दे चीर के रख ज़ुल्म का सीना, ये कर अहद,
इंसाफ को कुचले जो, वो मेरा कदम न हो,
इंसानियत हो धर्म और मज़हब हो प्रेम का,
संसार से छोटा कोई मेरा वतन न हो,
इस आँच में जलता रहूँ ताउम्र कर कबूल,
ये दुआ दिल से प्यार की वह आग कम न हो,
जिस पर निगाह उट्ठे तेरी ग़ैर की होकर,
दाता वो और कुछ हो,मेरी अंजुमन न हो,
इंसाफ को कुचले जो, वो मेरा कदम न हो,
इंसानियत हो धर्म और मज़हब हो प्रेम का,
संसार से छोटा कोई मेरा वतन न हो,
इस आँच में जलता रहूँ ताउम्र कर कबूल,
ये दुआ दिल से प्यार की वह आग कम न हो,
जिस पर निगाह उट्ठे तेरी ग़ैर की होकर,
दाता वो और कुछ हो,मेरी अंजुमन न हो,
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