Saturday, 14 October 2017

कहते हैं इसे पैसा बच्चों
ये चीज़ बड़ी मामूली है
लेकिन इस पैसे के पीछे
सब दुनिया रस्ता भूली हैं

इंसान की बनायी चीज़ है ये
लेकिन इंसान पे भारी हैं
हलकी सी झलक इस पैसे की
धर्म और ईमान पे भारी है
ये झूठ कों सच कर देता है
और सच कों झूठ बनाता है
भगवान नहीं पर हर घर में
भगवान की पदवी पाता है
इस पैसे के बदले दुनिया में
इंसानों की मेहनत बिकती है
जिस्मों की हरारत बिकती है
रूहों ही शराफत बिकती है
सरदार खरीदें जाते हैं
दिलदार खरीदें जाते हैं
मिट्टी के सही पर इस से ही
अवतार खरीदें जाते हैं
इस पैसे की खातिर दुनिया में
आबाद वतन बंट जाते हैं
धरती टुकड़े हो जाती है
लाशों के कफ़न बंट जाते हैं
इज्ज़त भी इस से मिलती है
ताजीम भी इस से मिलती है
तहज़ीब भी इस से आती हैं
तालीम भी इस से मिलती हैं
हम आज तुम्हे इस पैसे का
सारा इतिहास बताते हैं
कितने युग अब तक गुजरें हैं
उन सब की झलक दिखलातें हैं
इक ऐसा वक्त भी था जग में
जब इस पैसे का नाम न था
चीज़ें चीज़ों से तुलती थीं
चीज़ों का कुछ भी दाम न था
चीज़ों से चीज़ बदलने का
यह ढंग बहुत बेकार सा था
लाना भी कठिन था चीज़ों का
ले जाना भी दुश्वार सा था
इंसान ने तब मिलकर सोचा
क्यों वक्त इतना बर्बाद करें
हर चीज़ की जो कीमत ठहरे
वो चीज़ न क्यों इजाद करें
इस तरह हमारी दुनिया में
पहला पैसा तैयार हुआ
और इस पैसे की हसरत में
इंसान ज़लील ओ खार हुआ
पैसे वाले इस दुनिया में
जागीरों के मालिक बन बैठे
मजदूरों और किसानों की
तकदीरों के मालिक बन बैठे
जंगों में लड़ाया भूखों कों
और अपने सर पर ताज रखा
निर्धन कों दिया परलोक का सुख
अपने लिए जग का राज रखा
पंडित और मुल्ला इन के लिए
मज़हब के सहीफे लाते रहे
शायर तारीफें लिखते रहे
गायक दरबारी गाते रहे
ओ ओ ओ ओ
ओ ओ ओ ओ
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
हल तेरे जोतेंगे
खेत तेरे बोयेंगे
ढोर तेरे हाकेंगे
बोझ तेरा ढोएंगे
पैसा हमें चाहिए
पैसा
पैसा
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
पैसा हाथ में दे दे राजा
गुण तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों की
खैर मनाएंगे
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
युग युग से यूँ ही इस दुनिया में
हम दान के टुकड़े मांगते हैं
हल जोत के फसलें काट के भी
पकवान के टुकड़े मांगते हैं
लेकिन इन भीख के टुकड़ों से
कब भूख का संकट दूर हुआ
इंसान सदा दुःख झेलेगा
गर खत्म न ये दस्तूर हुआ
ज़ंजीर बनी है क़दमों की
वो चीज़ जो पहले गहना थी
भारत के सपूतों आज तुम्हे
बस इतनी बात ही कहना थी
जिस वक्त बड़े हो जाओ तुम
पैसे का राज मिटा देना
अपना और अपने जैसों का
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
साहिर


एक तरफ से

No comments: