Sunday, 15 September 2013

ईद मुबारक

अय दोस्तो, मुबारक त्योहार ये मिलन का,
चंदा की झलक बायस होती है इस जशन का,

है उससे इश्क कितना, पूछे है ये महीना,
सच में कहूँ तो ये है इक रिश्ता जानो-तन का,

वैसे तो हजारों गुल गुलजार इस चमन में,
भाते बहार को बस कुछ फूल ही गुलशन के,

आबाद रहे ये दिल, आबाद रहे बस्ती,
नेमत जहाँ है उसकी चारो तरफ बरसती,

छुट जाए रंगे-महफिल,थम जाए नब्जे-हस्ती,
मत छोड़ना वो दामन, मस्ती जहाँ है बसती,

सब ओर अमन और चैन की दुनिया बनी रहे,
पैग़ाम यही ईद का, लोगों से दिल कहे,
क़ौम इन पर गुमान करती है,
जिन्दगी एहतराम करती है,
वक्त ढ़ोता शहीद की अर्थी,
मौत झुककर सलाम करती है,


सारा आलम मुरीद होता है,
वक्त खुद चश्मदीद होता है,
मौत पेशानी चूम लेती है,
जब सिपाही शहीद होता है,

(आत्मप्रकाश शुक्ल)

इस मातृभूमि के कण-कण का,
उपकार है अपने जीवन पर,
यदि इसका कर्ज न चुका सके,
तो धिक्कार है अपने जीवन पर,
है याद बड़ी बेरहम यार,बिन कुछ बतलाए आती है,
ये नर्म हवा और मस्त फ़िजा का मज़ा सजा कर जाती है,
जब विषधर फन फैलाता है,
अनुनय कुछ काम न आता है,
जो निर्भय हाथ बढ़ाते हैं,
मणि वही खींचकर लाते हैं,

- गुलाब खण्डेलवाल
हमारे देश का समाजवाद,
मालगोदाम में लटकी हुई, उन बाल्टियों की तरह है,
जिन पर लिखा तो है-आग,
लेकिन भरी हुई है - बालू,

-- सुदामा पाण्डे,धूमिल


अपनी धरती पे सदियों से छाई हुई ,जुल्म और लूट की संगदिल रात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,ये न समझो कि ये आज की बात है,

जबसे धरती बनी,जब से दुनिया बसी हम यूँ ही जिन्दगी को तरसते रहे,
मौत की आँधियाँ बनके छा तीं रहीं, आग और खूँ के बादल बरसते रहे,

तुम भी मजबूर हो हम भी मजबूर हैं,क्या करें ये बुज़ुर्गों की सौगात है,
ये समझो कि ये आज की बात है,....

हम अंधेरी गुफाओं से निकले मगर रोशनी अपने सीनों से फूटी नहीं,
हमने जंगल तो शहरों बदले मगर, हमसे जंगल की तहज़़ीब छूटी नहीं,

अपनी बदनाम इंसानियत की कसम, अपनी हैवानियत आज भी साथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है......


हमने सुकरात को जहर की भेंट दी,और मसीहा को सूली का तख्ता दिया,
हमने गाँधी के सीने को छलनी किया, कनेडी सा जवाँ खूँ में नहला दिया,

हर मुसीबत जो इंसान पर आई है, इस मुसीबत में इंसान का हाथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हिरोशिमा की झुलसी जमीं की कसम,नागासाकी की सुलगी फ़िजा की कसम,
जिन पे जंगल का कानून भी थूक दे, ऐटमी दौर के वो दरिन्दे हैं हम,

अपनी बढ़ती हुई नस्ल खुद फूँक दे,ऐसी बदजात अपनी ही एक जात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हम तबाही के रस्ते पे इतना बढ़े,अब तबाही का रस्ता ही बाकी नही,
खूने-इंसा जहाँ स़ागरों में बँटे,इसके आगे वो महफिल वो साकी नहीं,

इस अंधेरे की इतनी ही औकात थी,इसके आगे उजालों की बारात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

(साहिर)