Sunday, 15 September 2013



अपनी धरती पे सदियों से छाई हुई ,जुल्म और लूट की संगदिल रात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,ये न समझो कि ये आज की बात है,

जबसे धरती बनी,जब से दुनिया बसी हम यूँ ही जिन्दगी को तरसते रहे,
मौत की आँधियाँ बनके छा तीं रहीं, आग और खूँ के बादल बरसते रहे,

तुम भी मजबूर हो हम भी मजबूर हैं,क्या करें ये बुज़ुर्गों की सौगात है,
ये समझो कि ये आज की बात है,....

हम अंधेरी गुफाओं से निकले मगर रोशनी अपने सीनों से फूटी नहीं,
हमने जंगल तो शहरों बदले मगर, हमसे जंगल की तहज़़ीब छूटी नहीं,

अपनी बदनाम इंसानियत की कसम, अपनी हैवानियत आज भी साथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है......


हमने सुकरात को जहर की भेंट दी,और मसीहा को सूली का तख्ता दिया,
हमने गाँधी के सीने को छलनी किया, कनेडी सा जवाँ खूँ में नहला दिया,

हर मुसीबत जो इंसान पर आई है, इस मुसीबत में इंसान का हाथ है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हिरोशिमा की झुलसी जमीं की कसम,नागासाकी की सुलगी फ़िजा की कसम,
जिन पे जंगल का कानून भी थूक दे, ऐटमी दौर के वो दरिन्दे हैं हम,

अपनी बढ़ती हुई नस्ल खुद फूँक दे,ऐसी बदजात अपनी ही एक जात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

हम तबाही के रस्ते पे इतना बढ़े,अब तबाही का रस्ता ही बाकी नही,
खूने-इंसा जहाँ स़ागरों में बँटे,इसके आगे वो महफिल वो साकी नहीं,

इस अंधेरे की इतनी ही औकात थी,इसके आगे उजालों की बारात है,
ये न समझो कि ये आज की बात है,

(साहिर)









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