प्रेमचन्द ने सन 1929 में कहा था --
हो सकता है मेरी कृतियों की उद्देश्यात्मकता आपकी अच्छी न लगे लेकिन जब तक हिन्दुस्तान विदेशी जुए के नीचे पड़ा कराह रहा है,वह कला के उच्चतम शिखर पर नहीं पहुँच सकता ।यहीं पर एक गुलाम देश और एक आजाद देश के साहित्य में अंतर आ जाता है।
हो सकता है मेरी कृतियों की उद्देश्यात्मकता आपकी अच्छी न लगे लेकिन जब तक हिन्दुस्तान विदेशी जुए के नीचे पड़ा कराह रहा है,वह कला के उच्चतम शिखर पर नहीं पहुँच सकता ।यहीं पर एक गुलाम देश और एक आजाद देश के साहित्य में अंतर आ जाता है।
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