकर सोचा
क्यों वक्त इतना बर्बाद करें
हर चीज़ की जो कीमत ठहरे
वो चीज़ न क्यों इजाद करें
इस तरह हमारी दुनिया में
पहला पैसा तैयार हुआ
और इस पैसे की हसरत में
इंसान ज़लील ओ खार हुआ
पैसे वाले इस दुनिया में
जागीरों के मालिक बन बैठे
मजदूरों और किसानों की
तकदीरों के मालिक बन बैठे
जंगों में लड़ाया भूखों कों
और अपने सर पर ताज रखा
निर्धन कों दिया परलोक का सुख
अपने लिए जग का राज रखा
पंडित और मुल्ला इन के लिए
मज़हब के सहीफे लाते रहे
शायर तारीफें लिखते रहे
गायक दरबारी गाते रहे
ओ ओ ओ ओ
ओ ओ ओ ओ
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
हल तेरे जोतेंगे
खेत तेरे बोयेंगे
ढोर तेरे हाकेंगे
बोझ तेरा ढोएंगे
पैसा हमें चाहिए
पैसा
पैसा
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
पैसा हाथ में दे दे राजा
गुण तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों की
खैर मनाएंगे
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
युग युग से यूँ ही इस दुनिया में
हम दान के टुकड़े मांगते हैं
हल जोत के फसलें काट के भी
पकवान के टुकड़े मांगते हैं
लेकिन इन भीख के टुकड़ों से
कब भूख का संकट दूर हुआ
इंसान सदा दुःख झेलेगा
गर खत्म न ये दस्तूर हुआ
ज़ंजीर बनी है क़दमों की
वो चीज़ जो पहले गहना थी
भारत के सपूतों आज तुम्हे
बस इतनी बात ही कहना थी
जिस वक्त बड़े हो जाओ तुम
पैसे का राज मिटा देना
अपना और अपने जैसों का
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
साहिर


एक तरफ से
आओ आओ पी लो भाई ,
मटके का पानी,
स्वाद अलग है पीकर होगी ,
तुमको हैरानी,

फ्रिज का पानी, सादा पानी,
नलके का पानी,
बिना हाथ धोए मत पीना,
झलके नादानी,
आओ आओ पी लो भाई,
मटके का पानी,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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उड़ने वालों उड़ो हवा में ,
ध्यान रहे इन बातों में,
फँस ना जाना कदम-कदम पर,
ऐसी बिछी बिसातों में,
नहीं साबका पड़े तुम्हारा,
आफत के परकालों से,
सारा जंगल भरा पड़ा है,
इन मकड़ी के जालों से,
ख़्वाब आँखों में, मैं पाँवों में सफ़र रखता हूँ
रेत पर लेट के तारों पे नज़र रखता हूँ

धूल हालात को हर बार चटाई मैंने
मैं मुक़द्दर तो नहीं रखता जिगर रखता हूँ

मेरी मंजि़ल को मेरी कितनी तलब है देखो
राह बन जाती है, मैं पांव जिधर रखता हूँ

चाँद तारों से उजालों से मुझे क्या लेना
मैं तो जुगनू हूँ अंधेरों की ख़बर रखता हूँ

हरमन दिनेश